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Full text of "Sahitya Sorabh Tritiya Bhag"

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प्रकाशक--- 
श्री बेजनाथ केडिया 
हिन्दी पुस्तक एजेंसी 
२०३, हरिसन रोड, कलकत्ता 





ब्रॉच--- 
“ज्ञानवापी, काशी | 
द्रीबा कछा, दिल्ली । 
वाकीपुर, पटना | 


#3-३०,७०४,१५०९८४६५०५-२६८४०-६-२५७००७० -न्‍च--ज% 3 ७. 3५: नकाने अनकोममग >नन, 





सुद्रक--- 
श्री परमानन्द पोद्यर 
यूनाइटेड कमर्सियल ज्रेस लि०, 
3२, सर हरिरिम गोबनका स्ट्रीठ- 
कलकत्ा। 


("क्षडरडड86ी (७0॥ऐ५ 
97086 ( गद्य ) 


». ७068, 875" #9९8 870 ।020008 --- 
१--गोविन्द, कस-अवचना, चरितावली, मत्स्य देशमे पाण्डव । 
37098 99॥708) #॥0 ॥800000॥) 968088 -- 
२--स्वासी शाइ्वराचार्य, कबीर साहब, सर्वगुणाधार भीक्ृप्ण । 
9560776५ 0९ 80स्‍609॥06 77ए७700॥8 800 6800 ए07 
३--फोनोग्राफका आविष्कार, मिट्टीका तेल। 
8॥77970 078708600 [९068 “-- 
४--अताप श्तित्ञा | 
फ6807एध्ए9 80068 0 00788, ॥#प० 96- 
परणाशा। -+- ह 
५--चित्तौड़-चर्चा, वीर-जननी राजस्थान । 
7णवप्रदाण॥, 9068 800 €888ए8:--- 
६--जातीय साहित्य, भारतीय सस्कृति, हिन्दी साहित्मे नाटक, 
कोध, आमवास और नगरवास, वीरता । 
5898650ए९, ॥07% 870 000९7 996088 *-- 
७--सभाषणम शिष्टाचार, चरित्र-सगठन | 


206४9 ( पद्च ) 


78807086079 --- 

१--याथा, भकक्‍्तकी भावना, प्रेम प्रवाह, संसार-सार, मुरमाया छुआ 
फूल 

70089"फाए8 870 79ए7४) 3568008 -- * 

२---कर्मवीर । 

॥र७॥५४४०83--- 

३--औपदी वचन-वाणावदी, अगद्‌ और रावण, आतृ-पश्रेम, 
चप्तिष्ठ और मरतका सवाद, सजन-सकीर्चन, पीर शिवाजी । 

«2४000 -- 

४--मातृ-भूमि, भारत वन्दना, भूषण कविके पद । 

390909000 -- 

५--्ञान-स्लोत, विपदू-स्वागत, मिरिधरकी कुण्डलिया, सूरदासके पद, 
रदीमके दोहे, फवीरके दौहे, छवि । 


ओिक्कननी। 


विषय-सूची 


विपय टेखक 
१ याघा ( पद्दढ ) १० आबनेस्वर मिश्र 'भुवना 


२ जातीय-साहित्य ( गद्य ) वा० श्यामसुन्दर दास बी० ए० 


३ कर्मवीर ( पद्म ) प० अयोध्या सिह उपाध्याय 

| सभाषणमे शिक्षाचार ( गद्य ) प० कामता प्रसाद गुर 

५ द्रौपदी-नचन-वाणावली ( पथ ) प० महावीर प्रसाद दिवेदी 
६ स्वामी शकराचार्य ( गद्य ) श्री राधाकृष्णदास 

७ शशि ( पछ ) चायू जेपिकीशएण शु् 

८ फोनोग्राफका आविष्कार ( गद्य ) श्रीनाथ सिंह 

९ ज्ञान-त्लोत ( पद्म ) प० नायूराम 'शकर! शर्मा 

१० मिट्टीका तेल ( गद्य ) प्रो० हरनारायण बाथम एम० ए० 
११ अगद और रावण ( पद्य ) प० रामचरित उपाध्याय 


१९ भारतीय-सल्कृति ( गय्य ) श्रीमती चद्रावती लखनपाल एम० ए० 


१३ छवि ( पद्य). ठा० गोपालशरण सिंद् 

पृ गोविन्द ( कहानी ) बा० हलुमानप्रसाद पोहार 
१५ भवतकी भावना ( पद्य ) प० गयाप्रसाद शुक्र 'सनेही' 
१६ हिन्दी-साहित्यमे नाटक ( गद्य ) सुधासे सकलित 
१७ भआातृ-ओ्रेम ( पद्म) गो० तुलसीदास 

१८ कोध ( गद्य ) प० रामचन्द्र शुद्ध, 
१९ श्रेम-अवाह ( पद्म ) प० गेकुलचन्द झुक्क बी० ए० 


ध्ण् 
त्य- 


नी # ६ #७ 9 


विषय लेखक ४ पृष्ठ 


२० कबीर साहब ( गद्य ) प० रामनरेश त्रिपाठी ७८ 
२१ सजन-सकीत्तन ( पदश्च ) ठा० गापालदारणसिदद ८३ 
२३ चरित्र-सगठन ( गद्य ) बा० शुलाबराय एम० ए० एल० एल० घी० <६ 
२३ ससास-सार ( पद्य ) कुमारी श्ञान्तादेवी विदुबी “इन्दु' है 
२४ आमवास और नगरवास ( गद्य ) प० अम्बिकादत्त व्यास द्ज्‌ 
२५ मुरकाया हुआ फूछ ( पद्य ) श्रीमती भद्दादेवी वर्मा १०० 


२६ सर्वे गुणावार श्रीकृष्ण ( गद्य ) प० जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी. १०१ 
२७ भारत वन्दना ( पद्म ) प० बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' १०६ 


२८ वीरता ( गद्य ) ( सकल्ति ) १०८ 
२९ विपद्‌ स्वागत ( पथ ) देवीप्रसाद गुप्त 'कुछुमाकर” ११४ 
३० मत्स्य देशमें पाडव ( गय ) लालताप्रसाद सुकुल एम० ए० ११६ 
३१ वीर शिवाजी ( पद्म ) सकलिति १९३ 
३२ महाकबि कालिदास ( गद्य ) भारतेन्दु बाबू हरिद्रनन्दर १२५ 
३३ गिरिधरकी कुण्डलिया ( पद्म ) गिरिवर कविराय १३२ 
३४ बीर जननी राजस्थान ( गय ) सकलित १३४ 
३५ सूरदासके पद्‌ ( शद्य ) महात्मा सूरदास १३८ 
३६ कस-अ्वचना ( गय ) प० हलल्दुलाल १४१ , 
३७ रहीीमके दोहे ( पद्र ) कविवर रहीम १४७ 
३८ चित्तौड़-चर्चा ( गद्य ) सह्ृच्ति च७ु० 
३५ भूषण कविके पद्म ( पद्म ) भूषण कवि पण्ण 
४० प्रताप-प्रतिज्ञा ( नाटक ) श्री सुदर्शन १५८ 


४१ कबीरके दोहे ( पद्म ) कबीरदास १६७ 


नी 


उपक्रम 


यो तो ऐलोवर्नाक्यूलर स्कूछोंक्े लिये सम्प्रति बहुतसे हिन्दी-सग्रह उपलब्ध 
हैं, फिर भो हिन्दी-भाषाके विस्तृततम क्षेत्रके विचारसे प्रस्तुत सम्रहोकी सख्या 
भ्यप्त नहीं प्रतीत होती है । 

समहाभावक्रे सिवा अखुत सम्रहोंम कितने एसे भी हैं जिनसे 
'विद्यायि-ससारके मस्त्तिष्क-विकास और योग्यता-साधनकी यथेट समभावना 
नहीं की जाती । ऐसे द्वी अगष्य न्यूनताओके विमर्णने छात्रोपयोगी 
सकलन करनेके छिये इस कार्ये-क्षेत्रमं मुझे वरवस अग्रसर किया। पर 
आर पारिवारिक-बाधा-जाल मुसे सतत इस उद्देश्यते पीछे खौँच हतोत्साद 
करता आ रहा था। किन्तु आरत-हरण जगदीशकी असीम दया और 
हिन्दी पुल्ऋ एजेन्सीके मालिक सेठ श्री वेजनाथजी केडियाकी उदारताने 
सौभाग्यवश् आज मेरे इस विचारकी पूति कर दी । 

इस पुस्तकके पाठ्य-विपयोके सकलनमें केचछ ऐसे ही विपय रखे 
न्गये हैं, जो कोमछ हृदय बालकोके चरित्र निर्माण, मनोविकास, शारीरिक 
सहृठन तथा नेतिक उन्नतिम पर्याप्त सहायता दें। क्योकि छात्र ही 
देशके उन्नति-प्रासादकी अटल नींव हैं, इन्दहोंपर देणके भावी उत्थानपतनका 
अदछ्तर भार है । 

इस पुस्तक सम्रहमें हिन्दीके सुप्रसिद, अभ्यस्त-हस्त गद्य तथा 
ज्यके लेखकोके किमिन्न-विपयोपर लेख दिये गये हँ। उन लेखोंमें 
जहाँ तदाँ आवश्यकतानुसार उचित परवत्तन त्तथा सशोधन भी किया 
है और जहा छेख पर्याप्ते अविक देखे गये हैं उन्हें वहाँ उचित 


[  ]] 

मत्रामें सक्षिप्त भी कर दिया है। पद्मोके निर्वाचनमें यह ध्यान निरन्तर 
रखा गया है कि विद्यायिगण प्राचीन तथा अर्वाचीन सभी प्रख्यात 
कवियोंकी रचनाओंसे परिचित हो जाय और उन्हें हिन्दी-साहिल्यका 
भी पर्याप्त ज्ञान दो । 

पुस्तकके अन्तमे हरएक पाठके कठिन शब्दोंकी एक छोटीसी 
शब्दार्थ-तालिका भी दी गई है, ताकि छात्रोकों गयो. तथा पद्योके 
पठन-पाठनमें लेशमात्र भी कठिनाई न रहे। प्रत्येक पाठके अन्तमें 
ग़य तथा पद दोनोंके अभ्यास भी दिये गये हैँ, जिनसे छात्रोको 
पाठ-विशेषपर किये जानेवाे सभव सभी अप्रश्नोका ज्ञान सम्यक रीतिसे 
हो जाय। साराष्ष यह कि पुर्तकंको छात्रोपयोगी बनानेकी यथा-साध्य 
चेश की गई है, किन्तु इस उद्देश्यमे मुके कद्ाँतः सफलता मिली है 
यद्द साहित्य-रप्तिक, विज्ञ-शिक्षक और पाठक ही जान सकते हैं । यदि 
इस सप्रहसे छात्रॉका कुछ भी उपकार हुआ तो में अपने परिश्रम को 
सफल समझूँगा । 

इस पुख्कके सकलन करनेमे मैंने विभिन्‍न छेखकोके लेखों, पुसकों 
तथा पत्र-पत्रिकाओँसे यथेष्ट सहायता लीहै। एतदर्थ में उनके भ्रति 
अपनी द्वार्दिक छतज्ञता प्रकट करता हू तथा उन मिन्रोंको भी धन्यवाद 
दिये बिना नहीं रह सकता जिनकी गंभीर सम्मतिने इस पुस्तकके तेयार 
करनेमें मुझे यथेष्ट सदययता दी है । 


कलकत्ता, पोष संक्राल्ति_]  अुबनेश्वर मिश्र 
संवत्‌ १६६९ ) 





[४२ ) 


२--जातीय-साहित्य 


[ ले०--शायसाहब श्यामसुन्दर दास बी० ए० ] 

( हिन्दू यूनिवर्सिती बनारसके प्रोफेसर रायसाहबके नामसे हिन्दी- 
ससारका कौन व्यक्ति परिचित नहीं होगा । “काश्ञी-नागरी-अचारिणी” जैसी 
सुप्रसिद्ध साहित्यिक-सय्थाकों स्थापित करनेका श्रेय आपको दी प्राप्त है। 
आप हिन्दीके एक उच्च कोटिके लेखक हैं। आपके छिखे हुए अन्थमिं 
“साहित्यालोचन”, “भाषाविज्ञान”, “हिन्दी भाषा और साहित्य” आदि 
अन्य हिन्दी-साहित्यमें अमर रहेगे । आपकी प्रवीण लेखन-शेलीने साहित्यके 
गहन विषयोंका विवेचन करके हिन्दी साहित्य ससारमें युगान्तर उपत्थित कर 
दिया है। आपने साहित्य इतिहासके गूलतलोके निद्शनसे हिन्दी साहित्यको 
'विभूषित किया ह। आपने कितने ही अमूल्य भ्रन्थोंका सपादन अद्वितीय 
यम्यताके साथ किया है । आप प्रारम्भसे ही हिन्दीकी सेवा सच्ची ऊगन और 
सत्परतासे करते आ रहे हैं। हिन्दी-साहित्य सम्मेछनके सभापतिका उच्च पद 
आपके द्वारा सुशोमित हो चुका है। ) 

पहले हमें यह जानना चाहिये कि जब दम किसी देशके 
जादीय खाहित्यके इतिहासका उल्हेख करते हें, तब उससे 
हमारा तात्पयं क्या द्वोता दै। अर्थात्‌ जब हम भारतीय 
आय-जातिका साहित्य, 8 साहित्य, फ्रांसीसी साद्वित्य 
था अक्वरेजी साहित्य आदि वाक्याशोंका प्रयोग करते हैं। 
तब हम क्रिस बातको व्यक्लित करना चादइते दै। कुछ छोग 
कहँंगे कि इन वाक्याशोंका ठातय यद्दी है कि उन-उन भाषाओं- 
मे कौन-कौनसे छेखक हुए, वे कब-कब हुए, उन्होंने कोन- 
कौनसे प्रन्थ छिखे, उन अन्थोंके गुण-दोष क्या हैं ओर 
उनके साहित्यिक भाषोंसें क्या-क्या परिवर्तन हुए। यह 
ठीक है, पर जातीय साहित्यमें इन घातोंके अतिरिक्त 
और कुछ होता है। जातीय साहित्य केवछ उन 


[३] 


पुल्तकोंका समूह नद्दीं कद्टछाता जो किसी भाषा या किसी देशमें 
विद्यमान हों। जातीय साहित्य जाति विशेषके मस्तिष्ककी उपज 
ओर उसकी प्रकृतिके उन्नतिशीकू तथा क्रमागत अमिव्यज्ञनका 
फल है। सम्भव दे कि कोई लेखक जातीय आदशसे दूर जा 
पडा हो और उसकी यह विभिन्नता उसकी भ्रकृतिकी विशेपतासे 
उत्पन्न हुई हो, परन्तु फिर भी उसकी प्रतिभामे खाभाविक 
जातीय भावका कुछ च कुछ अंश बतमान रहेगा दो । उसे वह 
सवंथा छोड़ नहीं सकता । 

यदि खाभाविक जातीय भाव किसी कालमे वर्तमान 
कुछ द्वी चुने हुए खनामधघल्य छेखकोंमें पाया जायगा, तो हम 
कह सकेगे कि उस कालके जातीय साहित्यकी यही विशेषता 
थी। जब हम कहते है कि अमुक कालके भारतीय आयों, 
यूनानियों या फ्रासीसियोंका जातीय भाव ऐसा था, तथ 
हमारा यह तात्परय॑ नहीं होता कि उस कालके सभी भारतीयों, 
थूनानियो या फ्रासीसियोके विचार या मनोवेग एकसे थे। 
उससे हमारा यद्दी तात्रर्य होता है कि व्यक्तिगत विभिन्नताको 
छोडकर जो साधारण भाव किसी कालमे अधिकतासे 
चतंमान द्वोते है, वे ही भाव जातीय प्रकृतिके व्यंजक या 
वोधक होते है, और उन्हींको जातीय भाव कद्दते है। चाहे 
उन्हें कोई दोप समके या गुण। उन्हीं जातीय भावषोंका 
विवेचनपूवंक विचार करके हम इस सिद्धातपर पहुंचते 
है कि अमुक कालमे अमुक जातिके जातीय भाव ऐसे थे। 
उन्दींके आधारपर हम किसी जातिकी शक्ति, उसकी घुटि 
ओर उसकी मानसिक तथा नैतिक स्थितिका छान अ्राप्त 
करते है, तथा इस वातका अनुभव करते है कि उस जातिने 
संसारकी मानसिक तथा आध्यात्मिक उन्नतिमे कहाँतक 
योग दिया। 


[ ४ ] 


मध्यकाल अर्थात्‌ सन्‌ ईसवीकी दसवाीसे चोदहवी शताब्दियों- 
के बीच यूरोपमें किसी नवयुवककी शिक्षा तबतक पूर्ण नहीं 
सममी जाती थी जवतक वह यूरोपके सभी मुख्य-मुख्य देशॉमें 
पर्यटन न कर आता था। इसका उद्देश्य यही था कि वह अल्य 
देशोंके निवासियों, उनकी भाषाओं, उनके रीति-रिबाज तथा 
उनकी सावेजनिक संस्थाओं आदिका ज्ञान प्राप्त कर हे, जिसमे 
पारस्परिक तुलनासे वह अपने जातोय गुण दोषोंका ज्ञान प्राप्त कर 
सके और अपने शीछ-स्वभाव तथा ज्यवहारको परिमारजित और 
सुन्दर वना सके | 

साहित्यका अध्ययन भो एक प्रकारंका पर्यटन या देश-दर्शन 
डी दै। उसके द्वारा हम अन्य देशों और ज्ञातियोंके मानसिक , 
तथा आध्यात्मिक जीवनसे परिचय प्राप्त करते और उनसे निक- 
रस्‍््थ सम्बन्ध स्थापित करके उनके डपाजित ज्ञान-भाण्डारके रसा- 
स्वादनमे समर्थ होते है। देश-दर्शनके लिये की गई साधारण 
यात्रा और साहदित्यिक-यात्रामे वड़ा भेद दै। साधारण यात्रा 
तो हम किसी निर्दिट कालमें ही कर सकते है पर साहित्यिक- 
यात्राके लिये कालका कोई वन्‍्धन नहीं। यात्रा हम चाहे जिस 
कालमे कर सकते है | तात्पये यह कि हम किसी भी जातिकी, 
किसी सी कारकों विदृन्मंडडीसे, जब चाहे, परिचय प्राप्त 
कर सकते है। इसके ढिये किसी प्रकारका अवरोध या 
बन्धन नहीं दै । 

इस प्रकार दूसरी जातियोंके साहित्यके इतिहासका अध्ययन 
करके हम उस जातिकी प्रतिभा, उसको प्रवृत्ति, उसकी 
उल्नति आदिके क्रमिक विकासका इतिहास जान सकते है। इस 
दशामें साहित्य, इतिहासका व्याख्याता और सहायक हो जाता 
है| इतिहास हमें यह चतलाता है कि किसी जातिने किस प्रकार 


['६४ ] 
अपनी सांसारिक सम्यताको चढ़ाया और वह क्‍या क्‍या 
करनेमें हुईं। साहित्य बताता है कि जाति विशेषकी 
आस्तरिक वासनाएँ, भावनाएँ, मनोदृत्तियाँ तथा कल्पनाएँ 
क्या थीं, उनमें क्रमशः केसे परिवर्तन हुआ, सासारिक-जीवन- 
के उत्तार चढ़ावका उनपर फेसा प्रभाव पड़ा और उस प्रभाव- 
ने उस जातिके मनोविकारों और मानसिक तथा आध्या- 
त्मिक जीवनको नये साचेमें केसे ढाछा। साहित्य हीसे हमे 
जातियोंके आध्यात्मिक, मानसिक और नेतिक विकास किंवा 
सन्नतिका ठीक-ठीक पता मिलता है। 


अभ्याभ 


( १ ) साहित्यकी झुद्ध परिभाषा बताओ। क्‍या ससारकी सभी 
पुस्तक साहित्य कह्टी जा सकती हैं ४ 

(२) सावारण साहित्य ओर जातीय साहित्यमें क्या “अन्तर है? 

( ३ ) दसारे जीवनमें जातीय साहित्यकी क्या उपयोगिता दे? 

(४ ) जातीय साहित्य ही एक जाति विशेषका केसे सर्वोत्तम 
इतिद्वास-गायथा हे १ 





३--अर्मत्रीर 
[ छे०--पण्डित अयोध्यासिंद उपाध्याय ] 

( आपका जन्म च० कृ० ३ स० १९२२ में हुआ | आप धदायू के रहने- 
बाले थे किंतु कई पीढियो से आजकल आजमगढ जिल्में रहते हैं। उपा- 
ध्यायजीका हिन्दीके प्रति अगाघ प्रेम है! भाप अपने जीवनके श्रारम्भ- 
से ही हिदीको सेवा करते आा रहे हैं। आप सरकारी पदपर रहते हुए 
भी बराबर साहित्य-सेवार्में रत रहे हें। आप जेसे अ्रवीण और कुझल 
गयय छेखक हैं, वेसेद्दी दस्तसिद्ध सुकवि सी। आप सरलतम्न और कठिन- 


| ६ ] 


तम भाषा लिखनेमें अति दक्ष हैं। आपने अपने चमत्कारसे हिन्दी- 
काव्य-ससारमें युगान्तर उपसध्यित कर दिया है। आपका "प्रियप्रवास” 
अमर मद्काव्य है। आपका वर्तमान समयग्रके खड़ी बोलीके महाकवि है )) _ 
देखकर वाधा विविध, बहु विज्न घबराते नहीं। 

रह भरोसे भागके दुख भोग पछताते नहीं। 
काम कितना दी कठिन हो किन्तु उकताते नहीं। 

भीड़में चंचछ बने जो वीर दिखढाते नहीं।॥ 
हो गये यक आनमभे उनके बुरे दिन भी भरे। 

सब जगह सब कालमे वे द्वी मिले फूछे फले॥शा 
आज करना दे जिसे करते उसे हे आज ही। 

सोचते कहते है जो कुछ कर दिखाते है वह्दी ॥ 
सानते जो को दे सुनते दे सदा सबको कही। 

जो मरृद्‌ करते है अपनो इस जगतमें आप हो।॥। 
भूलकर वे दूसरॉंका मुह कभी तकते नहों। 

कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं ॥२॥ 
जो कभी अपने समयको यों बिताते है नहीं। 

काम करने को जगह वात बनाते दे नहीं। 
आजकल करते हुए जा दिन गंवाते दे नहीं। 

यत्न करनेमें कभी जो जो चुराते हे नहीं॥, 
बात है वह कोन जो द्ोतो नहीं उनके किये। 

वे नमूना आप बन जाते दे औरोंके ढछिये॥३॥ 
व्योमको छूते हुए दुर्गम पहाड़ोंके शिखर। 

दे घने जंगल जहा रहता है तम आठों पहर | 
गजते जलछ-राशिकी उठती हुई ऊँची छहर। 

आगकी भयदायिनी फेली 'दिशाओंमे छव॒र।॥॥ 


[ ७ ] 

ये कंपा सकती कभी जिसके कछेजेको नहीं। 

भूछकर. भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ॥छ88 
चिरूचिलाती धूषको जो चादनी देवे वना। 

कास पडुने पर कर जो शेरका भी सामना |. 
जो कि हँस हँसके चबा लेते है छोहेका चना। 

“है क्रठिन कुछ भी नहीं? जिनके है जीमे यह ठना ॥। 
कोस कितने द्दी चले पर थे कभी थकते नहीं। 

कौनसी दे गांठ जिसको खोछ वे सकते नही ॥५४॥ 
कामको आरम्भ करके यों नहीं छोड़ते * 

सामना करके नहीं जो भूछकर मुंह मोड़ते॥ 
जो गगनके फूछ बातोंसे वृथा नहिं तोड़ते 

सम्पदा मनसे करोड़ोकी नहीं जो जोडते॥ 
बन गया दोरा, उन्हींके हाथसे है कारबन। 

काँचको करके दिखा देते दे वे उज्ज्वल रतन ॥।॥ 
पवतोंकी काठकर सड़के बना देते दैवे। 

सेकड़ों मरुभूमिमि नदियाँ वहा देते हे वे।॥ 
गर्भभे जरू-राशिके वेड़ा चला देते दें 

जंगलोंमे भी भद्दा-मंगल रचा देते हैवे। 
भेद नभ-तकका उन्होंने दे बहुत बतछा दिया। 

है उन्दोंने दी निकाली वारकी सारी क्रिया || 
कार्य थछको वे कमो नहिं पूछते “बढ दे कहाँ” 

कर दिखाते हे असम्भवकों वदह्दी सल्मव यहाँ ॥ 
उलछमनें आकर उन्हें पड॒ती है जितनी छी 

दिखाते हे नया उत्साह उतना ही वहाँ।॥ 

ढाल देते है विरोधी सैकड़ों दी अड़चनें। 

वे जगहसे काम अपना ठोक करके ही ढरकू॥ ८॥ 


) 


८ 
कोई पर्वत खड़ा। 
है अपनी यजुक्तियोंसे वे उडा।॥ 
चीचमें पड़कर जरूथि जो काम देवे गड़बड़ा। 
तो बना देंगे उसे वे क्षद्र पानीका घडा॥ 
चन खेंगालेंगे करेंगे व्योममें बाजीगरी। 
कुछ अजब धुन काम करनेकी जो उनमें है भरी॥६॥ 
सब धरहसे आज जितने देश हैं फूछे फल़े 
बुद्धि विद्या, धन) विभवके ह्दै जहाँ डेरे डले ॥ 
से बनानेसे उ्हींके बन गये इतने भल्े। 
वे सभी दे हाथसे सपूतोंके पढ़े॥ 
झछोग जब ऐसे समय, पाकर जनम ढेंगे कभी 
देशकी औ जातिकी होगी भमछाई भी तभी ॥१०॥ 


प्‌ 
जो रुकावट डालकर द्वोवे 
देते 


अभ्यास 


“] १] फर्मवीरसे कैसे महुध्यका घोध होता है ? अपनी सरल भाषामें बताओ * 
[९] कर्मवीर मलुष्योंके क्या क्या गुण द्वोते हैं ? सममकाओ। 
[३] क्या फर्मवीरके छिये इस ससारमें कोई ऐसा भी काम है जो 
असाध्य है? यदि नहीं तो केसे ? 
[४ ] निम्नांकित शब्दों के अ्थे,वताओर--- 
महभूमि, मुह सोढ़ना, मु द्द ताकना, जी चुराना, गाठ खोलना । 
[५] कर्मवोर मनुष्यों के गुणो के विरुद्ध किनके और केसे गुण द्ोते हैं ? 


न 





( ६) 
४०--सम्भाषणमें शिष्टाचार 


[ हे०--कामताप्रसाद गुरु ] 


(झदजीका जन्म सब॒त्‌ १६२२ वि०, सागर, सध्यप्रदेशमें हुआ था। 
आपके पूंज अपनी कार्य-ऊुशलछताके कारण दागी ( राजमत ) रानियोके 
जुद् रहे ये । इसी कारण “गुर पदवी अबतक चली भा रही है। जआाप 
'एन्ट्रेंस पास करके ही सागर हाईस्कूलमें शिक्षक हो गये। जाजकल 
आप नामेल स्कूल जबल्पुरमें शिक्षक हैं। आप हिन्दीके एक उत्तम छेखक 
हैं। आपकी भाषा सदा व्याकरणसम्भत और सरल वोधगम्य होती 
'है। कविताएं छलित और भाजपूर्ण होती हैँ। आपने हिन्दीका एक 
यृहत्‌ व्याकरण और अन्य अनेक पुस्तक छिखी हैं । ) 


मनुष्यकी विद्या, चुद्धि ओर स्वभावका पता उसकी वातचीत- 
से छग जाता है, इसलिये उसे अपने विचार अकट करनेके लिये 
'चातचीतमें बड़ी सावधानी रखनी चाहिये। सम्भाषणमें साव- 
धानीकी आवश्यकता इसलिये भी है कि बहुधा वात द्वी बातमे 
कपे बढ़ आता है। यथायेमे मनुष्यकी बातचीत ही उसके लिये 
कार्योकी सफछता अथवा असफछताका कारण होती है। किसी 
कचिने कह्दा है “कहे कृपाराम सब सीखिवो निकाम एक वोलढिवो 
न सीखो सब सीखो गयो घूछमे ।! जिसकी वातचीतमें सभ्यता 
वा शिष्टाचारका असाव रहता है उससे छोग बात करना 
नहीं चाहते। 

सम्भाषण करते समय ओ्रोताकी मर्यादाके अनुरूप तुम! 
आप! अथवा “अ्रीसान” का उपयोग करना चाहिये। इनमे 'आप' 
शब्द इतना व्यापक है कि वह तुम” और 'श्रीमान” का भी स्थान 
अद्ण कर सकता है। तुम” का उपयोग अत्यल्त साधारण 
'स्थितिके छोगोंके लिये या अधिक घनिष्ट परिचयवाढे समवय- 

्‌ 


(,१० ) 


स्कके लिये और श्रीमानका उपयोग अत्यन्त प्रतिष्ठित सद्मुभावोंके 
लिये किया जाय। 


बहुत हद्वी छोटे छड़कोंको छोडकर और किसीके लिये “तू” का 
उपयोग करना उचित नहीं। “किसीके प्रश्चका उत्तर देनेमे 'हा! या 
"हीं? के लिये केवल सिर दिछाना असम्यता है। उसके बदले 
थी हवा या “जी नहीं', कददनेकी बडी आवश्यकता दै। वातचीत 
इस प्रकार रुक-रुक कर न की जाय कि जिससे श्रोताको उकताहट 
साह्म पड़ने लगे। वातचीत करते समय इस वातका ध्यान 
रखना चाहिये कि वोलनेवाला वहुत देशतक अपनी ही वात न 
सुनाता रद्दे, जिससे दूसरोंको वोलनेका अवसर न मिले और वे 
बोलनेवालेकी वकबकसे ऊब जायं। वातचीत बहुधा स॑वादके 
रूपसे होनी चाहिये जिससे श्रोता और वक्ता-दोनॉंका अमुराग 
सम्मापणमें वना रहे । 


, सभ्य वार्तालापमें इस बातका ध्यान रखा जाता है कि 
किसीके जीको दुखानेवाली कोई बात न कदह्दी जाय | सम्भाषण- 
को, जहातक हो संके, कटाक्ष आक्षेप, व्यज्ञ, उपाल्म्म और 
अश्लछीछतासे मुक्त रखना चाहिये । 

अधिकारकी अहम्मन्यतामें भी, किसोके लिये कट्ठु शब्दका 
प्रयोग करना अपनेकों असम्य सिद्ध करना है। किसी नये 
व्यक्तिके विषयमे परिचय श्राप्त करनेके लिये बातचीतमे उत्सु- 
कता न प्रकट की जाय और जबतक बड़ी आवश्यकता न हो, 
किसीकी जाति, वेतन, वंशावडी, वय आदि न पूछा जाय। 
किसीसे कुछ पूछते समय प्रश्नोंकी कड़ी छगाना डचित नहीं। 
यदि कोई सज्जन आपका प्रश्न सुनकर भी उसका उत्तर न दें 
तो उसके लिये उनसे अधिक आग्रह न करना चाहिये। यदि ऐसा 
जान पड़े कि वह उत्तर देना भूछ गये हे तो अवश्य द्वी नम्नता 


(११ ) 


पूर्वक दूसरी वार उनसे प्रश्न किया जाय | 

वातचीतमे आत्म-अशंसाको यथासम्भव दूर सना चाहिए 
साथ द्वी वातचीतका ढ्ञ भी ऐसा न हो कि श्रोताको उसमे अपने 
अपमानकी मकछक दिखाई दे। बातचीत विनोद बहुत दी 
आनन्द छाता है, परन्तु सेव हँसी ठट्टा करनेकी टेव वक्ता और 
श्रोता दोनोंके लिये हानिकारक है । 


थदि कोई दो-चार सज्जन इकट्ठ किसी विपयपर चातचीत 
फर रहे हों तो अचानक उनके वीचमे जाना अथवा उनकी 
बात सुनना अशिष्ठता है। ऐसे अवसरपर छोगोंके पास 
जाकर विना कुछ पूछे ही वातचीत करने छगना अनुचित है, 
कभी-कमी किसी मनुष्यको चुपचाप देखकर छोग उससे कुछ 
कहनेका आग्रह करते है। ऐसी अवस्थामे मन्ुष्यका कर्त्तव्य' 
है कि बह कोई मनोस््षक वात या विषय छेड़कर उनकी 
इच्छा पूर्ति करे । 
, किसीकी असम्भव वात सुनकर भी उसकी हाँमे हाँ मिलाना 
चापद्सी दे ओर न्याय-संगत वातें सुनकर भी उनका खण्डन 
करना द्ुुरामह है । छोगोंको इन दोषोंसे बचना चाहिए। यथपि 
वार्ताछापमे दूसरेके मतका समर्थन करनेसे, अथवा उसकी 
प्रशंसामे दो चार शब्द्‌ कहनेसे चापछ्सीका कुछ आभास रहता 
है, तथापि इतनी चापछूसीके बिना सम्भापण नीरस और अग्निय 
हो जाता है। * 

इसी प्रकार अपने मतका समर्थन करने और दूसरेके 
मतका खण्डन करनेमे कुछ-न-कुछ दुरामद' ऋंलकता है, तो 
भी इतना दुरामह सभ्य और शिक्षित समाजमे क्षल्तव्य है। 
किसो अलुपस्थित सज्जनकों अकारण निन्‍्दा करना शिष्टताके 
विरुद्ध है और परनिन्‍्द्कको सम्य तथा शिक्षित छोग वहुघा 


( ९१२ ) 
भनादरकी दृष्टिसे देखते दै। विद्वानोंके ससाजमें मतभेद होनेके 


छनेक कारण उपस्थित होते हे; इसलिए जब किसीके सतको खंडन 
फ्रनेका अवसर आवे तव बहुत ही अप और क्षमा-प्रा्थना 
# उस भअ्तका खण्डन करना , खण्डन भी ऐसी 


चतुराईसे किया जाय कि विरुद्ध सतबाछ्ेको बुरा न छगे। 
बातचीतमे क्रोधषके आवेशको रोकना चाहिए और यदि यह न हो 
सके दो उस समय मौन धारण द्वी उचित है। कड़वे वचनोंका 
उत्तर व्यंगसे भी देना नीतिकी -दृष्टिसे अनुचित नहीं है, 
तथापि शिष्टाचार उन्हें कमसे कम एक बार सहन करनेका 
परामश देता है | 


यदि अपने किसी अनुपस्थित मित्र वा सम्दल्थीकी निल्दा 
की जा रही हो तो निन्‍्द्कको नश्नतापूर्व5 इस कार्यसे बिरत कर्र 
देना चाहिए और यदि इतनेपर भी अपनी बातका कोई प्रभाव 
निन्‍्दुकपर न पड़ेंसो किसी वहाने उसके पाससे उठकर चढ़े आना 
उचित है। इससे उसे अपनी मूखता, तथा उसकी अप्रसन्नताका 
कुछ आभास हो जायगा। जो मनुष्य स्वय॑ अकारण दुसरोंकी 
निन्‍्दा नहीं करता उसके सामने दूसरोंको भी ऐसी निल्‍्दा करनेका 
साहस बहुधा नहीं होता । 


किसी सभा,समाज यथा जमावमे अपने मित्र अथवा परिचित 
व्यक्तिसे ऐसी भाषाका कथवा ऐसे शब्दोंका स्पयोग न करना 
चाहिये, जिन्हे दूसरे न समझ सक॑, अथवा जो उन्हें विचित्र जान 
पड़, ऐसे अवसरपर किसी विशेष अथवा अपने ही घन्घे या नौक- 
रीकी बातें करनेसे दूसरे छोगोंको अरुचि उत्पन्न हो सकती है। 
थदि किसी विशेष अथव गहन विषयपर बहुत समयतक सम्भा- 
घण करनेकी आवश्यकता न द्वो तो थोड़े थोड़े समयके अच्तरपर 
विषयक बदल देना अनुचित न होगा । 


( १३ ) 


अभ्यास 


(१) अपनेसे बड़ोके सम्मुख किसे प्रकार बोलना चाहिये ? 

(२) “हु और '“तुम' का प्रयोग हम किनके लिये कर सकते हैं ? 
(३) अपने गुदुजनोको निन्‍्दा सुननेमें दोष है। केसे? 
(४) सम्भाषणमें शिक्षचारके सभी चिहोका सक्षेपमें वर्णन करो । 
(५) बोलनेमें उदण्डता सर्ववा निन्‍्दुनीय है। सममकाओ। 


र०>मीपनकनन-झम-ऊ+>न«--न 


५--द्रीपदी-वर्चंन-वाणावली 
[ छे०--आचाये पं० महयवीर प्रसाद दिवेदी ] 


( दिविदीजीका जन्म जिला रायबरेलीके दौलतपुर प्राममें बै० शुक्र ४ 
सबत्‌ १९२१ मे हुआ | दिवेदीजी हिन्दी-साहित्यके महारथी हैं । द्विवेदी- 
जीकीसी विह॒ता, गयपय लेखन-कुशछता, समालोचनामे निर्भीकता, 
हिन्दीके किसी भी लेखकमे अबतक नहीं है। ऐसा कोई विपय नहीं, ऐसा 
कोई शात्न नहीं, जहाँ हमारे पूज्यपाद द्िविदीजीकी दृष्टिन गई हो। अथे 
शात्र, समाज-शात्न, काव्य, दर्दोन कोई भी शास््र आपसे छूटा नहीं है। 
आपने जिस विपय पर लेसनी उठाई उसे अपनी असाधारण प्रतिमाके 
बलसे सुन्दर बना दिया । आप स्वय कवि हैं तथा कविताके मर्मेश पण्डित 
भी हैं। आप ब्ृद्ध दोनेपर भी अवतक हिन्दीकी वैसी ही अनुरागकें साथ 
सेवा कर रहें हैं। आपके द्वारा लिखित, सम्पादित तथा अचुवादित 
पन्योकी सख्या ३० के ऊपर है। ) 


घमेराजसें, ुयोधनकी, इस प्रकार सुन सिद्धि विशाछ, 
चिन्तन कर अपकार शत्रु कृत, कृष्ण कोप न सकी संभाल। 
क्रोध और उद्योग बढ़ाने वाली, तव वह गिरा रसारूं, 
मददीपाछको सम्बॉधिन कर, वोली युंक्ति युक्त तत्कांछ | १॥ 


( १४ ) 


आप सददश पण्डितके सम्मुख, निपट नीच नारीकी बात, 
तिरस्कार कारक-सी होती हे, दे नरपति कुछ विख्यात | 
बलस्ध हरण आदिक अति इु.सद्द दु:ख तथापि आज इस काल, 
बार बार प्रेग्त करते है भुके बोलनेको भूपाछ॥२॥ 
तेरे दी वंशज महीपवर, सुर नायक सम तेज निधान, 
जो धरती अखण्ड इस दिन तक, धारण किये रहे वछवान | 
हा हा। वही मद्दी निज करसे, तूने ऐसी फंकी आज, 
सिरसे हार फेंक देता है, जेसे महामत्त गजराज॥३॥ 
कपटी कुटिल मलुष्योसे जो जगमें कपट न करते है, 
वे मतिमन्द मूढ़ नर निश्चय, पाप पराभव मरते हे। 
उसमे कर, प्रवेश फिर उनको, शठ यथो' मार गिराते हे, 
कवच हीन तनुसे ज्यो' पैने, बाण प्राण ले जाते है ॥ ४॥ 
हे साधन सम्पेन्न नराधिप ! हे क्षत्रिय कुछ अभिमानी ! 
कुछजा गुणगरिमा वंशवदा यह लक्ष्मी सब छुखखानी। 
तुके छोड कर अन्य कौन नृप। इसको दूर हटावेगा, 
अपनी मनोरमा रमणी सम, रिपुसे हरण करावेगा।| ५ ॥ 
हे मद्दीप |! मानी नर जिसको, महानिनन्‍्य बतछाते हे; 
उसी पन्‍्थके आप पथिक है; नहीं परूतु छजाते है। 
कोपानछ, क्यो' नहीं आपको, भस्मीभूत बनाता है 
सूखे शमी बक्षको जेसे ज्वाला-जाढ जछाता है।॥ &॥ 
* यथा समय जो कोप अलुम्रह, को अयोगमें छाते है, 
स्वयं देहधारी सब उनसे बशीमूत्र दो जाते है। 
क्रोधहीन नरकी रिपुतासे, कोई भय नहिं पाते है, 
तथा मित्रतासे, वे उसको आदर भी न दिखाते दे॥७॥ 
चल्दुन चचित गात भीम जो, रथहीपर चलता था वत्र, 
घूछ घूसरित वह्दी विपिनमे, पैद्छ फिरता हैः सर्वत्र 


( ९१४ ) 


क्‍या तव सन इसपर भी पीडित, होता नहीं पाय संताप ९ 
सत्यशील वनकर अनर्थ यह दाय | कर रहे है क्या आप॥८॥। 
द्रेवराज सम जिस जअजुनने, उत्तर कुरु सब विजय किया, 
करके हे न्‍॒प। तुके अक्ृत्रिम, अतुलिति धनोपद्दार दिया; 
तेरे छिये वद्दी अब हा द्वा! तरु के घल्कल छाता है; 
इसे देखकर भी क्या तुमको, कुछ भी क्रोध न आता दै॥६॥ 
यहाँ मद्दीततपर सोनेसे, सदुल गात हो गया कठोर 
चन-गज-तुल्य देख पड़ते है, जटा छटकती दे सब ओर! 
नकुलझल ओर सहदेव युग्मकी, ऐसी दुर्गति देख नरेश, 
क्या तू शेप नहीं कर सकता, अब भी अपना थेर्य विशेष ॥१०॥ 
हे लप। तेरी मति-गति मेरी, नहीं समझे आती है, 
चित्त-बृत्ति भी किसी-किसीकी, अदभुत देखी जाती दै। 
तेरी प्रवक आपदाओं का, चिल्तन करती हू में जब, 
मनसतापसे फट जाता दै; यह मेरा हृदयस्थछठ तब॥ ११॥ 
मूल्यवान मंजुल शय्यापर पहले निशा बिताता था, 
सुयश और मंगल गीतोंसे, श्राव जगाया जावा था। 
वही आज तू कछुश-काशोंसे, युक्त भूमि पर सोता है 
अति कर्कश श्गार शब्दोंसे | दवा द्वा। निद्रा खोता है॥ १२॥ 
डिज-मोजनसे वचा हुआ झुचि, पटरस अन्न पुष्टिकारी, 
खाकर जिसने इस शरोरको, पहले किया मनोहारी। 
भूष | वही तू आज उदर निज, घन-फछ खाकर भरता है 
यशके साथ देह भी अपनी द्वा हवा हवा! कृश करता दे॥ १३ ॥ 
रज्र॒खचित सिंहासन ऊपर; जो सदेव द्वी रहते थे, 
जप मुकुटोंके सुम-नर्ज कण, जिनको भूषित करते थे। 
भुनियों ओर मृगोंके छारा, खण्डित कुश-युत घन-भीचर, 
अहृहद तात फिरते रहते हे, वे दी "तेरे पद्‌ मढुतर॥ १४॥ 


( १६ ) 
यह विचार कर कि यह दुर्दशा, बेरीने की दे भूषालः 
हृदय समूछ उसड जाता है पाती हूं में व्यथा बिशाढू। 
जिन मानो पुरुषोंका विक्रम, हर नहिं सके शत्रु-कुछ-केतु, 
उनको इश्वरदत्त द्वार भी, द्ोती है सुख द्वी का देतु ॥ १६॥ 
मसुमपर करके कृपा बीरता, धारण फरिये फिर इस बार 
क्षमा छोड़िये, जिसमे रिपुका दो जावे सत्वर संधार। 
यह रिपुनाशक सहनशीछता, निश्ृद मुनियों ही के योग्य, 
भूपालों के लिये सबेदा, वह सब भाति अयोग्य, अयोग्य ॥१६॥ 
तेरे सम तेजोनिधान नर; यशोरूप घनके घनवान/ 
है मद्दीप| अरिसि पाकर भी, यदि ऐसा दुःसह अपसान। 
बेंठे रहें शाव चित्त, धारण किए हुए सल्तोष भह्दान, 
तो हा हा । हत हुआ निराश्रय, मानवान पुरुषों का मान ॥ १७॥ 
तुफे तुच्छ जँचते दे यदि ये; शोये आदि शुभगुण-समुदाय/ 
क्षमा अकेली सतत सोख्यका, मूल जान पड़ती है हाय! 
तो यह राजधमंका सूचक, वोरोचित कोदण्ड विहाय, 
वहीं अखण्ड अप्निको सेवा, कर्ता रह तू जदा बढ़ाय ॥ १८॥ 
कपट कर रहा है रिपु इससे, तुक तेजखीको महिपालछ, 
पालन करना नहीं चाहिये, पूषे भ्रतिज्ञा अ्रण इस काढ। 
अरिपर विजय चाहनेवाढे, धरा धीश बढ-चुद्धि-निकेत, 
विवध दोष, की हुई सन्धिमें, दिखलाते दें युक्ति समेत ॥ १६॥ 
देवयोगसे दु खोद्धिमें, छुकक इबेको यह आशीशा, 
शत्रनाश दोनेपर छक्ष्मी, मिले पुनः ऐसे अवनीश, 
जैसे प्रातःकाल, सिन्धुमे, मस्त हुए दिनकरकों आय, 
समिर-राशि हटनेपर दिनिको, शोभा मिलती है सुडपाय ॥ २० ॥ 


( १७ ) 


अभ्यास 
(१) वचन-वाणावलीसे क्या समझते हो? इसका सन्धि-विच्छेद करो।' 
(२) क्या द्ौपदीके वचन धर्मेपरायण युधिष्ठिफ्के लिये उपयुक्त हैं ९ 
यदि हैं तो केसे १ 
(:) इस पद्म नीति युक्त बहुत॒ती बातें भरी हैं। समम्ताओ । 
(४) निम्माकित शब्दोंका अर्थ बताओः--- 
वचन-चाणावली, महीपवर, कुलजा, कोपानल, वशंवदा निस्एद । 
(५) सन्धि-विच्छेद करो --- 
महीपबर, नराधिप | 
(६) द्रौपदी वचन वाणावल्ीसे तुम्द क्या शिक्षा मिलती है? 
(७) द्वोपरीऊे उपदेशाका भावा्व अतने शब्दोम वर्णन करो? 
(८) निम्नांकित शब्दोझे पर्यायवाची शा०्ठ दोः--- 
वचनवाणावली, वशवदा, अकृनिम ' 


६--स्वामी शद्भूराचार्य 
[ ढे०--राघाकृष्ण दास ] 

( बाबू राधाकृष्ण दास भारतेन्दुजीऊे सम्बन्धी थे, हिन्दी-भाषाका 
अनुराग उन्होंने ही आपके दृदयमे उत्तम किया था। आपकी गद्य- 
रचनाएँ अधिक हैं, परन्तु सरस पद्ध भी लिखने थे। अपने समयमें 
भाप हिन्दी-भापाके प्रसिद्ध छेखकरोमे थे। आपने लगभग बीस पचीस 
ग्रन्योकी रचना की। आपके काव्यात्मक्क गद्य बहुत ही गम्भीर, 
भाषार्ण होते थे और अधिकतर दार्शनिक विचारोंसे आपकी रचनाएँ 
भरप्‌ हैं। ) 
नव हजार पर्पसे अधिक हुआ, शंकराचार्यने माछावार अरदेशमें 
नाँवूरी जाह्मण-बंशमे जन्म अदण किया था। कोई-कोई कहते हैं 





( १८ ) 


पके इनका जन्म कर्णाद-देशाल्तर्गत तुन्नभद्रा नदो तीखतों श्ह्व- 
मेरी नामक नगरमे हुआ। स्वे-शास्रविशारद शिवगुरु इनके 
पिता थे। अष्टम वर्षम उपनयन दोनेपर ये वेदाध्ययनमे प्रदत्त 
हुए। इनकी ऐसी चसत्कारपूर्ण मेघा, सुतीक्षण बुद्धि और दृढ़ 
अध्यवसायमयी शक्ति थी कि चारद् दी वर्षकी अवस्थामें ये 
सब शाक्षोंमें असाधारण व्युत्पन्न दो गये। कोई-कोई कहते हैं 
“कि पंचम बर्षेसे उपनयन हुआ और अष्टसमे वेदादि सब 
शास्ररोंका अध्यन ऋरके ये गुरु गृहसे छोट आये। ये निखिल वेद 
और सकछ प्रकारके दशन, पुराण, इतिहास, काव्य और 
अलंकार प्रश्गति पढ़कर थोड़े ही द्नोंमे सब शालत्रोमे पारद्भत 
हो गये थे। साख्य, पातखर प्रश्ृति तक शास््रोंको ऐसे 
मनोयोगके साथ इन्होंने पढ़ा था कि उनके विषयमे तर्क उठाकर 
“े बड़े-बड़े पंडितोंकों परास्त कर देते थे। अत्यन्त छुकुमार 
चयससे ही इनकी ऐसी तीद्ष्ण बुद्धि, असामान्य विद्या और 
प्रौढोचित विज्ञता देखकर सब छोग विस्मयापन्न द्वोते थे। 


कद्दते दे, शह्कराचायेने एक वर्षके वयमे मात-साषाकी वर्ण 
माला मुखसे स्मरण कर छी थी, दूसरे वर्षमे लिखे अक्षर पह- 
अचानकर पढ़ना सीख लिया था, तीसरे वर्ष पुराण और काव्य 
पढ़ने ऊगे। उनको स्मरण-शक्ति ऐसी थी कि जो एक बार 
झुनते वह्दी कंठल्थ दो जाता। उनको पढ़ानेमें गुरुको कुछ भी 
कष्ट न होता, क्‍योंकि वे प्राय.सहाध्यायियोंको पाठ पढ़ा देते थे । 


अत्यन्त अल्प वयसमें उनके पिता पसछोकवासो हुए। कोई 
कोई कहते है, तीन ही चर्षकी अवस्थामें वे पितृद्दीन दो गये थे। 
अष्टम वर्षसे घरके सारे कामकाज उन्हें देखने पडें। इतनी थोड़ी 
अवस्थामे दी संसारका सारा भार उनके सिरपर आ पढ़ा। 


इससे जीविका और गृहस्थीके सब झहूगड़ोंके लिये उन्हींको 


( १६ ) 


उद्योग करना पडता था। ऐसी दुर्बस्थामे पड़कर भी वे शिक्षा- 
विद्यासे विरत न हुए। जो समय मिलता, वह केवछ विद्या- 
शिक्षा ही मे छगाते, क्षण सात्र भी विश्राम न करते। 


थोढ़े दिनोंमे इनका यश सोरभ चारों ओर फोल गया। राजा 
छोग भी दशनाथथी होकर इनके घर आने छूगे। केरछाधिपतिने 
इनके यद्दाँ आकर विविध धर्मोपदेश छिया। उन्दोंने इन्हें बहुत 
सा धन देना धचाद्दा, परन्तु अर्थमे किचित्मात्र भी छोम न 
होनेसे इन्होंने कद्दा--“यद्द धन द्रिद्रोंको दान कर दो, हमे 
इसकी आवश्यकता नहीं ।” 


इनको चहुत द्वी छोटी अवस्थामे संन्यास-घर्म-म्रहणकी इच्छा 
डुई्दे। इन्होंने मन-ही-मन स्थिर किया कि अकृतदार दोकर 
इश्वरोपासना छौर धमंचतनमे जीवन अतिघादधित करेंगे। 
माताके कातर स्नेहपूर्ण वाक्योंसे ये उस समय अपना मनोरथ 
सिद्ध न कर सके, परल्तु विवाह नहीं किया। केसे माता से 
आजा मिले, रात-द्नि इसकी चिन्ता करने छगे | 


एक दिन शब्डएचाये गाँवसे थांड़ी दूरपर अपने किसी 
आत्मीयके घर गये थे। रास्तेमे एक क्षद्र नदी पड़ती थी। उस 
नदीमें बहुत दी कम जरू था; इससे सबोग अनायास पार 
चढे जाते, नावका प्रयोजन न होता | जानेके समय तो शंकरा- 
चाये अनायास चले गये, परन्तु आनेके समय देखा कि नदी 
चरसातके जलसे उम्रड आई है, पार जानेका उपाय नहीं। 
थोडी देर सोच विचार कर नदी पार करनेके अभिम्रायसे हिले, 
'परन्तु जल इतना बढ़ गया कि उनके गले तक पहुंच गया। 
अथछ ख्रोतमे वह जानेका ढंग देखकर माता पुत्रके जीनेकी 
आशा देख अत्यन्त भीता और कातरा हुई। शब्दुराचायने 
चहदी सुन्दर अबसर अपने मनोरथके पूर्ण होनेका देखकर 


( २० ) 


कहा--“माँ, यदि तुम मुझे; संन्यास घमे छेमेकी आज्ञा दो 
तो इस विपद्से छूटनेकी आशा है, नहीं तो कोई आशा 
नहों, क्योंकि परमेश्वर संन्‍्यासीसे अत्यन्त प्रसन्‍न रददते है। 
आपके संन्‍्यास-धर्म भ्रहणकी आज्ञा देनेसे वह अवश्य हम 
लोगोंकी रक्षा करंगे। 


माने उत्त समय विवेचनाका अबसर न पाया, पुत्रके रक्षणाथे 
अगत्या हृध्ठ श्रस्तावपर सम्मति दे दी। शझूराचार्य दूने साइसके 
साथ माॉँको पीठपर छेकर तेरकर नदी पार हुये। आत्मीय खजनों 
को एकत्र करके माताके रक्षणावेक्षणका भार उनपर छोड़ा। 
कभी कभी स्वयं आकर भेंट करता रहूंगा” इत्यादि वाक्योंसे 
उनको आश्वस्त किया, तदुपरन्‍्त ईप्सित प्रदेशकी ओर चले गये ॥ 


पहले कर्णाट-देशमे जाकर कुछ दिन रहे, वहां विविध धमे 
शासत्र ओर दर्शन पढ़े। वहीं बोद्ध घमे-शात्र भी पढ़ा। सब 
शास्त्रोंको देखकर उन्हें दृढ़ विश्वास हुआ कि जगतका स्टा 
एक द्वी अनादि अनन्त जगदीश्वर दे । मिलन भिन्‍न शास्नरकारोंने 
किसीने शिव, किसीने विष्णु, किसीने शक्तिको सृष्टिकर्ता कह 
कर निर्दिष्ट किया दे सद्दी, परन्तु ये सब भिन्‍न नहीं दे, यद भी 
शाक्षकारोंनेद्दी स्पष्ट प्रकाशित किया है। मिन्‍न भिल्‍न धमम शाक्बाँमें 
जो परस्पर विरोध मर्य है वे सब उनकी तीक्षण बुद्धिसे समाने 
बोध हुए। किन्तु बोद्धोंका ईश्वर नहीं है” यह वाक्य उन्हें 
अत्यन्त असह्य हुआ । उस समय बौद्ध धमंका भारतवर्षमें ऐसा 
प्राथल्य दो गया था ओर हिन्दूधमंकी ऐसी दुरबस्थां थी कि 
यदि शह्डुराचाय सहंश असाधारंण “बुद्धि-शाली” दिन्दूघमंके 
रक्षणमें न कटिबद्ध द्योते तो हिन्दूधमे छ्त हो जाता | कक २278: 
ने दिन्दूं धमकी हु्देशा देखकर बोद्ध धमकी मारतवर्षसे निकाल 
देनेकी प्रतिज्ञा की । 


( २५१ ) 


काचीपुरके द्िमशीरूत नरपति चौद्ध धर्मके चढ़े द्वी पक्ष- 
पाती थे। उन्तकी सभा अधान-प्रधान षोद्पघ् पण्डितोंसे 
परिपूर्ण रहती थी। शंकराचार्यने यहाँ जाकर बौदूधधरमकी 
अलीकता प्रकाशित की। राजा और पंडित-मण्डढी अत्यन्त 
क्द्ध हुई। शहूुराचार्यके बिचारकी प्रार्थना कम्नेपर राजाने 
ऊोधपूर्वंक कद्दा--“घौद्धधरंकी भल्लीकता प्रमाणित करनेकी 
चेष्टा करना घड़ी घृष्टवाका काम दे।” 


अन्तमे वाद-विवादके उपरान्त यह स्थिर हुमा कि जो 
कोई विचारमे परास्त द्योगा उसे कोल्हूमे पेरनेका कठिन दृण्ड 
भोगना पढ़ेगा। राजाने नाना स्थानोंसे बढ़े-बढ़े बोदूध पुरोदितो- 
'को निमंत्रित करके घुछाया। उन छोगोंके साथ शह्डराचार्य 
का बिचार हुआ। इनकी अकाट्य युक्तिके आगे बौद्धोंके 
तकबाल छिलन्न-भिन्न हो गये और पण्डितोंको पराजय खीकार 
करनी पड़ी। राजा उन छोगोकों उचित दण्ड देकर स्वयं चोदध 
चर्म छोड शद्गुराचार्यके मतके अनुवर्ती दो गये । 


शह्ट॒ुरावायंकी इस विजयका पुरा विवरण शिवकाची 
अमशानेश्वर मद्दादेवजीके द्वागश्पर ओर भगवती नदी तीरस्थ 
भेरूलीके देव मन्दिर्मे पत्थरपर खुदा हुआ है । 


काचीपुरसे वे तिरुपति नामक स्थानसे गये। बहां भी बड़े 
बड़े चीद्ध पण्डितोंको परास्त किया। इस भाति दक्षिण देशकों 
“विजितकर पश्चिमोत्तर देश विजय करनेकी इच्छासे विन्ध्या- « 
चल पार द्वो काशी आये। यहाँ विविध दुर्शन-शालत्र श्रणेता 
मण्डन मिश्नको विचारमे परास्त किया। इसी भाँती फाश्मीर, 
चल्भीपुर प्रदृति उत्तर और पश्चिमके सब अदेशोंमे भ्रमण 
करके नाना कीर्ति स्थापित करते हुए उत्तर और पूर्व दे: 
ओर यात्रा की। नेपाछ, फकामरूप आदि स्थानोंके पण्डितोंको 


( २२ ) 


भी पराजित किया। अच्तमें काश्मीर राज्यके सरखती पीठमें 
कुछ दिन रहकर बत्तीस वर्षकी अवस्थामें केदारनाथमे मानव- 
लीला संवरण की। 

थोड़ी द्वी अवस्थामे नाना शात्तरोंमें विशारद होकर, भारत 
वर्षके नाना स्थानोंमें धूमकर, पण्डितोंको शाश्थार्थमे परास्त 
कर अद्वतवादका प्रचार कर, स्थान-स्थानपर सठ स्थापन कर 
वेदान्त चर्चाकी वृद्धि कर और वेदान्त द्शेन, कठादि उपनिषद्‌ 
एवं श्रीमद्धनभवदगीता प्रभृति ग्रन्थोंके साष्य तथा कई एक 
उत्कृष्ट भन्‍थोंकी रचना कर वे संसारमें चिरस्मरणीय हो गये 
है। दीघे जीवी होते तोन जाने क्‍या करते। 

शक्कुराचायं जन्म ग्रहण न करते तो हिल्दू-धर्मका चिह्न 
भी क॒दाचित्‌ न दिखरछाई देता। हिन्दू धर्म उनका क्रृणी है 
अद्वैतवाद प्रचारित करना द्वी उत्तका मुर्य उद्देश्य था। 
परन्तु वे यह कहते थे कि जो छोग इसे सममतेमें असम दै' 
उनको शिवादि देवताओंकी पूजा करना उचित है। इसी 
कारणसे अनेक स्थानोंमें अनेकदेव देवोकी मूर्तियाँ भी उन्होंने 
स्थापित कराई थीं । ः 

अभ्यास 
( १ ) स्वामी शकराचार्य कोन थे ? उन्होने हिन्दूधर्मकी रक्षा केसे की १ 
( ९ ) शकराचायेमें कौन-कौनसी विशेषताएं थीं? उनके धद्धू त 
चमत्कारोंके सम्बधर्मे क्या जानते हो १ 

( ३) उन्होंने अपनी मातासे सन्‍्यासघर्म अहण करनेकी आज्ञा केसे ली १ 

( ४ ) उनके धर्म प्रचाससे वौद्धघरमपर क्या असर पढ़ा? 

( ५ ) उन्होंने किन-किन घुरल्धर विद्वानोंको परास्र किया ! 

(६ ) उनकी भेथा-शकित कैसी थी १ 

( ७ ) उनके समयमे भारतमें कौन-सा मत विशेष प्रवह्ल था ? उस समय 

' हिन्दूधमेंकोी स्थिति केसी थी १ * 


६ ४२३ ) 


( ८ ) उनके धर्म प्रचारका भारतपर क्या प्रभाव पढ़ा ? 
( ९ ) देहावसानके समय उनकी क्या अवस्था थी ? 
(१०) हिन्दूभमेंके प्वरतक ये कहे जा सकते है कि नहीं? 
(११) निम्नाक्ति शब्देम समास बताओ --- 
वाद-विवाद, पण्डित-मण्डलो, दीघे जीवी । 


“४०४ 


७--मातृ-भूमि 
[ ले०- श्री मेथिछीशरण शुप्त ] 


आपका जन्म स० १९४३ विक्रममे चिर्गाव जिला म्सीम हुआ। 
आप घहुतही लोकप्रिय कवि है। आप खड़ी बोलीके युग परिवर्तनकारी 
कवि है। आपके लिखित मौलिक तथा अजुवादित काव्य अन्थाकी 
सत्या २० के लगभग है। जयहथ-व्ध, काव्यकी दृश्सि बहुत दी 
उच्च श्रेणीकी पुस्तक है। “भारत भारती” ने आपकी छोकप्रियता घढानेमें 
ययेथ सहायता की हे यद्द पुस्तक आदिसे अन्ततक राष्ट्रीयमावोसे 
भरपूर है। भारतीय नवयुवकोम राप्ट्रीय जागति उत्पन्न करनेका बहुत 
कुछ श्रेय आपकी उज्जल फीति 'सारत-भारती” को दी है। आप 
सत््तत और बप्नका भी जानते हैं। आप चहुत द्वी सरल हृदय, 
प्रतिभाशाली और मिलनसार पुरुय है । 


(१) 
चीलास्थर परिधान दरित पट पर सुन्दर है, 
सूथ चन्द्र-युग-मुकुट, भेखला रज्लाकर दै। 
नदिया प्रेम प्रवाह फूछ तारे मण्डल दै, 
बल्डी जन खगवृन्द शेप फन सिंद्यासन है| 
करते अभिपक्त पयोद है; वलिद्दारो इस वेपकी, 
हू मात भूमि । तू सत्य दी सगुण मूर्ति सर्वेशकी ॥| 


( २४ ) 
(२) 

जिसकी रज़में छोट-छोटकर बड़े हुए दे; 
घुटनोंके घछ सरक-सरककर जड़े हुए दे । 

परम हंस-सस बाल्यकालमें सब छुख पाए, 
जिसके कारण “घूढ भरे हीरे” कहलाए॥ 

-इम खेढ़े-कूदे दर्षयुत जिसकी प्यारी गोदमे, 
है माठ्भूमि ! तुकको निरख मग्न क्यों न हों मोदसें॥ 


(३) 
हमें जीवनाधार अन्न तू द्वी देतो दै, 
बदढे में कुछ नहीं किसीसे तू छेती दै। 
श्रेष्ट एक से एक विविध द्॒व्योंके द्वारा, 
पोषण करती प्रेम भाव से सदा इसारा॥ 
है माठ-भूमि | उपजे न जो तुमसे ऋषि अंकुर कभी; 
तो चड़प-तड़प कर जछ सरें जठरानछमें हम सभी ॥ 
(४) 
'पाकर तुमसे सभी सुखों को हमने भोगा, 
तेरा प्रत्युपक्षार कभी क्या हमसे होगा 
तेरी ही यह देह ठुक्ोसे बनी हुई है; 
*. बस, तेरे द्वी सुरस-सार से सनी हुई दै। 
फिर अंत धमय तूह्दी इसे अचछ देख अपनायगी, 
हे माठ भूमि ! यह अंतसे तुममें दी मिल जायगी।॥ 
(५) 


झुरमित, सुन्दर छुखद सुमन तृमपर खिढते हैं, 
भाँति-भाँतिकि सरस सुधोपम फछ मिलते हैं; 


६ इे४ ) 
ओपधियों हैं प्राप्त एक से एक निशाली, 
,  खानें शोमिद कहीं वातु बर रल्ोवाली। 
जो आवश्यक द्वोते हमे मिलते सभी पदाये हैं, 
दे माठ-मूसि । वसुधा, धरा तेरा नाम नाम यथाये है ॥ 
(६) 
दीख रही है कहीं दूर तक शैल-श्रेणी, 
कहीं घनावलि घबनी हुई है तेरी बेणी। 
नदियों पेर पखार रही हैं बनकर चेरी, 
पुष्पोसे तरू राज़ि ? कर रही पूजा तेरी। 
अदु मलय-वायु मानो ठुके चदन चारु चढ़ा रही, 
हे माठ-भूमि । किसका न तू सात्विक-भाव बढ़ा रही |) 
(७) 
चज्ञमामयी, तू दयामयी है, क्ञेममयी है, 
सुधामयी, वांत्सल्यमयी. नू श्रममयी है। 
विभचशालिनी, विश्वशालिनी, ठुःग् हरती है. 
भयनिवारिणी, शान्तिफारणी. सुखकरत्रों हे। 
दे शरण-दायिणी देवि ! नू करती सबका त्राण है. 
है माठ-सूमि | सतान हम. नू जननी, तू आण है ॥ 


(5८) 
जिस प्रृथ्वीमें सिले हमारे पूर्चज प्यारे, 
उससे हे भगवान | कभी हम रहे न न्योरे। 
ज्ञोट लोट कर वहीं दृदयफों शान्त करेंगे, 
मिलते समय खसुत्युसे नहीं ढरेगे। 
उस मातृ-मूमिकी घूलमे जब पूरे सन जायेंगे, 
होकर भव-बंधन-मुक हम आत्मस्प बन जायेंगे ॥ 


( २६ ) 


अभ्यास 
( १ ) नीलाम्बर, परिवान, वसुधा, मलय, चारु, विभव, वात्सल्य आदि 
चब्दाँके अर्थ लिखो ! 
( २ ) मातृ-भूमि, सलय-वायु, प्रेम-प्रवाह, . सूये-चन्धम कौनसा: 
समास है [ 


( ३ ) मातृ-भूमिके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है, क्‍यों वह दहसारी 
माता है 
६( ४ ) छन्द न० 3 का भावार्थ लिखो । 
( ७ ) मातृ भूमिके प्रति अत्मन्त प्रेम क्यों होता है १ 
( ६ ) उसके भ्रति हमारा क्या कर्तव्य है १ 
( ७ ) भातृ-भूमिक्रे सम्बन्वमे कोई दूसरी कविता चुनाओ १ 
( ८ ) छन्द न० ७ के विशेषणोंका उल्छ्रेख करो १ 
( ९ ) पर्यायवाची शब्द बताओ १ 
अभिपेक-पयोद, जठरानल, विसवशालिनी । 
( १०) सुमास विच्छेद करो --- 
खग बृन्द्‌, रलाकर, विज्लपालिनी । 


बलि 


८--फोनोगाफका आविष्कार 
[ ज्लै०--श्रीनाथ सिह ] 
फोनोआफका आविष्कार असेरिका निधासी एडिशन साहवने 
१८७६ ई० के आस-पास किया था। आजकल जितने फोनोमाफ 
देखनेमे आते हैं उन सबका श्रेय उन्होंको है। परंतु कहते हैं 
अंब्से हजारो बषे पहल्ले चीनवाले फोनोग्राफ बनालेते थे। 
धात सच दो सकती है। आचीन कालमे चीनके लोग बढ़े बुद्धि- 
सान थे। छापाखाने का भी आविष्कार चीन वालोने कर 


( २७ ) 


जिया था। परन्तु इससे क्या? चीनके आदविष्कारोसे 
दुनियाकों कोई लाम नहीं पहुँचा । 'चीनंके आविष्कारक 'चीनके 
वाहर नहीं पहुँच सके । वहीं उनका जन्म हुआ और वहीं उनका 
अंत हो गया । पर उनकी कहानी दिलचसप है। 'चीनवालोने 
फोनोग्राफका आविष्कार कैसे किश ९ यह हम नीचे बताते है-- 


कोई तीन हजार वे पहल्लेकी चात है। चीन देशका एक 
सूबेदार राजधानीसे करीव दो हजार कोसकी दूरीपर रहता था। 
एक वार उसको चीनके राजाके पास एक गुप्त समाचार भेजनेकी 
जरुरत पड़ी । उस समाचारका भेद खुल जानेपर राज्य की भारी 
हानि होनेका एक भय था। इसलिये किसी दूतके जरिये कहलाना 
या चिट्ठी लिखकर भेजना ठीक नहों था। कई कारणों से वह 
अपने सूवेसे हटकर राजधानीकों जा भी नहीं सकता था। अन्तमें 
उसने घहुत सोच-विचार कर एक सन्दूक तैयार किया । जो कुछ 
उसे कहना था, उसी सनन्‍्दृकमे उसने कद्द दिया। राजानें ज्यों दी 
उस सन्दककों खोला, सूवेदारकी सारी वाते सुनाई पड़ने लगीं । 
इतना दही नहीं, वह अगवाज सूवेदारकी आवाजसे बिलकुल 
मिलती-ज्ुलती थी । 


यहाँ तुम यह पूछ सकते दो कि उसने चिट्ठी क्यो नहीं लिखी 
सन्दृकमे अपनी आवाज भरकर क्यो भेजी ? चिट्ठी शायद इस 
लिये नहीं लिखी कि उसे डर था कि कोई दूसरा न पढ़ ले या 
किसी दूसंरेके दथ चिद्ठी न लग जाय। ओर सनन्‍्दूकसे आवाज 
निकालनकी तरकीव कोई जान नहीं सकता था। जो हो, यही 
फोनोमाफके जन्मकी आदि कथा कही जाती दै | 


चीनमें इस तरह समाचार भेजनेका रिवाज खूब घढ़ा। 
लड़ाईके दिनेप्मै दुश्मनोंपर भेद खुल जानेके डरसे गुप्त समाचार 
इसी तरह भेजे जाते गें। चीनकी पुरानी कितावोमे इस समा- 


( शे८ण ) 
चारके भेजनेका जिक्र पाया जाता है। यहॉतक कि सन्‍्दूकके 
बदले तांबेके छुड़मे भी शब्द भरकर सेजे जाते थे 
चीन ही नहीं, प्राचीन सिश्र देशवे भी लोगोंको यह चार्त 
मालूम थी। वहांकी 'मेप्तन' नामक कत्रोसे किसम्र किसमके गीत 
आपही सुन पड़ते थे । 


योरोपवाल्ले बहुत पदलेसे बोलनवाली कलके बनानेकी 
फिराकमे थे। १२६४ ई० में “राजरवेकन” नामक एक आदमीने 
लोहेकी एक मूर्ति बनाई थी। उसमे कुछ ऐसे पुर्ज लगे के य 
बह बोलती थी। इटलीमे १४८० ई० के आसपास “पार्ट! नामके” 
एक मनुष्यने नल मे आवाजको केद कर.लिया था। जब वह 
अपने नलसे मनुष्यकी आवाज निकालता था, तब लोग अचस्मे 
मेआ जाते थे। १६६६ ई० में जमनीके एक डाक्टरने इसी 
तरह बोतलमे शब्दोको बन्द कर रखनेकी विधि निकाली थी। 
१७४५१ इ० में 'लिओनाड हीलर”ः नामका गणितका एक जबर- 
दूसृत विद्वान हुआ । उसने 'बोलनेवाली कल” बनानेके बहुतसे 
डपाय सोचे और उन सब उपायोको उसने अखबारसे छपवा 
दिया। उसीके बताये नियमोके अलुसार कुछ वेज्ञानिकोनि 
मिलकर १७६७ ३० में एक बोलनेवाली कलका आविष्कार 
किया। उसके बाद १८५६ इं० में कोर्निंग नामके एक जमेनने 
एक अद्डरेजकी सद्दायतासे एक कल बनाई जो तबतककी वनी 
सभी फलोसे अच्छी निकली । आजकलका फोनोग्राफ इसी कलका 
सुधार हुआ रूप है । 

इसके बाद “एडिशन! साहबका फोनोप्राफ बना । जैसा कि 
ऊपर लिख चुके हैं, वही उसके आविष्कारक सममे जाते हैं। 
धंढिशन”ः साहबने फोनोआफ केसे बनाया? इसकी भी 
विचित्र कहानी है :-- 


( २६ ) 


१८७६ ई० की वात है, वे टेलीफोनमे कुछ जरूरी सुधार 
कर रहे थे । आवाजका बहुत कॉपना दूर करनेके लिये वे टेलीः 
लके किसी वारीक हिससेमे एक सुई डाल उसे उँगलीसे 
दवाये हुए थे। एकाएक सुईफकी नोक्से उन्हे एक प्रकारकी आवाज 
निकलती हुई मालूस पड़ी! बस, उन्होंने समझ लिया कि सुई 
की भददसे आदमीकी आवाजकी तसवीर खींची जा सकती 
है और उसी तसूबीरपर सुई फिरानेसे घबही आवाज़ फिर 
पैदा की जा सकती है। बस, उन्होंने फोनोमाफ बनाकर तैयार 
कर दिया। फोनोग्राफ्से आवाज निकालनेके लिये पहले तबेको 
हाथ्से घमाना पढ़ता था। वादकों घड़ीके समान उसमें कल- 
पुर्जे लगाये गये, जिससे अब वह खुद घमता है। पर अब तो 
बिजलीके वलपर भी फोनोभाफके ते घ॒माये जाते हैं। पहले 
फोनोमाफोंमे भी. खरावियाँ थीं और सुननेबालैको अपने फान- 
में एक रवरकी नली लगानी पड़ती थी। उससे सव लोग आवाज 
नहीं सुन सकते थे। यह ऐव दूर करनेके लिये उससे भोपू 
लगा। पर अब तो विना भोपूके भी आवाज निकलती है। 


फोनोआफके वारेमे अभी वहुतसी चवातें सोची जा रही' 
हैं। कुछ लोगोंका खयाल है कि इससे एक देशकी भाषा दूसरे 

बालोको वड़े सजेमें- सिखाई जा सकती है। यदि 

नोप्राफमें एक दिनका पूरा पाठ भरकर दर्जंमे लगा दिया 
जाय, तो मासटरकी जगहपर लड़कोंको वही पढ़ा सकता है। 
हँगरीमे 'मीकीफोनः नामकी एक कल बनी है। यो देखनेमें 
जान पड़ता है कि वह एक छोटी-सी घड़ी है। घड़ी 
हीकी भांति उसमें चाभी भी दी जाती है। एक जार चाभी 
देनेसे उसमे १९ तबेतक वजते हैं। एक फोटोफोन भी निकला 
है। उसमे वोलनेवालोकी भी दिखाई पड़ती है और 


( ३० ) 


बोलता हुआ सिनेमा शायद तुप्ने देखा ही है । यह दालका 
आविष्कार है। इससे सिनेमा जहाँ पहले 'चलती-फिर्ती 
ज दिखाई पढ़ती थीं, बहां अब आवाज भी सुनाई 
ैती है । 


अभ्याम 
( १ ) फोनोग्राफके आविष्कारके बारेसे क्या जानते हो १ 
( २ ) फोनोग्राफा आविष्कार किसके द्वाग और किस सनमे क्रिया 
गया बताओ । 
( ३ ) फोनोमाफक़े अविष्कारमें क्रश कितने परिवततन हुए हैं?” समम्काओ 
( ८) क्या फोनोआरफ झादि आविष्कार भारतके लिये छामदायकर 
है ? यदि हैं तो केसे ? 
(० ) आधुनिक नवीन आविष्कारोने भारतको आयिक स्थितिपर क्या 
प्रभाव डाला है ? 
( ६ ) भीति-भाँतिके चेजश्ञानिक आविष्कार भारतको उन्नति-शिखरपर 
लेजा रहे है, समकाओ। 
( ४ ) पर्यायवाची शन्द लिखो-- 
। आविष्कार, सुवेदार, जिक्र, दिलचए्प । 
( < ) आविष्कारपर एक निवन्ध तेयार करो । , 





६---ज्ञान स्रोत 
[ ज्ञे० पं० नाथराम “ शहर” ] 

( स्ूगीय प० नाथूराम “हार” शार्माका जन्म चेत्र शुक्क ५ स० 
१९१६ वि० में हखुआगज, अलीगढ में हुआ था। “शहुर' जीको 
गणना आधुनिक खड़ी बोलीके श्रेष्ठ कवियोंमें है। करे सस्याओसे 
आपको कविराज, भारत-प्र्नेन्दु, कविता-कामिनी-कान्त आदि उपाधिया 
प्राप्त हैं। आपकी दिखी हुईं शबर-सरोज, अथुराग-रल, गर्भरप्डा 


( ३१ ) 


'रहत्य, वायसविजय आदि अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं इसमें 
अनुराग-रन एक महत्व पू्े काव्य है। ) 
श् (१५ 

कब कौन अगाथ पथोनिधिके उस पार गया जल्लयान बिना) 

मिल प्राण, अपान,'्उदान रहें, तने न सम/न सबव्यान विना।॥ 

कहिये भर व-ध्येय मिला किसको, अधिकन्प, अचंचल् ध्यान विना। 

कवि 'शट्कगुर! मुक्तिन हाथ लेगी, श्रमनाशक तिमेल-ज्ञान बिना ॥ 
(२) 

घढ पाट अचण्ड प्रसाद भरे, कपटी जन जन्म गमाय गये। 

रण रोप भयानक आपससे, सट केबल पाप कमाय गये ॥ 

धन, धाम, विसार धरातलमें, धनवान अंसख्य समाय गये | 

'कचि “शक्भए” सिद्धि सनोरथ की, जड़ शुद्ध सुवोध जमाय गये ॥ 


(३) 
उपदेश अनेक सुने सन को, रूचि के अनुसार सुधार चुके | 
धर ध्यान यथा विधि सनन्‍्त्र जपे, पढ़ वेद्र पुराण विचार चुके ॥ 
गरु गौरव धार सहन्त बने, घन धाम छुटुम्ब विसार चुके। 
ऋषि 'श्टरः कान किन लत हर हि मल मार चुके॥ 
(8 


निगमागम तन्‍्त्र पुराण पढ़े, भतिवयाद प्रगल्भ कहाय खरे। 

रच दम्भ अपद्यध पसार घने, चन चचक घेष अनेक घरे॥ 

विचरे कर पान श्रमाद सुरा, अभिमान हलाहल खाय मेरे। 

कवि 'शझ्ढुए सोह सहोदधि से, वकराज विवेक विना न त्तरे॥ 
(४) 


गुरु गीरव द्वीन कुचाल चलें, मतभेद पसार प्रपंच रचें। 
दिन-रात मनोमुख मृढ़ लोड़ें, चहुंओर घने घमसान मचे॥ 
ज्ञत वन्धनके सिस पाप करें, हठ छोड न हाय लवार लचें। 
कवि श्र! सोह महासुर से, विरक्षे जन पाय विवेक बचे॥ 


( ३3२ ) 
(६) 
तन झुन्दर रोग बिह्दीन रहे, मन त्याग उम्रग उदास न हो ॥ 
मुख धर्म-प्रसंग प्रकाश करे, नर-मडल' में उपहास न द्वो॥ 
'घनकी महिमा भसपूर मिलते, प्रतिकूल मनोज-विलास न द्वो। 
कवि 'शद्भुर! ये उपभोग वृथा, पद्ुता प्रतिभा यदि पास न हो ॥ 
(७) 
दिन रात समोद विलास करें, रस-रंग भरे सुख साज बने | 
शिरधार किरीट कृपाण गद्दे, अवनी भरके अधिराज बने ॥ 
अनुकूल अखंड अताप रहे, अविरुदूध अनेक समाज बले। 
कवि “शद्दुरः बेमव ज्ञान बिना, सवसागर के न जहाज बने ॥| 
अभ्यास 

( १) ज्ञान खोतकी प्रमुख शिक्षाओका वर्णन करो १ 
( ३ ) अथे सममाओ * 

निगम .,. विवेक बिना न तरे | 
( ३ ) समास बताओ-- 

पयोदधि, अमनाशक, महावन | 
(४ ) सन्धि-विच्छेद करो । 

सहोद्धि, निममागम, धरातल । 
(५ ) पर्यायवाची शब्दोंको बताओ-- 
' अविकत्प, मिस, विरक्त, मनोज, विलास | 
(६ ) ज्ञान खोतने ससारकी निस्सारिता दिखलाई गई है? 

सममाओो । 
( ७ ) निम्नलिखित पक्तिके मुश्य-भावकों समकाओ --- 

कवि “शादइर” वेभव * न जहाज बने । 
( ८ ) 'ज्ञानपर एक छोटासा निवध तैयार करो ? 


री 





( ३३ ) 


१०--मिद्ठीका तेल 


[ लै०--प्रो० हरनारायण वाथम एम- ए० ] 


प्राय पचास वर्षसे मिद्ठीका तेल मूगर्भसे निकाला जाने 
लगा है ओर इतने ही दिनोमे इसका व्यवहार बहुत विसतीएंः 
हो गया है। सन्‌ १८४५६ ई० से कनेल ड्रेकने पहले पहल इसका 
कुआ अमेरिकामे खोदा था। इसके पहले भी कहीं कहीं इस एथ्वी 
पर मि्ठीके तेलकी खाने लोगोंको मालूम थीं। कद्दी-कहीं तो 'चर- 
बाहे इसके सथानको जानते थे, वहाँ वे अपने जानवरोको जे जाते 
थे और इस तेलकी जलाकर अप्नि तापते थे। इसामसीहके पहले, 
काकेशस पहाड़पर पारसियोका एक मद्रि था, वहों भूमिके नीचे. 
इस तेलकी खान थी, उसीके ऊपर एक छेद भी था, वह 
इस तेलकी वाष्प अर्थात गैस निकला करती थी, जिसको लोगो- 
ने जला रखा था ओर वह दीपकके रुपमे बिना किसी तेल या 
जला करती थी। अभिके उपासक पारसी लोग इसे 

पूजा करते थे। पुराने समयमें मिश्रेके लोग भी इसका व्यवहार 
करत थे। चीन और जापानमे भी इसकी खानोसे पुराने तरीके- 
से काम लिया जाता था। गेलैसिया और रुमानियाकी पुरानी 
पुसतकोंसे मालूम द्वोता हैँ कि इसके पहले भी मनुष्य इस तेलको 
भृूमिसे निकालते थे, परन्तु इस सप्य इसकी विशेष खालनें, जिनसे. 
दुनिया मरको तेल पहुँचता है, यूनाइटेड-सटेट्स अर्थोत अमेरिका 
रुस, रुमानिया, हिला ५: » हेगरी, ब्मों, आसाम, जापान, 
जमनी, पर्राशया हैं। इन सथानोको छोड़कर ओर भी 
अनेक सथान हैं जहाँ कि यह तेल भरा पडा है ओर जहाँ अभीतक- 
हाथ भी नहीं लगाया। यदि पृवाक्त खानें, जिनसे 

सारी दुनिश्वाकों इस समय तेल निकलता है, खालो दो जाय तो. 


( ३४ ) 


भी ऐसी खालें भरी पड़ी दे कि जिनसे दुनिया भरको सैकड़ो, 
“हजारो वपोंके लिये तेल पहुँच सकता है। आजकल हर 
'सप्ताहमें १० लाख टन तेल पूर्व क्त खानासे निकाला जाता है । 


आरम्भसे यह नहीं मालूम था कि इस तेलका व्यवद्यार 
प्रकाश उत्पन्न करनेके लिये ह|गा। परन्तु जबसे यह मालूस 
हुआ तबसे अभेरिकाके विज्ञान बेताओने इसकी ओर ध्यान 
दिया ओर इसो मिट्टीके तेशसे अनेक अकारकी बघतुओको 
निकालकर थे ससार भरमे वेचते है, जिससे उनके देशकी 
आर्थिक उन्नति हुई और उन सब चीजोके बनानेके तरीकोके 
निकालनेमे उनके देशमे विद्यार्का उन्नति हुईं। परन्तु अभीतक 
थे सिथर नहीं कर सके कि यह तेल भूग्भमे किन-किन वसूतुआं'- 
से बनता है। इनमेसे वहुतोकी राय है कि यह तेल जानवरों 
आर बृक्षोके उन मृत शरीरसे बनता है जो भूमिके नीचे दव 
गये थे । इस बातकों साचित करनेके लिये एडूुलर नामक 
विज्ञानवेत्ताने जीवोकी चर्बसे एक ऐसी बसूतु निकाली है जो 
बिलकुल मिट्टीके तेलके समान है । 


मिट्टीफे तेलसे अनेक प्रकारके काम हुए और अभीतक 
नये-नय काम निकलंते आने है और इसका खच्चे दिन-दिन 
बढ़ती द्वी जाता है। यहॉतक कि ४० वर्णमे इसका खर्च १६ गुना 
बढ़ गया है । इतना व्यवहार दोनेषपर भी कुछ मनुष्ियोका ऐसा 
विचार है कि अभी तो इस नये उद्योगका आरम्म हुआ है। 

जिस सथानमे इसकी खानें होती हैं बह सथान एक काले 
जले हुये जंगलके समान द्वोता है। वद्ाँ सव चीजे काली होती 
है, यहांतक कि आकाश भी इसके घुएसे काला हूं। जाता है। 
यह तेल भूमिके बहुत नीचे भागमे बालू और जलके संग 
मिला रहता हे और वहॉँसे पम्प ओर नल्ोके जरियेसे निकाला 


( 2४ ) 


जाता है, अथवा वड़े-बड़े डोलोके जरिये। ये नल मूमिमे गाड़ 
दिये जाते है और जब इनकी लम्बाई १००० से २४५०० फीटकी 
हो जाती है, तव तेलकी सतह मिलती है। फिर इतने नीचेसे 
तल ए जिन और पम्पके जरिये ऊपर लाया जाता है। 


जिन खानोसे तेल अधिक व'लू सहित निकलता है, वहाँ 
पम्प और नल नहीं काम देते; क्योकि बालू नलोसे भर जाता 
है, इसलिये वहाँ डोलोका व्यवद्वार होता है। यह डोल ४० या' 
६० फीट लम्बे नलके समान होता है। एक डोलमे लगभग २७४ 
शेलन एक गेलनमे ६ चोतले होती हैं) तेल आता है । यो 
यह २४ घण्टोसे २००००० गेलन निकल लाता है। इस प्रकार 
जब तेल कुआसे निकाला जाता है तव पहले वह एक छुण्डसे 
सिथर होनेके लिये रखा जाता है। वहा सब वाल इत्यादि 
चैठ जाती है, तव साफ तेल दूसरे तालावमे भरा जाता है । 
कभी-कभी आरम्भहीसें जब नल तेलतक पहुँचता है, तव तेल 
इतने जोरसे ऊपर उठता है कि फिर वह हआ से नहीं रहता, 
उसकी धार बड़े भयंकर रुपसे ऊपर आती हैे। वह मूमिमे 
ऊँची उठ जाती है और कभी-कर्मी उसमे अभि भी लग 
जाती है. तो उसका रुप ओर भयकर हो जाता है। कमी- 
कभी तेल इस भ्रकार थोड़े ही समयतक निकला करता है, 
पर कभी कभी तो साल साल भर वराबर निकला जाता 
है, जैसे बाकूमे अभी तक जारी है। इस अवसथामे तेलवालो 
को वड़ी हानि पहुँचाती है। जब खच्छ तेलके ताल।व भर जाते 

तब बहोसे तेल नलोसे सफाई के कारखानोमे पहुंचाया 
जाता है, वहा मभकोके जरिये साफ दोता है और कई अशो 
से विभाजित किया जात, हैं, जैसे फेरोसिन, पैराफिन, 
ओट्रोल इत्यादि ! 


( डेह ) 
ये सब अंश बड़े महत्वके है ओर इनसे बढ़े चढ़े काम्र लिये 
जाते हैं। यह असंख्य घरोंको प्रकाश पहुँचाता है। जब 
समुद्रभे तूफान आता है तब मिट्टीका तेल डाल दिया जाता 
है। इसके पढ़नेसे समुद्र शान्द दो जाता है । घहुतसे लोक 
मच्छरो और अनेक अकारकी बीसारियोंके कीड़ोको मारनेके- 


अभ्यातत 

( १ ) मिट्टीका तेल अन्य तेलोले ढिस प्रकार मिन्न है 

(२ ) फह्ा-कद्दा मिट्टीका तेल पाया जाता है ? 

( ३ ) ससारमें विशेषकर इसका क्या उपयोग होता है 

(४ ) साफ करनेपर इसकी कितनी कितनी किसमें बन जाती है? 

(५) मिट्टीका तेछ किस प्रकार खानसे निकाछा जाता है और किक 
प्रकार साफ किया जाता है १ 


कनिननसलतर 


११--अज्भर ओर रावण 
[ ० प॑* रामचरित उपाध्याय ] 

( पन्डित रामचरितजी उपाध्यायका जन्म एक विद्वान सरयुपारीण 
ब्राह्मण वहशमें विक्रम संवतद्‌ १९२९ कार्तिक कुष्ण चतुर्थी रविवारको 
गाजीपुरमें हुआ था। स० १९६४७ में उपाष्यायजी काशीमे आये और 
' वहीं महामहोपाध्याय पण्डित शिवकुमार शाज्ञीके गृहपर रहकर पाँच 
छा वर्षों तक विद्याध्यवच करते रहे। इनकी बुद्धि विलक्षण थी। इससे 
व्याकरण और सादित्यका बहुत अच्छा ज्ञान सहज हीमें हो गया। उपा- 
ध्यायजीका गाईंस्थ्य जीवन भत्मन्त ही सादा है। इन्हें खन्त्रता बहुत: 
प्यारी है। इन्होंने गाजीपुरमें एक सत्कृति पाठ्याला और सनातन धर्म 
समाकी स्थापना की है ! 


( ४8७ ) 
अंगद 


असम निवेदन है कुछ आपसे, 
सुन उसे उरमभे धर लीजिये। 


अहण है करता जिस युक्तिसे 
मधुप सारस-सार सहषे हो ॥ १ ॥। 
जनकजा रघुनायक हाथमे , 
घुस्त जाकर अपेण फीजिये। 
पर-वधूजन से रहते सदा, 
अलग सनन्‍्तत सन्त तमीचर | २॥ 
कुशल से रहना यदि है तुम्हे, 
इनुज | तो फिर गवेन कीजिये । 
शरणमे गिरिये रघुनाथके, 
व लि निबेलके बल केवल राम हैं॥२॥ 
दुखद जनकात्मजा, 
तुस्त दूर उसे कर दीजिये। 
सुखद हो सकती न उल्नकको, 
नय-विशारद । शारद-चन्द्रिका ॥ ४ ॥ 
चहुत वार हुए विजयी सही, 
पर नहीं रहते द्विन एक से। 
सम्दलके रहिये, अब आपकी, 
ग्रह दशा न दशानन ! है सली ॥ ४॥ 
खकल की करिये शुभ कामना, ' 
सपदि युक्ति. वही उप ! सोचिये। 
न अब भी जिसमें करना पड़े; 
कठिन सन्नर सह समेशके ॥ ६॥ 


( इ5 ) 
स्वमनको वशमें रखिये सदा, 
अनय से पर बसूतु न लीजिये। 
नुप ! कभी छुखदायक है नहीं, 
सुत, ससा, धन, साधनके बिना ॥णा, 
समय है. अनसोल, कुकसे से, 
तुम विनष्ट करो उसको नहीं । 
दूतुज है! जगमे सुखदायिनी, 
नियमहीन मही न महीप को ॥ ८॥ 
परम चीर चढ़े रघवीर हैं, 
तब पुरी पर बारिधि बांधके। 
क्षितिप ! आकरके रिपु-राज्यमें, 
तनिक भीरु कभी रुकते नहीं ॥ ६ ॥. 
कवि. गुणी, बुध, बीर नयज्ञ भी, 
सममिये मनमे निजको खथम | 
पर बिना कुछ काय्ये किग्रे कमी, 
न मन सोदक भोद-कलाप है || १० ॥॥ 
सब सुराछुर है बस आपके, 
करगता यदि द्वो सब सिर्द्वियां। 
तद॒पि है दुजेश्वर | जानना, 
लिज विनाशक नाशक रासको ॥१ श। 


अखिल लोक दृपेश्वर रामको, 
सममके उनसे मिलिए अभी । 
यह पुरी “रणाग्निमें 
दूनुज | होम न दो, मनमें डरो ॥१श॥ 
रावण 


सुन कपे ! यम, इन्द, इुंबेरकी 
न हिलती-रसना मम- सासने | 


( ३६ ) 


तद॒पि आज सुमे करना पडा, 
मनुज सेवकसे बकवाद भी॥ १॥॥ 
यदि कपे | मस राक्षस राजका, 
सतवन ठुम्से न किया गया। 
छुछ नहीं डर है---पर क्यो बथा, 
निलेज | मानव सान वढ़ा रहा ॥रा। 
तनण होकर भी सम मित्र का, 
शठ । न आकर क्यों मुम्से मिला । 
उदरके वश दो किस भाँति तू, 
नर सहायक हाथ | कपे । हुआ ॥३॥ 
चसन भाजन ले मुमसे सदा, 
विचर तू सुरूसे मम राज्यमें | 
उस नृपात्मजके छवित दे वृथा, 
छुखद जीव न जीवनके लिये | ४ ॥ 
ठुम विना करतूत वका करो, 
बचन वीर सुनो ! दम वीर हैं। 
* रिपु-विनाशक यज्ञ किये विना, 
समर-पावक पा चक्ते नहीं॥ ४ ॥ 
बल सुनाकर तू शठ) शम्का, 
पच भरे, पर में डस्ता नहीं। 
अदि भयातुर हो करके वता, 
कव तिरोहित रोहितसे हुआ ॥ ६॥ 
कवल-दायकके गशुण् गाने, 
निरत तू रद्द वानर ! सव्वेदा। 
समर है. सुख-दायक शुरको, 
कब रुचा रण चारणको मत्रा (जा, 


ना 


छु० ) 


जनकजा हत चित्त हुआ सही, 
सद्पि तापससे कम में नहीं। 
मधुर मोदक क्या पच जायगा, 
कपि | सवा सन बामन-पेटमे ॥ ८ | 
लड़ नहीं सकता मुझसे कमी, 
तनिक भी ठप बालक खप्नमे | 
कब, कहाँ कह तो किसने लखा, 
कपि ! लवा रण वारणसे मत्ा ॥६॥ 
यह असम्सव है यदि राम भी, 
सभर सम्मुख राचणसे करे। 
कह कपे | उठ है सकती कमी, 
यह रसा बक-शावक चोंचसे || १० ॥ 
निज हो, बाहकी, निज नाथके- 
झुयश-गान करो, कपि-जाति हो ! 
जगतमें. दिखलाकर पेटको, 
बचन वीर ! न वीर बना कभी ॥११॥ 
भम नहों ह्वित-साधक जो हुआ, 
चद्द न हो सकता परका कभी | 
कपट रूप बनाकर शभका, 
कपि ! विभीषण भीषण शत्रु है॥१२॥ 
मर मिट रणमें, पर रामको, 
हम न दे सकते जनकात्मजा। ५ 
सुन कपे जगमे घस घीएके, । 
सुय्श का रण कारण मुख्य है ॥१३॥ 


चतुरता दिखला न व्यथ तू 
रसिक है रणके हम जन्मसे || 


( ४१ ) 


रुक नहीं सकते सुनके कभी; 
वचन-चत्सल चत्स | लड़े बिना ॥१श॥। 
। अभ्यास * 
: € १ ) अन्द और रावणका सवाद सक्षेपम बताओ ? 
( २ ) निम्नलिखित पक्तिके मुझ्य भावको पूर्ण रीतिसे समरकाओ-- 
जप | कभी सुखदायक, .,. साथनके बिना । 
( ३ ) आदके वचनमे नीति और जान दोनो सम्मिलित हैं। समक्ताओ ? 
( ४ ) निम्नाकित शब्दोके अर्थ चताओ--- 
तमीचर, मधुप, दनुज, जनकात्मजा, श्षितिप 
( ० ) समास बताओ :--- 
नय विगारद, रिपुराज्य, दनुजेय्वर, रघुनाथ-रणाग्नि 
£ ६ ) पर्यायवाची शब्द दो --- 
नपात्मण, जनकात्मजा, चकशावक, सुरासुर, भोद-कलाप 


विन लत 


१५--भारतीय संस्कृति 


[ ज्ञे०--श्रीमती चन्द्रावती लखनपाल एम० ए० ] 
ययपि “संसूकृति” ओर “सम्यता” ये हों शब्द मिलते जुलते 
अतीत होते हैं, तथापि ये एक दूसरेसे भिन्न हैं। “संसक़तिः किसी 
जातिके मानसिक, आत्मिक तथा थुद्धि सम्बन्धी विंकासको 
सूचित करती है ओर “सम्यताः भौतिक विकासकों। 'संसकृति? 
जीवनके आदश/पर प्रकाश डालती है। थे ही आदरशे, जिनका 
आधार संसकृृति है, जच जीवनमें क्रियात्मक रुपसे प्रकट होंते 
तो उन्हे सभ्यता? का नाम दिया जाता है। किसी जातिके 
लौकिक और पारलौकिक, दोन' प्रकारके जीवन बितानेका ढग 


2 


( ४२ ) 


ओर तद्दिषयक विचार दी उसकी ससकृति है। उस जातिके 
अन्तरतम भावो, जीवन सवंधी विचारो और उच्च आदश्शोंको 
भी संसूकृति ही कहा जा सकता है। 'सभ्यता” केबल ससकृति 
रूपी बीजका विकास है। यदि किसी जातिकी श्रेष्ठताकी 'जॉच 
करनी हो, तो उसकी संसुकृतिका निरीक्षण करना आवश्यक है । 


भारतकी सस्‌कृति अन्य देशोकी संसक्ृतिसे भिन्न है। इसकी. 
$ भिन्नता ही इसकी विशेषता है। प्रारम्भिक कालसे ही भारतकी 
संसकृति उसकी अमूल्य निधि है। इस निधिकों पाकर जनक 
जैसे वैभवशाली सम्राट वैराग्य वृक्तिको प्रधानता देते हुये 
जीवन पय्येन्त साधु बने रहे । बृहत्‌ मौये साम्राज्यके अधिपति 
अशोक इसी निधिके बलपर आयु पस्येन्‍त एक साधारण भिन्ुक- 
कासा 'जीवन व्यतीत करते रहदे। इसी निधिकों लेकर बोढ्ध, 
भिज्लुओने अपना सन्देश सुनानेके हेतु ससारके फोने-कोनेमें 
विचरण किया । इसको पाकर ही मारतने इंजिप्ट, यूनान और 
इनके हारा समसृत यूरोपको सम्यताका पाठ पढ़ाया, भारत 
अपनी संसकृतिके कारण ही अतीत कालके गोरबकों ग्राप्त 
हुआ ओर उसी ससक्ृत्तिके बलपर दी यह देश आज़ भी गवेसे 
मस्तक ऊँचा उठा सकता है। अपने प्राचीन आदशोकि द्वारा 
ही भारत अबतक अपने असितत्वको बनाये रख सका है। 


भारतीय ससकृति जिन आदरशोंकी मनुष्यके सामने रखती 
है, वे घड़े ही विशाल, बडे द्वी गहरे है। पाश्वात्योका जीवन 
सम्बन्धी आदंश बहुत छिछला है पश्चिमका आदशे है “शरीर 
ही जीवनका आदि और शरीर ही जीवनका अन्त है? पर पूव॒ंका 
आदर है “शरीर आत्माकी उन्नतिका साधन मात्र है।” दोनोके- 
आदर्शों मे कितना अन्तर है। पर्चिममे जो जीवनका अन्तिम 
ध्येय है, वह सारतमें जीवनके अन्तिम उद्देश्यकी आप्तिका केवल 


९ ४३ ) 


एक सावन है। पत्चिम, शरीरका उपासक हे। शरीरोपासना , 
ही उसका अन्तिम घ्ये य है । किन्तु पूवें--विशेपकर भारत शारी- 
रिक उन्नतिको अपना उचित लक्ष्य नहीं बनाता। एक भारतीय 
इसलिये शारीरिक बृद्विध चाहता है कि उसका शरीर आत्मिक 
उन्नतिसें सहायक हो सके । शरीरकी उन्नति करते हुए आत्मिक 
विकास करना उसका अन्तिम उद्देश्य है। पश्चिमकी संसक्ृति- 
से आध्यात्मिक विकासके लिये सथान नहीं। आध्यात्मिक 
विकासके द्वारा ही जीवनमे आत्मिक शाति ओर सुख मिलता 
है। जो संसकृति आध्यात्मिक बिकासके सिद्धातकी अवद्देलना 
करे वह निश्चय दी जीवनकी एक बड़ी ही उपयोगी बसूतुकी 
उपेक्षा करती है। पाश्चात्य संसकृति सम्पूर्ण अज्लोके विकासके 
नियमका पालन नहीं करती । इसलिये बह. अधूरी है। किन्तु 
भारतीय ससृकृृतिके अन्दर शारीरिक और मानसिक दोनो 
प्रकारकी उन्नतियोको उचित सूथान मिलता है। भारतके आदशे 
अन्य देशॉके आदशों से कहीं अधिक पूर्ण और श्रेष्ठ हैं| 


* भारतीय संसुकृतिकी एक और उत्तम विशेषता जीवनकी 
सरलता है । उस सरलतामे ही भारतीय जीवनको सुन्दरता है। 
शआवश्यकताओकी नियमित श्खना, उनको बढ़ने न देना भार- 
तीयॉंका लक्ष्य है। किन्तु पाश्चात्योका उद्देश्य है. आवश्यक- 
ताओको बढ़ाते जाना | पश्चिममें किसी जातिकी उलन्नतिकी जांच 
उसकी आवश्यकताओकी सख्या से दोती है। जिस जातिको 
जितनी अधिक आवश्यकताएँ हैं, वद उतनी ही अधिक उन्नत 
मानी जाती है। इस उद्देश्यका परिणाम पश्चिमी जातियोके 
लिये बढ़ा मयदुर दो रहा है। उनकी आवश्यकताएँ दिन दूनी 
रात-चौगुनी रफ्तारसे चढू रही दैं। विलासिताकी बृद्विध चढ़ती 
जा रही है। शारीरिक सौंदर्य जीवनका अंतिम लक्ष्य बनाया 


( ४४ ) 


जा रहा है। सुथायी सुखके आधारमूत आत्माकों भुलाया जा 
रहा है। आत्मिक सुखका तिरसृकार किया जा रहा है। इसके 
परिणाम खरूप पाश्चात्य जीवन विषभय, पेंचीला और कृत्रिम 
बनता जा रहा है। इसके विपरीत भारतीय आदश, सरतता- 
का उपदेश देकर आत्म-चन्तन और आत्मिक सुखकी प्रांप्ति- 
का आदेश करता है। इससे जीवन शान्तिमय, सुखमय, सरल 
ओर स्वाभाविक द्वो जाता है । 


भारतका आदरशे है "जीयो ओर जीने दो” किंतु पश्चिन 
में जिसकी लार्द! उसकी भैंस” का सिदूर्धात द्वी कार्य कर 
रहा है। पूजीपति मजदूरोंकों जूटते हैं। बलवान निवेलोपर 
अत्याचार करते हैं । शक्तिशाली जातियां अशक्त जातियोपर आंख 
गढ़ाये चैठी हैं. जब अवसर मिलता है, वे उनका खून 'चूसने 
को तत्पर दो जाती है।' प्रत्येक अपने-अपने खाथ्थैसे रत है, 
और इष्ट सिद््‌घिके लिये एक दूसरेको निगलनेकों तैयार वैठा 
है। यह नजारा उसी “जिसकी लाठी उसकी मैस” के सिद्धांत 
का परिणाम है, जो आज योरोपके अन्दर बड़े जोरसे काम 
कर रहद्दा है। किन्तु “जीयो ओर जीने दो” के आदशेमें अमीर- 
गरीब, पूजीपति-मजदूर, वलवान और निवैल सबके लिये 
सथान है। भारतके आदशे के आअतुसार धनिकोका कत्तेज्य 
है कि वे गरीबोको भरपेट भोजन दे। चल्षचानोका घ्े है 
कि वह निवेज्ञोकी रक्षा करे। भारतके आदशेके अनुसार 
श्धद्दीन शत्रुपर आक्रमण कण्ला निन्‍्दलीय सममा जाता है 
किन्तु योरेपके सिद्धान्वके अनुसार जमनी जेसे बलशाली 
देशके लिये निरपयध, छोटेसे बेल्जियमकी तहस नहस 
कर डालना तनिक भी 'लजाजनक ओर निन्दनीय नहीं 
सममा जाता । योरोपका आदर्श है. “भेरी चीज तो मेरी है ही, 


( ४५ ) 


तुन्दारी चीज भी मेरी है ।” किन्तु भारतका आदशें कितना 
ऊँचा, कितना विशाल है---तुम्दहारी चीज तो तुम्हारी दी है, 
यदि आवश्यकता पड्े तो मेरो चीज भी तुम्हारी दी है” 
दोनो आदशोंने कितना भेद दै। पश्चिमका आदशे मलनुष्यकी 
लघु वृत्तियोकों लक्ष्यमे रखकर वताया गया है और इसका 
आधार खार्थ है। भारतके आदर्श सनुष्य-ससाज द्वी नहीं, 
आ्राणिमात्रको सम्मुख रखकर बनाये गये हैं और उनका 
आधार है नि खाये सेवा | 


अत्तः भारत और पश्चिमकी ससकृतिमे कोई समानता हीं 
नहों । दोनो एक दूसरेके बिलकुल विपरीत है। दोनोमे जमीन 
आसमानका अन्तर है | अनेक विदेशी जातियोने भारतीय ” 
सम्यतापर आक्रमण किये और उसकी संसकृतिको नष्ट करनेकी 
कोशिश की किन्तु उसको सदेव मुँहकी' खानी पड़ी। सबसे 
पहला संघर्ण यूनानी सम्यतासे हुआ । यद्यपि सिकन्दरने भारत 
का हिससा अपने अधीन कर लिया था, किन्तु वह भी भारतीय 
आदशोॉसे प्रभावित हुए विना न रहा। तभीसे दाशैनिकों ओर 
ताक्ष्चक विचारक भारतसे लगातार यूनान जुलाये जाने 
लगे । सिकन्दर खयं कई दाशेनिकोको अपने साथ ले गया। यह, 
भारतीय संसकतिके साथ विदेशी सभ्यताका पहला सघर्ष था। 


१९ वा शताव्यीमे भारतीय सम्यताको एक गहरी ठेस 
पहुँची । यह ठेस योरपकी सम्यताकी थी। योरोपकी सभ्यताका 
प्रसार भारतसे 'आंग्ल-जातिके द्वारा विशेष रुपसे इुआ है। अंग- 
रेजोने यहाँ देशी सापाको हटाकर विदेशी भाषाकों शिक्षाका 
माध्यम वनाया। शिक्षाका ढग विदेशी दो गया । देशके 
श्राचीन गौरवको लुप्त करनेके लिए घृणित ओर कुत्सित साधनो- 
का प्रयोग किया गया। देशके आदर्शों और देशके इतिहासके- 


( ४६ ) 


भद्दे चित्र खींचे गये, ताके भःरतवासियोंके हृदयोंसे जाती- 
यताके भाव उठ जायेँ। जातीयता और खदेश-प्रेमके लुप्त हो 
जानेपर कौन देश अपनी संसकृतिको बज़ाये रख सकता है। 


इस समय देशमें दो मद्दान शक्तियोका उन्द दो रहा है। 
एक है योरपकी सभ्यता और दूसरी ' भारतीय सभ्यता । 
भारतीय संसूकृति इस समय खतरेसें है। इसका भविष्य चड़ा 
ही अंघकार सय अतीत हो रहा है। अपनी संसकृतिकी रक्षा 
.फरनेकी आवश्यकता है। इस समय आचीन आदर्शाकी श्रष्ठता 
को पुनः सथापित करके मारतीयोमें अपने पूरे इतिद्ासके प्रति 
श्रद्धा और सम्मानके भाव उत्पन्न किये जाने चाहिये। आवश्य- 
कता है कि जातीयता ओर खदेश-प्रेमका फिस्से देश-नासियो- 
में अंकुर जमाया जाय। खदेशी शिक्षा और माठ्मापा 
प्रचार पुनः किया जाय | संक्षेप, भारतीयोमें भारतीयताका भाव 
भरा जाय। इन्हीं उपायोसे हमें अपनी खोई हुई निधि पुन- 
भ्राप्त हो सकती है। 

देशके सोभाग्यले आज इस प्रकारकी जाग्रतिका आरम्म 
हो गया है। किन्तु यह नवीन जाग्ृरति अपने शैशवकालमे ही 
है। इस देशके निवासियोकों शीघ्र दी अपने अन्द्रसे उस 
चिदेशीपनको निकल देना चाहिये, जिसकी गधने उसके रिव्य- 
प्रतिके छोटे छोटे कार्योकों मलिन कर रखा है। अपने देशके 
अनुकूल रीति रिवाजों, चाल-ढालोको अपनाकर ही बे सरल, 
झुन्दर, खदेशी जीवनको व्यतीत कर सकते है । 

' अपनी सभ्यताके पुनरुत्थानके लिये यह परम आवश्यक 
है कि प्राचीन संसकृतिको पुनरुलीबित किया जाय। - भारतको 
अपना असितत्व बनाये रखनेके लिये भी अपनी संसुकृतिको 
जीवित रखना परम आवश्यक है | भाणकी संसारकों तमीतक 


( ४७ ) 


जटूरत है, जबतक वह 'अपनी संसकृतिकों सुरक्षित रख सकता 
है। असख्य जातियोके लिये जो इसके सम्पकंमे आर्ट, यह अप- 
रिमित सुख ओर आत्मिक शान्तिका भरता वनता रहा है । 
इसके उच्चतम विचार ओर आदशे आज भी जगतके आध्या- 
त्मिक जीवनपर शासन कर रहेहै) अपने दाशंनिक विचारो 
आर उच्च 'आदशेकि चलपर ही भारत जगदूगुरु चना था)! आज 
भी यदि संसारभे इसकी फोई गणना है तो वह इसलिये नहीं 
कि यहॉँकी जन सख्या सबसे अधिक है या सबसे अधिक 'अन्न 
शदा होता है। बल्कि इसलिये है कि यह गौतम, कंणा्, पत- 
जंलि और यासऊरक़ो जन्म देनेवाला है और ऐसी निराली, 
अनुपमेय संसकृतिका उद्धव स॒थान है | इसी कारण आज भारत 
गियी अवसथामे भी अपना मसतक ऊँचा किये हुए हैं। अपनी 

ससूझ्ुतिकों लेकर ही यह जीवित रहू सकता हैं ओर तभीतक 
विश्वकी इसकी जरुस्त हैं। इसलिये संसक्ृृतिकी रक्षाका प्रश्न 
भारतके लिये जीवन ओर मरणका प्रभ । इसकी रक्षा फरना 
प्रत्येक भारतीयका प्रधान कत्तेब्य है | 

अभ्याप 

(१) सम्यता और सरझतिम फ़्या अन्तर है 
4 २) जासतीय सभ्यता और पाध्याल सन्यताम जमीन आसमानका 

ध्न्तर है टसे गिद्ध प्रो ? 
(३ ) नाख्तीय सम्यताड़ी विभिजता ही. उसकी जिशेपता है, दस 

ऊथ्नी पुटि करो । 
( ४] भारतीय सम्यता और पाइ्यात्य सम्यताका प्रथम सघप कब 

और ज्सिमे हुआ २ 
५) था पात्मिक उनति भीर शारीरिक उनतिसे क्‍या अन्तर हैं ? 
सममाशी । 


( ४८ ) 
(६ ) 'जीयो और जीने दो” तथा “जिसकी लाठी उसकी मैंस” का 
प्रयोग उपयुक्त पाठ्म किसके लिये आया है। 
( ७ ) भारतको अपना प्राचीन गौरव पुन प्राप्त करनेके लिये क्‍या 
करना चाहिये ? 
(८ ) पाइचात्य ठेशंमि केवल शारीरिक उन्नति प्रमुख है किन्तु भारतमे 
आध्यात्मिक । सममझाओ ? 
( ९ )) पर्यायवाची शब्द दो--- 
सभ्यता, सस्कृति, पारलौकिक । 
१३--छवि 
लेखक--ठाकुर गं।पालशरुण सिंह 
( भाषका जन्म पौप शुक्ल १९४८ स० में हुआ था। आप रीवा 
अन्तर्गत नईंगढीके सुप्रतिष्ठित इलाकेदार हैं । सस्झ्त और अग्रेजीका भी 
आपको धब्छा ज्ञान है । आप एक अच्छे कवि, विद्या व्यसनी,-“उदारमना 
और सहृदय है। स० १९८२ में आप अखिल भारतवर्षीय कवि सम्मे- 
लछनके सभापति हुए थे। आपकी अधिकाश कविताएं ईश्वर सम्बन्धिनी 
हुआ करती हैं। हिन्दी-ससारकों आपसे बडी वडी आश्ाए हैं। ) 
(्‌ १ ) 
मंजुल मरयंकमे, मयंक मुखी आननमें 
वैसी निष्कत्क कान्ति देती न दिखाई -है। 
हग भाप जाते देख पाते हम केसे उस्ले, 
ऐसी प्रमा किसने प्रभाकरसे पाई है ९ 


न्यारी तीन लोव से है प्यारी सुखकारी भारी, 
सारी सनोहारी छटा उसमें समाई है। 


( ४६ ) 


जिसको विलोक फीकी शरदजुन्हाई होती, 
वह सन भाई छवि किसको न भाई है ९ 
! (२ ) 
नित्य नई शोभा दिखलाती मढ्माती वह, 
किसमें सलोनी 'सुचराई कहो ऐसी है ९' 
केतकीकी कुन्दकी कठम्बकी कथा है फोन, 
कल्प लतिकामे कहाँ कान्ति उस जैसी है ९ 
रतिमें रमामें रमणीयता कहाँ है बसी ९ 
कनक-लतामे कमनीयता न वैसी है। 
॥ वेद चादर छद्दराती है छबीली छटा, 
अहा ! वह सुध' सजीली छवि कैसी 'है ९ 
(३) 
' मुपमा ,उसीकी अवलोकके 
रूप-सुधा पीकर चकोर न अघाते है । 
घनकी घटासे नव सनिरख उसीकी छंटा, 
मयूर होते मोद मद माते है।' 
फलोमे उसीकी शोभा देखके मिलिन्द-बुन्द, 
समाते “शुन-गुन” गुन गाते ह्ले | 
दीप्यमान ठीपकसें देख चद्दी छ 
प्रेमसे अ्रफुल्लित पतग जल जाते हैं। 


(४) 
उसको बिलोंक दामिनी है छिप जाती शीघ्र, 
अति मन भावनी भी भामिनी लजाती है। 
उसके समीप दीपमालिका न भाती जरा, 
मंजुमणि-मालिका भी नेक न खुद्दाती है॥ 


( ४० ) 
पेज हीनता मोतियोसे सद्दी जाती नहीं, 
उनकी इसीसे छिद जाती क्यो न छाती है ९ 
चह छवि देख-देख दृष्टि तृप्ति पाती नहीं, 
मानों खन्र प्रेमबश उसमे समाती है।॥ 
(४), 
कंज-कलिकामे न भरयंककी मनोज्ञता है, 
फोसलता कंजकी मर्यक ने न पाई है, 
्चस्पक-कलीमें न झुबंण की सुबर्णता है, 
म्पककी चारुता सुबणुंमे न आई है। 
'रनकी रुचिरतासे, मणिकी मंजुलतामे, 
एक दूसरेकी अभा देती न दिखाई है। 
सबकी निकाई छुघराई मे|ढदायी महा, 
ललित लुनाई उस छुविमे समाई है। 
(६) 
'तेजधारियोंमे है ऋशानुकाही मान बढ़ा, 
किन्तु भातु सबसे मद्दान तेजबान हे। 
पादपोंसे पारिजात पर्षतोमे)ं हिमवान, 
जाहवी मनोक्षताकी खान है। 
मओर-सा मनोहर न कोई खग रूपवान, 
फूल कौन दृसश़ गुलाबके समान है?| 
यथ्यपि सभी हैं उपमान इन्हे मान चुके; 
किन्तु उसछवि-सा न कोई छविमान है| 
(७) 
व्वन-उपधनसे,. सरोजमे, . सरोबरसे 
सुमत-सुमनमं. उसीकी। सुधराई दे। 


( ४१ ) 


न्चम्पक-चमेलियोमें, नवल+नवेलियोमे ._ 
ललित लताओमे भी उसकी लुनाई है ॥ 
र॑ग-रंगके विहृद्मोमे वद्दी पाई जाती, 
वही कान्ति-पुव्ज कुज-कुजमें समाई है ॥। 
जहां देखो वहोँ वही छवि दिखलाई देती, * 
टरमे समाई तथा लोचनोमे छाई है।॥ 
अभ्यास 
६ १ ) वह किसफी छवि है जिसका वर्णन कवि इंस पद्ममे करता है ? 
५ २ ) इस अनोखी छविकी कान्ति ससारके समस्त छावण्यमे बत्तेमान 
है। केसे ? 
( ३ ) शब्दाये/बताओ -- 
निकाई, समयह, जुन्हाई, कनकलता, भजुछ, पतन, सुघराई, 


कृणानु, छवि । 
५ ४ ) भावार्थ बताओ -- 
कजकल्का समाई है। 
< ५ ) इसके भावको बताओ ;--- 
जद्याठेखो ,... ,. ,छहई हे। 
१४--गोविन्द - 
, [ सम्पादक--तआाबू हनुमान असाद पोह्मर ] 


( आप कल्याण नामक हिन्दी मासिक-पत्रके सम्पादक हैं ।, आपके लेख 
'अगवत्‌ मक्ति-रस-सिक्त और भावयुक्त दोते हैं। प्रस्तुत कहानी “गोविन्द! 
आपड्दीकी सम्पादित-पुस्तक 'भक्त-बालक' से ली गई है । )/ 

. गोवर्धन बड़ा सुन्दर गोंव है। गाँवमे आ्राह्मण, क्षत्रिय ओर 
चेश्योकी द्वी चलती अधिक है। गॉवके चीचमे एक मन्दिर है, 


( ४२ ) 


जिसमें श्रीनाथजी महाराजकी बढ़ी ही सुन्दर भूर्ति विराजमान 
है। उनके चरणों नूपुर, गदेमें मनोहर चनभाला और मसतक- 
पर मोर मुकुट शोमित हो रहा है। घुँघराले बाल है। नेन्नोकी 
बनावट मनोहारिणी है और पीताम्वर पहने हुए हैं। मूर्तिमें 
इतनी सुन्दरता है कि देखनेवालोका मनही नहीं भरता ।, मंद्रिके 
पास ही एक गरीब आह्वणका, घर था। ब्राह्मण था गरीब, परंतु 
उसका हृदय भगवत्‌-भक्तिके ऱमे रहा हुआ था | जाह्मणी भी 
अपने पति और पतिके भी परम पति परमात्माके प्रममें रत थी। 
उसका सब॒भाव वड़ा ही सरत और मिलनसार था, कभी 
किसीले उसके मुखसे कड़ा शब्द नहीं सुना। पिता-माताके अतु- 
सार ही प्राय: पृत्रकः सवभाव हुआ करता है। इसी न्यायसे 
ब्राक्षण-दम्पतिका पुत्र गोविन्द भी बड़े सुन्दर संवभाषका बालक 
था। उसकी उम्र दस वर्षकी थी। गोविन्दके शरीरकी बनाव्रढ 
इतनी सुन्दर थी कि लोग उसे कामदेबका अदरतार कहनेमें भी: 
नहीं सकुचाते थे। 


गोविन्द गांवके बाहर अपने साथी सदानंद ओर रामदास- 
के साथ खेला करता था। एक दिन खेलते-खेलतें संध्या हो 
गयी। गोविन्द घर लौट रहा था तो उसने मन्दिरमें आरतीका 
शब्द सुना। शंख, धण्टा, घड़ियाल और भांमकी आवाज सुन- 
कर गोविन्दकी मी मन्दिर्मे जाकर तमाशा देखनेकी इच्छा हुई 
ओर उसी क्षण बह दोड़कर नाथजीकी आरती देखनेके लिये 
सन्दिसमे चला गया। नाथजीके द्शनकर बालकका मन उन्होंमें 
रम गया। गोविन्द इस बातको नहीं समकक सका कि थह कोई 
पाषाणकी सूर्ति है। उसने प्रत्यक्ष देखा कि एक जीता जागता 
मनोहर,वालक खड़ा हँस रहा है। गोविन्द, नाथजीकी मधुर 
मुसकानपर मोहित दो गया। उससे सोचा “याद यह बालक 


( ४३ ) 


जैरा मित्र चन जाय ओर मेरे साथ खेले ठो बड़ा आनन्द दो!” 
इतनेमे आरती समाप्त हो गई, लोग अपने-अपने घर चले गये । 
पुजारी भी सन्दिरि बन्द फरके चले गये। एक गोविन्द रह गया, 
जो मन्दिर्के वाहर अध रेमे खडद्म नाथजीकी वाट देखता था। 
गोविंदने जब चारो ओर देखकर यह जान लिया कि कहीं 
कोई नहीं है, तब उसने किवाड़ोके छेद्से अंदरकी ओर मांक- 
फर अकेले खड़े हुए श्रीनाथजीकों हृदयकी बड़ी गहरी आवाज- 
से गदगद्‌ कण्ठ हो श्रेमपूर्वक पुकारकर कहा, “नाथर्जी ! 
भैया क्‍या तुम मेरे साथ नहीं खेलोंगे ? मेरा मन तुम्दारे 
“साथ खेलनेके लिये बहुत छुटपटा रहा दै। भाई आओ, देखो 
कैसी चांदनी रात है, चलो दोनों मिलकर मेदानमें ग॒क्ली 
डंडा खेलें। में सच कहता हूं, भाई ! तुमसे कभी भरगड़ा या 
आरपीठ नहीं करूँगा ।? 


सरल हृदय धालकके अंत कस्णपर आसतीके समय जो 
अभाव पडा, उससे वह उन्‍्मत्त हो गया। पण्मात्माके सघुर 
ओर अनन्त श्रेमकी अम्ृतमयी मलय वायुसे गोविंद प्रेम- 
विभोर होकर मंदिरके अंदर खड़े हुए उस भक्त-आरण धन 
गोविन्दको रो रोकर पुकारने लगा। बालकके अश्रु -सिक्त शब्दों- 
ने बड़ा काम किया। भक्तके अमावेशने भगवानको खींच 
लिया! गोबिन्दने सुना, मानो अन्द्रसे आवाज आती है-- 
“भाई चलो आता हू, हम दोनो खेलेंगे ।”? 


सरत वालकका मधुर-प्रेस मगवांनकों वहुत शीघ्र खीचता 
है। बालक ध्रु वके लिये उन्हें चतुभुजधारी होकर चनमे जाना 
पड़ा। भक्तप्रहादके लिये अनोखा नरसिंह चेष धारण किया 
आओर ब्रज चालकोंके साथ तो आप गो चराते हुए वन-बन घूम, 
आज गोविन्दकी मतवाली पुकार सुनकर उसके साथ खेलनेके 


से 


( ४४ ) 


लिये मन्द्रिके वाहर चल्के आये, घन्य प्रभु | न मालूस तुम मायाके 
साथ रमकर कितने खेल खेलते हो। तुम्हारा मम कौन जान 

सकता है? मामूली साम्रावीके खेलसे ही लोग अरसमें पढ़ 

जति है फिर तुम ती मायावियोके सरदार ठहरे । 


नाथजी हंसते हुए गोचिन्दके पास आकर खड़े हो गये। 
गोविन्डने बडे अ्रेमसे उनका हाथ पकड़ लिया। आज गोविन्दके 
आलन्दका « ठिकाना नहीं है, ५६ कभी नाथजीके मुखकमलको 
देखकर मतबाला होता है, तो कभी उनके कोसल-कर-कमल्ो 
का स॒पशें केर अपनेको धन्य मानता है। कभी उनके नुकीले 
नेत्रोको निद्ारकर मोहित होता है, तो कभी उनके सुरीक्षे शब्दों- ' 
को सुनकर फिर सुनना चाहता है। गोविन्दके हृदयमें आनंद 
समाता नहीं | वात भी ऐसी द्वी है। जगतका समसत सोंदये 
जिसकी संददर्य-गशशिका एक तुच्छ अंश है, उस अनन्त और 
की रूप राशिकों अत्यक्ष आप्त कर ऐसा कोन है जो मुग्ध 
नहा? 

» नये मित्रको साथ लैकर गोविन्द गाँवके घाहर आया। 
धंद्रमाकी चॉदनी चोरों ओर छिटक रही थी, भियतमकी आप्ति 
से सरोचरोंमें कुमुदिनी हँस रही थी। ऐसी मनोहर सात्रिमें 
गोविन्द, नाथजीकों पाकर अपने घरनवार पिता-माता और 
मोंद-मूखको सर्वेथा मूल गया। दोनों मित्र बढ़े' प्रेमसे तरह- 


तरहके खेल खेलने लगे | 

गोविन्दन कहा था कि भड़ा या सारपीट नहीं करूंगा, 
परन्तु विनोदशिय नाथजीकी सायासे मोहित हक्कर वह इस 
बातको भूल गया, खेलते-खेलते किसी बातकों लेकर दोनो 
मित्र लड़ पड़े। गोविदने क्रोधमे आकर 'नाथजीके गालपर एक 
थप्पड़ जमा दिया और बोला कि “फिर कभी मुझे खिकाया 


( ४५ ) 

हो याद रखना, मारते-मारते पीठ लाल कर दूगा। सू्य-चढ्र,. 
अनल-अनिल जिसके कै. अपने-अपने काममे लग रहे हैं, 
खर्य देचराज इन्द्र जिसके भयसे समयपर वृष्टि करनेके लिये 
बाध्य होते है, और भसयाधिपति यमराज जिसके भयसे पापियो-- 
को भय पहुँचानेमें व्यसत है, बही तिमुवन नाथ आज हनन्देसे- 
बालक भक्कके साथ खेलते हुए उसका थप्पड़ खाकर भी कुछ 
नहीं बोलते ! धन्य है । 


नाथजी रोने लगे और बोले, “भाई गोविंद | तुमन कहा 
था न कि मारु गा नहीं, फिर मुझे क्‍यों माय !” नाथजीकी इस 
चातकों सुनकर और उनको रोते देखकर गोबिढका कल्ेंजा, 
भर आया उसने ढोड़कर नाथजीके आँसू पोछ उन्हे अपने गले 
लंगा लिया और घोल, “भाई ।! रो.सत, तू भुमे बड़ा ही प्यारा 
लगता है, तेरी आखोभे अंसू देखते दी मेरा कल्लैजा फटता 
है |” दोनों फिर खेलने लगे। शत अधिक हों गई। भगवानने 
यह सोचकर कि इसके माता पिता बड़े चिंतित होगे, अपनी 
भायासे गोविंदके ह॒ृद्यमे घर जानेके लिये भ्रेण्णा की। गोवबिदने 
कहा, “नाथजी । बड़ी देर हो गई है, में घर जाता हूं, अब कल 
फिर खेलेंगे ।”” नाथजीने अनुमति ठी। गोविंद घर चला गया 
आर अनाथोके एक मात्र नाथजे अपने मन्दिरमें चले गये।. 


प्रतिदिन इसी श्रकार खेल होने लगा। गोविंद इस नयन- 
मन-मोहन नवीन भिन्रको पाकर पुराने दोनों मित्रोको मूल 
गया। एक दिन श्रीनायजी महाराज खेलते खेलते गोबिदकों 
'दॉव न देकर भागे ।“ गोविंद भी पीछे-पीछे दौड़ । नाथर्जी महा-- 
राज सन्दिस्से जाकर घुस गये। , सन्दिरका हार बंद था, अत- 
एव गोविंद अढर नहीं जा सका, नाथजीका अन्याय सममः- 
कर वह सन्दिरके बाहर खड़ा होकर उन्हें प्रणय कोपसे खरी- 


; ( ४६ ) 
खोटी खुनाने लगा। भक्तमालके रचयिता रीबॉ-नरेश रघुगाजसिहजी 
लिखते है:-- 


“सगि मन्दिर भीतर कृष्ण गये तब गोविंद भीतर जान लगो। 
जब पण्डन मारि निकासि दियो, तव वाहरद्दी अति कोप जगो॥ 
भहि ठोकत डण्ड उचारत गारि दे, तू कढ़ि है कबलों न भगो। 
इत बैठ रहोगो मै तेरे लिये, नहि दॉव दियो डे पूरो ठगो॥? 


मन्दिर खुलते ही गोविन्द अन्दर घुस गया और डणस्डेसे 
'नाथ जीकी मूर्तिकों पीटकर बोला कि “फिर कभी भागोंगे ?? 
पुजारियोने हा | द्वा | करके गोविद को पकड़ा और सार-पीटकर 
मन्दिरके बाहर निकाल दिया, इससे उसका प्रेम-कोप और भी 
जढा और वह कहने लुगा, नाथजी ! तैने मेरे साथ बड़ा अन्याय 
किया है, दाव न देकर भाग आया ओर अब मुमे अपने आद- 
मियोसे मरवाकर बाहर निकलवा दिया, जबतक तुमसे इसका 
बदला न लगा, तबतक पानी भी न पिक्ेंगा। यो कहकर गोचिद 
रूठकर चला गया और जाकर गोवबिद-कुस्डपर बेठ' गया। 
इधर मन्दिस्मे भोग तैयार द्ोनेपर पुजारीको प्रत्यादेश हुआ कि 
<(ुम लोगोने मेरे जिस भक्तको मारकर बाहर निकाल व्या है, 
चह जबतक नहीं आवेगा तवतक मे भोग नहीं लग सकता, 
उसके अगपर जो मार पड़ी है वह सब मेरे लगी है।” पुजारी 
को क्या पता था कि भक्त और भमक्त-बत्सल अभिन्न होते हैं। 
खैर | पुजारीजी बड़े हैरान हुए दोड़े, और खोजते खोजते 
कुण्डपर गोविदकों पाकर कहने लंगे, “भाई चलो नाथजी- 
ले तुम्दे बुलाया है, वे तुमसे द्वार मानते हैं ओर फिर उम्दारे 
साथ खेलनेका वादा करते हैं।” ब्राह्मएणके वचन झुनकर 
गो्िंदने कह, “जाता तो नहीं, वद्दी में! पास आता, और 
जब में उसे खूब पीटता, तभी वह सीधी राहपर आता; पर 


( ४७ ) 


अब जबकि उसने हार मान ली है, , तव तो चलो, चलता हूं।” 
यो कहकर गोविन्द मन्दिस्से गया और विजय-गर्बंसे 
इंसता हुआ वोला--“क्यो वाथजी ! फिर' कभी करोंगे ऐसी 
चांतुरी ९ अच्छा हुआ जो तुमने हार मानकर सुके बुला लिया, 
नहीं तो ऐसा करता जो जन्मसर याद रखते !” गोबिंदने ये 
चाते कह तो दीं परन्तु जब नाथजीका मन उदास देखा तो 
उसके सए्ल हृदयमे बड़ी वेदना हुईै। वह बोला--“भाई । 
तुमने अमीतक भोग क्यो नहीं लगाय। | तुम्हारे मुखक्ो उदास 
देखकर भेरे आए रोते हैं, माई । फिए कभो तुम्हे न मारूँगा, 
मुम्हारी उदासी मुझसे नहीं सद्दी जाती। भें तुमसे अब नहीं 
रूदू गा, तुम राजो हो जाओ और मोग लगाओ ॥” 
मन्दिरके द्वार बन्द हों गग्रे। नाथजी प्रत्यक्ष दोकर बोले, 
“माई |! तुम भी तो ये हो | आओ, दोनो मिलकर खायेँ।” 
नाथजीका प्रसन्न-मुख देखकर गोविन्दका मन-सरोज भी खिल 
उठा। दोनो हंसने लगे। आनन्‍्दकी ध्वनिसे मन्दिर भर गया। 
शगोबिन्द, गोविन्दके हाथो विक गये । 
वोलो भक्त और उनके भगवानक्की जय ! 
अभ्यात्त 
( १) भगवान्‌ भक्तावीन हैं, इस कहानीते सिद्ध करो ? 
(६) गोबिन्दका मन भगवानकी ओर केसे झुका 
( ३ ) मिलह्िं न रघुपति विनु अनुरागा । 
किये कोटि, तप, योग विरागा ॥ 
गोल्वामी तुल्सीदासकी उपयुक्त चौपाई और इस कहानीमे क्या 
समानता है? 
( ४ ) भगवानके भक्तोंका अपमान स्वश्न इश्वरका अपमान है। केसे? 
, से फहानीसे सिद्ध करो १ 
हि 


( ४८ ) 


(५ ) भक्तके सालिक श्रेमके सम्मुख भगवान्‌ अपने मान और अपमान 
का ध्यान नहों रखते समम्ाओ ? 

( ६ ) इस कहानीसे क्‍या शिक्षा मिलती है ? ' 

( ७ ) इस कहानीको सक्षेपमें वणेन करो ? 


ब्नीनीओिक- त+5 


१५---भक्तको भावना 


[ लै०--पं० गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेह्दी' ] 

[ जन्म श्रावण झुक १३ स० १९४० घि० | जन्मभूमि और विकास” 
स्थान हृढ़द्दा जिला उन्नाव है। अर्वाचीन खडी वबोलीके कवियोमे 
आपका स्थान वहुत उच्च है। हिन्दी-साहित्यमे आपकी श्रेणीके केवल 
इने गिने दो चार कवि है। आप सस्कृतके कुशल ज्ञाता तथा उद्‌ंके भी 
अच्छे कवि हैं। १५-१६ वर्षकी अवध्थापे ही आपका अध्यापक-जीवन 
आरम्भ हुआ और आपका यह जीवन सफल रहा। आप सम्पत्ति. 
कानपुरमे ही रहकर आन न्‍्दमय साहित्यिक जीवन व्यतीत कर रहे है । ] 

५ 
२ 

तू है गगन-विसतीण तो मै एक तारा क्षुद्र हूँ, 

तू है महासागर अगभ में एक धारा चुद्र हूँ । 
तू है महानद तुल्य तो मै एक बूंद समान हूं; 
तू है मनोहर गीत तो मैं एक उसकी तान हूँ ॥ 


(६) * 
तू है सुखद ऋतुराज तो मैं एक छोटा फूल हूं, 
तु है अगर दक्षिण पवन तो मे कुछुमकी घूल हूँ । 
तू सरोवर अमल तो में एक उसका मीन हूँ, 
तू है पिता तो पुत्र मै तब अछुमे आसीन हूँ ॥ 


( ४६ ) 


(३) 
तू अगर सर्वाधार है तो एक में आधेय हूं, 
आश्रय मुमे है एक तेरा, श्रेय या आश्रेय हू । 
तू है अगर सर्वेश तो में एक तेरा दास हूँ, 
तुमको नहीं में मूलता हूँ दर हैँ या पास हूँ ॥ 
(४) 
तू है पतित पाचन अकट तो मै पतित मशहूर हूँ, 
छलसे मुझे यदि हैं घृणा, तो मे कपटसे दूर हूँ । 
है मक्तिकी यदि मूख तुमको, तो मुके तब भक्ति है, 
अति अम हे तेरे पढ़ोने, श्रम है, आसक्ति है।॥। 
(४) 
तू है दयाका सिन्धु तो में भी दयाका पात्र हैँ, 
करुणेश तू है, चाहता मै नाथ करुणा-यात्र हूँ। 
तू दीनवन्धु प्रसिद्ध है, में दीनसे भी दीन हूँ, 
तू नाथ ! नाथ अनाथका असहाय मैं प्रशु-द्वीन हूँ॥ 
(६) 
तव चरण अशरण-शरण दैंमुमको शरणकी चाह है, 
तू शीतकर है दग्धको, मेरे हृदयसे दाह है। 
तू है शरद-राका-शशी, मम चित चारु चकोर है, 
तब ओर तज़कर देखता वह औरकी कव ओर है॥। 
(७) 
छदयेश । अब तेरे लिये, है हृदय व्याकुल द्वो रह, 
आ, आ, इधर ध्य शीघ्र आ, यह शोर यह गुल दो रहा । 
यह चित्त-चातक दै ठपित, कर शान्त करुणा-धारिसे, 
चनश्याम ! तेरी सट लगी आठो पहर है अब इसे | 


( ४६० ) 


(८) 
तू जानता मनकी दशा, रखता न तुमसे बीच हूँ, 
जो कुछ कि हूं तेरा किया हूँ उच हूँ या नीच हैँ । 
अपना मुझे अपना समम्र तपना न अब मुमक्ो पढ़े, , 
तजकर तुमे यह दास जाकर छार अब किसके अड़े ॥ 


(६) 
तू है दिबाकर तो कमल मै, जल्द तू में मोर हूँ, 
सब भावनाये छोड़कर, अब कर रहा यह शोर हूँ। 
मुझमें समा जा इस तरह तन प्रणका जो तोर है, 
- जिसमे न फिर कोई कहे में और हूँ तू और है॥ 
अभ्यास 
( १ ) ईज्नर और इस़र-भक्‍्तमें क्या सम्बन्ध है? इसे इस पद्म द्वारा 
सममाओ । 


( २ ) तुम्हारे हृदयमें इस पाठको पढ़कर क्या भाव उतक्न द्वोते हैं १ 
( ३ ) त है शरर. .कब ओर है | इस पदका अन्वय करो | 

( ४ ) यह चित्त चातक, ..अव इंसे । इसमें उपमान उपमेग्र समझाओ और 
४ इस पयका भावाथे भी बत्तलाओ १ 

( ५ ) अणरण-दरण, कहणा-वारि शरद-रका-शशिमें समास बताओ १ 
( ६ ) सुखद, अनाथ, सर्वाधार, आश्रेय, हृदयेशमें सन्धि-विच्छेद करो? 
( ७ ) इस पदका असली ध्येय क्या है ? बताओ | 


१६---हिन्दी-साहित्यमें नाटक 
[ 'छुधा? से सकलिध ] 
नांटकका भविष्य क्‍या होगा और नाटकका भविष्य क्‍या 
होना चाहिये, इस प्रश्नपर हिदी-साहित्यिकोने सबेथा मौन 
धारण कंर रखा है। कई कला प्रिय कला-विज्ञान-विशारद्‌ 





( ६१ ) 


सजनोसे इस बिपयपर वार्तालाप हुआ। मेरे आश्थये ओर 
दुःखकी कोई सीमा न रही, जब उनमेसे कुछ सज्जनोने यह 
सम्मति अकट की कि 'सिलेमा?ः रूपी राहु नाटक-तपी श्रहको 
प्रस लैगा अथवा टाकीजु-रूपी नाग नाटककों उस लैगा। 


मेस तो यह विचार है कि सिनेमा? अथवा टाकीजः 
नाटक” को कोई क्षति नहीं पहुँचा सकते। ऋषियोकी यह 
पवित्र विद्या सदैव अपना सिर ऊँचा किये हुए रहेगी। परन्तु 
जो उदासीनता हिन्दी-साहित्य सेवियोने “'नाटकः के प्रति प्रद- 
शिंत की है, उससे यही अनुमान होता है कि निकटवर्ती कालमे 
नाव्य-विद्या तथा नाव्य-कलाका क्षय होने लगेगा। 


हिन्दी-साहित्यकोी उच्च तथा उत्तम बनानेका उद्योग किया 
गया। उदीयमान उत्सादी ज्ेखकोने अपनी लैखनीसे उपन्यास 
लिखकर हिन्दी साहित्यका भाय्डार भरना आरम्भ किया। 
कवियोने काव्य-अन्थो ढारा हिन्दी-साहित्यकी श्री-बृद्धिकी। 
आधुनिक हिन्दी-साहित्य, यदि संसारकी भाषाओमे नहीं, तो 
भारतीय भाषाओके साहित्यमे, ऋम्म श्रेणीमे गण्य अवश्य है। 
पुसतकोकी छपाई छ»ौर रूफाई, सजावट और वनावट, सबेथा 
उत्तम तथा श्रशंसनीय है, पर क्या केवल इन वातोसे हिन्दी 
भाषाका साहित्य सवा ग पूरी दो गया। मेरा उत्तर नकारमे है, 
क्योकि नाटकके थिना किसी भाषाका साहित्य सर्वाज्ञपूर्ण 
नहीं हो सकता । अतः हिन्दीका साहित्य अभी पूर्णाद्र नहीं हे। 

एक समय था कि [रंग मद्बोपर उदू-नाटकोंके अभिनयकी 
घूम मची हुई थी--इन्द्र सभा तथा मुलदकावलीका जो आदर 
तत्कालीन नाथ्य-शालाओंसे था, यह शायद भोजकालमें भी 
कालिदास तथा भवभूतिके नाटकोकों भ्राप्त न हुआ होगा। 
८५ नारायण प्रसाद वेतावने सदसे प्रथम हिन्दी-उ् मिश्रित 


( ६२ ) 


भापासें नाटक लिखकर अभिनय कराया | फिर क्या था ? समा- 
लोचक महोदय अपनी कुम्मकर्णों निद्रासे जागकर अपने अख्न- 

लैकर प्रहार करने लगे। कोई कहता था, हिन्दी सापाकी 
नाक कट गई। कोई कहता था, हिन्दीके नामपर लोगोको 
लूटनेका आयोजन है । तब पंडितजीके इस 5त्तरसे 


“मेने साहित्यमे हिन्दीको है बदनाम किया, 

फिर भी यह सोचके खुश हूँ कि कोई काम किया।”? 
समालोचक महाशयोको कुछ शान्ति मिली। अन्य उत्साही 

लैखकोको कुछ आगे बढ़नेका सहारा मिला । 
नाटकके बिना कोई साहित्य-पूरं नहीं होता। अंगरेजी 
तथा ससक्ृतमेसे शेक्सपियर तथा कालिदास ओर सवमूतिके 
नाटकॉंको प्रथक्‌ कर दीजिए, तुरन्त इन साहित्योकी कांति 
फीकी पड़ जायगी। इसका कारण है नाटकमे “साहित्य 
संगीत; कल्लाका समावेश” जिनके विना मनुष्य पुच्छ-विषाण- 
दीन पशु ज्ञात होता है, ये तीनो बातें न आपको “उपन्यास” में 
मिल सकती हैं; न काव्य-अन्धो मे न 'सिनेमाः में न “टाकीज! 
मे। उपन्यास पढ़ते समय भाति-मॉतिकी घटनाएँ आपके 
सम्प्रुख आदेंगी, अनेकानेक अकारके भाव आपको ज्ञात हो 
जायगे। आप उपन्यासमे लबलीन भी हो जायंगे, ओत-ओत भी 
हो जाय॑ंगे । काव्य प्रन्थ पढ़कर आपको कविताका आनंद 
आवेगा, आप काव्य-सागरकी लहरोंके साथ विहार करने लगेगे। 
उस काव्य सागरमे आपको नाना श्रकारके सुरम्य रत्न दृष्टि- 
गोचर होगे जिनपर आप मोहित हो जायंगे। सिनेमाके दृश्य 
देखकर आप आदम्रय-सागस्से हूव जायंगे। टाकीजमें भी आप 
को 'सिनेमा संगीतका! आनन्द आवेगा। परंतु एक अच्छे 
नाटकके देखनेमे आपको ये सब आनन्द एक साथ मभ्राप्त दो 


( ६३ ) 


जायँंगे। चित्ताकपेण करनेवाले मनोहर पोशाके, रमणीक तथा 
आनन्ददायक दृश्य, हृंदयपर सच्चा भाव अश्लित करनेवात्ते 
हाव भाव, संगीतसें गान, जृत्य, वीणा, सदद्ध तथा अन्य वाद्यों- 
का मनोहर शब्द, इन सब वातोका आनन्द आपको एक अच्छे 
नाटकमे ही मिल सकता है। 

नाटक द्वी एक ऐसा कमल है, जिसके मघुर परागको पान 
करनेके लिग्रे कवि, उपन्यासकार, गाने वजानेवाले, चित्रकला 
प्रवीण तथा अन्य कलाबिद मनुष्य अ्रमररूप धारण करके 
पड गशुनगुनाहट्से दर्शंकोका सन मुग्ध करते हुए पायें 


भी भारतीय रंग-मन्नपर हिंदी नाटकोकी 

हुई है। छविदीमे अब सी ऐसे नाटक लिखे जा. चुके है. जिन्हे 
वारंबार देखनेंकी जनताकों प्रवल उक्तण्ठा रहती है। परन्तु 
शेसे नाटक डॉगलियोपर ही गिनने भरके हैं। हमे इतनेसे ही 
सतोष नहीं होना चाहिये, किन्तु तरकी 
उपाय सोचना चाहिये। 

हमारे समालोचक महाशय नास्यकारोसे अगप्रसन्न है। 
सान सकता हू कि हिन्दी-साहित्याकाशपर अभीतक कोई 
नाटक शुक्र-मह या धरुच-नक्षत्रकी नाई चमकने योग्य नहीं हुआ 
फिर भी जो हैं, उनको अपनाना हमारा कत्तेन्य है। सूटेजपर 
खेले जनिवाले नाटकोमे साहित्यकी सामग्री नहीं मिल 
सकती। अत साहित्यकी दछ्ठिले उनकी समालोचना करना भी 
व्यथे है। यह अवश्य देखना चाहिये कि अमुक नाटकसे समाज 
का झुधार होगा या नहीं । यदि समाजको हानि पहुँचनेकी संभा- 
चना हो, तो उस नाटकके विरुद्ध घोर आन्दोलन करना चाहिये | 

नाटकसे भाग लेना हानिकारक नहीं है। नाटक आचीन 


( ६४-) 


समयहीसे प्रचलित है। महर्षि वशिप्ठने भगवान्‌ एमचन्द्रके. 
लड़कोसे सीता वनवास नाटकका अभिनय कराया था। 
नाटक ऋषियो ओर देवताओंकी विद्या है। इसकी उन्नति 
करना हमारा कर्तव्य है। 

उदीयमान उत्साही लेखकगण आगे आबें और अपनी 
लेखनीसे साहित्यके इस अंगको पूरे करें। कल्लाप्रिय युवकगण 
अग्रसर होकर सगीत तथा अभिनय-कलाको उन्नति प्रदान 
करें। तभी आशा की जा सकती है कि नाटकंका भविष्य 


उज्ज्वल द्ोगा, हिंदी-साहित्य सवेथा सर्वो ग-पूरों बनेगा । 
अभ्यात्त 


( १ ) नाटक और हिन्दीके काव्य-अन्थोमे क्या अन्तर है? 

(२ ) नाठकके विना कोई साहित्य पूर्ण नहीं कहा जा सकता । 
पिद्ध करो ! 

( ३ ) सिनेमा, थकीज और नाठकमें क्या अन्तर है ? सोदाहरण 
सममाओ ? 

| ( ४) नाटकका प्रभाव विज्ञ-दरेकों के मस्तिष्कपर अब॒ह्य पढ़ता 
है। कैसे ? 

(५ ) नाटक, सिनेमा ठाकीज आदि भारतकों क्या विलाप्तिताकी 
और ले जा रहे हैं 

(६ ) शब्दार्थ वताओः-- 
प्रदर्शित, उदीयमान, तत्कालीन, समालोचना, पुच्छ 
विषाण-हीन । 


( ६४ ) 
१७--श्रातृ- प्रेम 
[ लै०--गोखामी ठहुलसीदास ] 


( गोल्लामी तुल्सीदासका जन्म १५८९ विक्रमीम तारी ग्रावमें 
हुआ, जो वादा जिलेम राजापुरसे ५-- कोसकी दूरीपर है। आप 
सरयुपारीण ब्राह्मण ये। आपका नाम पहले राम्रवोला था। आफके 
पिताका नाम आत्माराम और माताका हुल्सी था। नरदरि स्वामी 
आपके गृह ये। जबतक यह ससार-प्रवाह प्रचलित है तथतक गोस्वामी 
बुल्सीदासजीकी विमल कीर्ति जो इन्दोंने धर्म, समाज, राजनीति छत्यादि- 
के निमित की, सतत अमर रहेगी। आप वि० स॒० १६८० में अपनी 
मानवी लीछाको समाप्त कर सुरधाम सिधारे | ) 


चौपाई 


समाचार जब लकिमन पाये | व्याकुल विलख बदन उठि धाये ॥, 
कप पुलक तन नयन सनीरा। गद्दे चरन अति श्रेम अघीरा ॥ 
कहि न सकत कु चितवत ठाढ़े | मीमु ठीन जनु॒ जल ते काढ़े ॥. 
सोच हृदय विधिका होनिहारा | सब सुख सुकृठु सिरान हमारा ॥ 
मो कहें काह कहव रघुनाथा | रखिह॒हिं भबन कि लेद॒हि साथा॥ 
राम विज्ञोकि बन्धु कर जोरे। देह गेह सब सन एन तोरे॥ 
वोले वचन राम नयनागर। सील-सनेह-सरल सुख सागर ॥ 
तात प्रेमम्स जनि कदराहू | सभुकझति हृदण परिनाम उछाहू।॥ 


दोहा--माछु-पिता-गुरुखामि सिख, सिर घरि करहिं सुभाव। 

लहेल लाभ तिन्ह जनम कर, नतरु जनम जग जाय॥ 
चोपाई 

अस जिय जानि सुनहु सिख भाई | करहु माठु-पितु-पद-सेवकाई ॥॥ 

भवन भरत रिपुसूहन नाहीं। राव वृद्ध सत्र दुख सन माही ॥ 


( ६६ ) 


औे बन जाओ तुम्द॒द्दे लेइ साथा । होइ सबहिं विधि अवध अनाथा | 
गुरु पितु मातु अ्जा परिवारू । सब कहेँ परइ दुसद दुख भारू॥ 
रहहु करहु सब कर परितोपू। नतरूु तात दोइहि बढ़ दोपू॥ 
जामु राजशण ग्र॒जा दुखारी। सो उप अवसि नरक अधिकारी ॥ 
रहहु तात अस नीति विचारी | सुनत लपन भये व्याकुल मारी ॥ 
सियरे वदन सूखि गये कैसे। परसत तुद्दिन तामरस जेसे ॥ 


दो०--उतर न आवत श्रेमवस, गहे चरन अकुलाइ। 
नाथ दाछु मे ख्ामि तुम्ह, तजहु त काह वसाइ ॥ 


चोपाई 
माँगहु विदा सातु सन जाई । आवहु वेगि चलहु बन भाई॥ 
मुद्ति सये सुनि रघुपति वानी । भयड लाभ बड़ गइ वढ़ि हानी॥ 
हरपित हृदय मातु पहिं आये । मनह-ुँ अन्ध फिरि लोचन पाये ॥ 
जाइए जननि पग नायड माथा। मन रघुनतन्दरन जानकि साथा ॥ 
पूछे मातु मलिन मन देखी | लपण कही सव कथा बिसेखी॥ 
गई सहमि सुनि बचन कठोरा । सगी देखि दव जनु चहँ ओरा ॥ 
लखन लखेड भा अनरथ आजू | एदि सनेह बस करब अकाज ॥ 
मॉगत विदा समय सकुचाही | जाइ संग विधि कहिद्िं कि नाही ॥ 
दो०--समुक्ति सुमित्रा राम-सिय, रूप सुसील सुभाउं। 
नुप सनेद्द लखि घुनेठ सिर, पापिनि दीन्‍्ह कुंदाउ ॥ 
; व्वोपाई 
घीरज घरेड कुअवसर जानी | सहज सुहद बोली म्दुवानी॥ 
तात तुम्दारि मातु बेंदेही। पिता रामु सब भॉति सनेदी॥ 
अवध तहाँ जहेँ राम निवासू | तहँद दिवस जहीँ भातु प्रकासू ॥ 
जौ पै सीय राम बन जाहीं। अवध तुम्हार काज कछ्ु नाहीं ॥ 
गुरु पितु मातु बन्धु सुरसाई । सेइआदटिं सकल आनकी, नाई ॥ 


( ६७) 
राम आन श्रिय जीवन जीके। खारथ रहित सखा सबही के॥ 


थूजनीय श्रिग्न परम जहाँते। सब मानिञ्र्हिं रामके नाते ॥ 
अस जिय जानि संग बन जाहू | छैहु तात जग जीवन लाहू॥ 


दो०--मूरि भाग साजन सयहु, मोहि समेत वलि जाड। 
जो तुम्हरे मन छॉड़ि छुल, कीन्ह राम पढ ठाउ। 


पोपाई 


पुत्रवती युवती जग सोई। रघुपति भगत जासु सुत होई ॥ 
नतरु वॉक भल वादि वियानी । राम विमुख सुत तें हित हानी ॥ 
मुम्दरेहि साग राम बन जाहीं | दूसर द्वेतु तात कछु नाहीं॥ 
सकल-सुकृत कर वड़ फल एहू। राम सीय पद सहज सनेहू || 
राग रोप इरिया भद्‌ जि । जनि सपनेहु इन्हके बस होह।॥। 
सकल्ञ प्रकार विकार । सन्त क्रम वचन करेहु सेवकाई || 
मुम्द कह वन सव भांति सुपासू । संग पितु मातु राम सिय जासू॥ 
जेहि नरम बन लद॒हिं कह्लेसू | सुत सोइ करेहु इह“उपदेस ॥ 


वशिष्ठ और भरतका संवाद 


चौपाई 


सु दिन सोधि मुनिवर तव आये | सचिव महाजन सकल बुलाये॥ 

3 राम सभा सव जाई । पठये वोलि भरत ढोड साई॥ 
अरत वसिप्ठ निकट बैठारे। नीति-धरम-मय वचन उचारे॥ 
प्रथम कथा सब मुनिवर वरनी । कैकइ कुटिल कीन्ह जसि करनी ॥ 
मूप धरम त्रद सत्य सराहा | जेहि तन्ु॒ परिहरि श्रेंस निवाह्या ॥ 
कहत राम शुन-सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ॥ 


( $प ) 

बहुरि लखन-सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी || 
दो*--छुनहु भरत भावी प्रबल, विल्खि कहदेउ मुनिनाथ । 

द्वानि लाम जीवन मरन, जस अपजस विधि हाथ ॥ 

चोपाई 

अस विचारि केहि देइआ दोपू। व्यरथ काहि पर फीजिय रोपू॥ 
तात बिचार करहु सन साहीं। सोच जोग दसरथ नूप नाहीं॥ 
सोचिय विम्र जो वेद विद्वीना | तजि निज घरम विपय 'लवतीना ॥ 
सोचिय नृपति जो नीति न जाना । जेहि न प्रजा प्रिय ग्रान समाना॥ 
सोचिय बयस कृषपिन धनवानू | जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ॥ 
सोचिय सूद्र विप्र अवमानी। मुखर मान प्रिय ग्यान गुमानी ॥ 
सोचिय पुनि पति बंचक नारी | कुटिल कल्नहृम्रिय इच्छाचारी॥ 
सोचिय बढु निज्र त्रत परिहरई | जो नहि गुरु आयसु अल्ुसरई ॥ 
दो०--सोचिय ग्ृद्दी जो मोह बस, करइ कण्म पथ त्याग । 

सोचिय जती अपव्यरत, बिगत विवेक बिरशग ॥ 


चौपाई 

वैख्वानसन सोइ सोचन जोगू। तप बिहाइ जेहि भावई भोगू॥ 
सोचिय पिसुन अकारन क्रोधी | जननि-जनक-गुरु-बंधु-बिरोधी ॥ 
सब विधि सोचिय पर अपकारी। निज तु पोषक निझूय भारी ॥ 
सोचतीय सबहीं विधि सोई।जो न छाड़ि छल हरिजन होई ॥ 
सोचनीय नहि. कोसल राऊ। भुबन चारि द्स अगठ अभाऊ॥ 
भयड न अहइ न अब दोनिद्दार | मूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥ 
विधि हरिहर सुरपति दिसि नाथा । बरनहिं सब दसरथ गुत्त गाथा॥ 
वो०--चअनुचित उचित बिचारु तजि, जे पालहिं पितु चेन । 

ते भाजन सुख घुजस ४ बसद्दि अमरपति ऐन ॥ 


| ५ 
झवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोक परिहरहू ॥ 


( ६६ ) 


ऊुरपुर क्रप पाइहि परतोपू। तुम कहँ सुकृत सुजसनहि दोषू।॥। 
चेद विदित संमत सवद्दी का। जेद्नि पितु देह सो पावइ टीका ॥ 
करहु राज परिहरहु॒ गलानी | मानहु मोर वचन हित जानी ॥ 
सुनि सुख लव राम वैंदेही। अनुचित कहव न पंडित केद्दी ॥ 
कोौसल्यादि सकल सहतारी। तेड प्रजा सुख होहि सुखारी ॥ 
परम तुम्दार राम कर जानहि | सो सव विधितुम सन भल मानिहिं ॥ 
सौंपठए राज रामके आये। सेवा करेंह सनेह सुद्दाये ॥ 
'सोरठा--भर्त कमल कर जोरि, धीर-धुरून्धर धीर घरि। 
वचन अमिय जबजु वोरि, देत उचित उत्तर सवहि॥ 


चौपाई 

मोहिं उपदेस दीन्द् गुरु नीका।| प्रजा सचिव समत सबहीका॥ 
'मातु उचित घनि आयखु दीन्हा | अवसिसीस धरिचाहऊँ कीन्हा ॥ 
गुरु-पितु-मातु-सवासी हितवार्नी | सुनिमनमुद्ति करिय भलजानी ॥ 
उचित कि अनुचितकियेथिचारू | धरम जाइ सिर पातक सारू ॥ 
तुम्द्द तड देहु सरल सिख सोई | जो आचरत मोर द्वित द्वोई।॥। 
जद्यपि यह समुमत इडे नीके। तद॒पि होत परितोप न जीके।॥ 
झाब तुम विनय मोरि छुन लैहू। मोहिं अनुददररत सिखावन देहू॥ 
उत्तर देठं! छमव अपराघू। दुखित-दोप-गुन गनहिं न साधु ॥ 
दोहा-+आपनि दारुन दीनता, कहेड़ँ सवहिं सिरनाइ। 

देखे विन रघुनाथ पद, जिय के जरनि न जाइ॥ 


चौपाई 
आन उपाय मोद्धि नदि सूझा। को जिय के रघुवर विन बूक्ा ॥ 
एकहिं ऑक इद्दर मन साद्दीं। प्रावकाल चलिहऊ असु पाद्दी ॥ 
जयपि में अनसल अपराधी। भइ मोहिं कारन सकल उपाधी ॥ 
सद्‌पि सरल सन्‍्मुख सोहिं देखी | छमि सब करिहहिकपा बिसेखी ॥ 
'सील सकुचि सुठि सरल सुभाड । कृपा-सनेह-सदन रघुराऊ॥ 


( ७० ) 
अरिहुंक अनसल कीन्ह न रामा। में सिसु सेवक यद्यपि वामा।]. 
तुम्ह पे पांच मोर भल् मानी। आयसु आसिष देह सुबानी॥ 
जेहि सुनि विनयमोदि जन जानी । आवहिं बहुरिराम रज़धानी ॥ 


दो०--यद्यपि जनम कुप्तातु तें, मे सठ सदा सदोस। 
आपन जानि,न त्यागिहहिं, सोहि रघुबीर भरोस॥ 


अभ्यास 
(१ ) छ्ट्ष्मणजीके आतृ-ओेमको अपनी भाषामे वर्णन करो | 
( ३२ ) सुमित्राने लक््मणको क्या उपदेश दिया 2 बतलाओ। 
(३ ) मरतजीके आातृ-्रेम़् और छक्ष्मणजोरे अ्ातृ-प्रेमका तुलनात्मक दृष्टिसे 
विश्लेषण करो । 
( ४ ) वशिष्ठजीने भरतजीसे किन-किन छोगोको शोचनीय बतलाया है? 


( ५ ) आतृ-ओमपर एक निवन्व तेयार करो । 

(६ ) उतर न आवत ..... -कहा वस्ताइका सान्वय अरये बतलाओ। 

( ७ ) दुखित दोप-ग्रुनग गन, गुह-पितु-मातु-बन्धु-सुर साई, स्वास्थ रहित, में 
समास वतलाओ । 


( ८ ) “पापिनि कीन्द्र कुशउ” में कविका सकेत किसको ओर है १ 

( ९ ) यद्यपि जन्म कुमाठु ते .. .की पद व्याख्या करो । 

(१०) छुमित्रा एक आदरशें माता थी । इस पाठ्से समकाओ। 
न्म्स्च्श्ध्य्य्ल्ल््ड 


१्८--क्रोध 
[ लै०--पं० रामचन्द्र शुक्ल ] 

( जन्म आज्वित झुक पूर्णिणास>० १९४१ वि०, निवास स्थान, 
दुर्गाकुड काशो । आप हिन्दी-साहिलयमें अद्वितीय स्थान रखते हैं । आप 
गय और पद्म दोनोऊे प्रकाग्ड पण्डित हैं। आप चतुर समालोचक भी 
हैं। आपने अग्नेजी भाषामें मी कितने द्वी विद्वतापूर्ण निबन्ध लिखे हैं। 


( ७१ ) 


हिन्दीमें आपने कोई १५ से अधिककी सल्यामें पुस्तकें रची हे जो सभी 
मद्॒त्वपूर्ण हैं। आपका साहित्यिक अध्ययन नितान्त अजुभवपूर्ण है। सम्प्रति 
आप काशी विज्ञविद्यालयमे हिन्दीके एक प्रमुख प्रोफेसर हैं । ) 

क्रोध दु खके कारणके साज्ञात्ताराव अनुमानसे उत्पन्न होता 
है। साज्षात्तारके समय दुख ओर उसके कारणके सबध का 
परिजान आवश्यक है। जैसे तीन-चार महीनेके बच्चेकों फोई 
हाथ उठाकर मार दे तो उसने हाथ उठाते तो देखा है पर अपनी. 
पीड़ा और उस हाथ उठानेसे क्‍या सम्बन्ध है, यद्द वह नहा 
जानता है। अतः बह केबल रोकर अपना दु.खमात्र अकट कर 
देता है। दु खके कारणके साक्षात्कारके निश्चयके बिना क्राधका 
उदय नहीं दो सकता। 


शिशु अपनी माताकी आकहृतिसे अव्यसूत हो ज्योहों यह जान 
जाता है कि दूध इसीसे मिलता है, भूखा होनेपर वह उसकी आहट 
पा रोनेमे कुद्द क्रोधके चिह्न दिखाने लगता है | 


सामाजिऊ जीवनके लिये क्रोधकी चड़ी आवश्यकता है । यदि 
क्रोध न दो तो जीव चहुतसे दु.खोकी चिर-निवृत्तिके लिये यत्न दी 
न करे | कोई मनुष्य किसी दुष्टका नित्य अद्दार सहता है। यदि” 
उसमे क्रोधघका विकास नहीं हुआ हे तो वह केवल “आह ऊछू” 
करेगा, जिसका उस दुष्टपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । उस दुष्टके 
हद्यमें ढजा आदि उत्पन्न करनेसे बड़ी देर लगेगी । प्रकृति किसीका 
इतना समय ऐसे छोटे छोटे कामोके लिये नहों दे सकती। भयके 
हारा भो आणी अपनी रक्षा करता है, पर समाजमें इस प्रफजारकी 
दु-ख निर्गत्ति चिरसथायिनी नहीं होती। मेरे कहनेका यह 
अभिप्राय नहीं कि क्रोषके समय क्रोध-कर्त्ताक॑ हृदयमे भावी 
दु खसे बचने या घचानेकी इच्छा रहती है वल्कि चेतन अकृतिके- 
भीतर क्रोध इसीलिये है। 


( ७र ) 


ऊपर कहा जा चुका है कि क्रोध दुःखके कारणके परिक्षान 
चा सात्षासारसे होता है अतः एक तो जहां इस ज्ञानमें त्रुटि 
हुई वहाँ क्रोध धोखा देता है। दूसरी वात यह है कि क्रोष, जिस 
आरसे दुःख आता है, उसो ओर देखता है, अपने धारणकर्ताकी 
ओर नहाँ। जिपसे दुख पहुँचा है वा पहुँचेगा उसका नाश हो 
वा उसे दु'ख पहुंचे, यदों क्रोषका लक्ष्य है। क्रोध करनेवादैका 
फिए क्या द्ोगा, इससे उसे कुद्ध सपेकार नहों । इसीसे एक तो 
अनोबेग दही एक दूसरेकों परिमित किय्रा करते हैं, दूसरे बिचार 
शक्ति भो उनपर अऊुर रखती है। यादें क्रोध इतना उम्र हुआ 
कि हृद्यमे दु'खऊे कारणों अब्रोध गक्तिफ़ें रूप और परिणाम 
के सिश्वय दया, भय आदि और बिकारोके सम्वार तथा 
उचित अजुचितके विचारके लिये जगह द्वी नहों रही तो बहुत 
: हानि पहुँच जाती है। जेसे कोई सुने कि उसका शत्र बोस 
आदमी लैकर उसे मारने आ रहा है और वह चट क्रोधसे 
ज्याकुज्ञ होकर विना शत्रुकी शक्तिका विचार वा भय किये उसे 
मारनेके लिये अक्रेज्ञा दौड़े तो उसके मारे जानेमें बहुत कम 
सन्देह हैं। अतः कारणके ययाथे निश्च्रके उपरांत आवश्यक 
सात्रामे ओर उपयुक्त सिथतिमे ही क्रोध चह काम दे सकता है 
जिसके लिये उसका विकास होता है । 


कभी कभी लोग अपने कुट्ुम्बियो वा सनेहियोंसे कगड़कर 
' उन्हें पीछेसे दुःख पहुँचानेके लिये अपना सिरतक पटक देते 
हैं। यह सिर पटकना अपनेको दुःख पहुँचानेके अभिप्रायसे नहीं 
डोता, क्योकि विल्कुत बेगानोके साथ कोई ऐसा नहीं करता। 
जब फिसीको क्रोधमें सिर पटकते देखे तब समम तैना चाहिये 
कि उसका क्रोध ऐसे व्यक्तिके ऊपर है जिसे उसके सिर पटकने- 
की परवाह है अथात्‌ जिसे उसके सिर फूटनेसे यदिं उस 


( ७३ ) 

समय नहीं तो आगे चलकर दुःख पहुँचेगा। 

क्रोधका वेग इतना अ्वल्त होता है. कि कमी-की मनुष्य यह 
विचार नहों करता कि जिपने दुःख पहुँचाया है उसमें दुःख 
पहुँचानेकी इच्छा थी या नहों। इसीसे कभी तो वह अचानक 
बैर कुचल जानेपर किसीको मार बैठता है ओर कभी ठोकर 
खाकर कंकड पत्थर तोड़ने छृगता है। चाणक्य ज्राह्मण अपना 
विवाह करने जाता था। सा्गमे कु उप्तके पैस्मे चुमे | वदू चट 
भह्ठ और कुद्दाली लेकर पहुँचा और कुशोको उखाड़ उखाड़कर 
उनकी जड़ोमे महा देने लगा। मेने देखा कि एक ज्ाह्मण देवता 
चूल्दा फू कवे-कूंकते थक गये। जव आग नहीं जली तव उस 
पर कोप करके चूल्हेमें पानी डाल किनारे हो गये। इस प्रकार- 
का क्रोध असंसकृत है। यात्रियोने बहुतसे ऐसे जंगलियोका द्वाल 
लिखा है, जो रासतेमे पत्थरकी ठोकर लगनेपर विना उसको 
चूर्चर किये आगे नहीं बढ़ते । इस अकारका क्रोध अपने दूसरे 
साइयोके स॒थानकों दवाये हुए है। अधिक अम्यासके कारण 
यदि कोई सनोवेग अधिक प्रवल पड गया ठो बह अंतःकरणसे 
अउठ्यवसुथा उत्पन्नकर मलुष्यकोी फिर वचपनसे मिलती-जुलती 
अबस॒थामे णे जाकर पटक देता है। 


जिससे एक चार दुख पहुँचा, पर उसके दोहराये जानेकी 
सम्भावना कुछ भी नहों है उसको जो कष्ट पहुँचाया जाता है 
चह प्रतिकार कहलाता है। एक दूसरे से अपरिचित दो आदमी 
'रेलपर चले जाते हैं। इनमेसे एकको आंगे द्वीके संटेशनपर उत- 
रना है। सटेशनतक पहुँचते-पहुँचते वात ही वातमें एकने दूसरे- 
को एक तमाचा जड़ दिया और उतरनेकी तैयारी करने लगा। 
आचब दूसरा मनुष्य भी यदिं उतरते उतरते उसको एक तमाचा 
ज्ञगा दे तो यह उसका अतिकार वा वद॒ल्ञा कद्दा जायगा, क्योंकि 

द्‌ 


( ७४ ) 


उसे फिर उसी व्यक्तिसे तमाचे खानेकी सम्भावनाका कुछ भी, 
निश्चय नहीं था । जहां और दुःख पहुँचनेकी कुछ मी सम्मावना 
होगी वहों शुद्ध प्रतिकार नहीं होगा। हमारा पड़ोसी कई 
दिनोसे नित्य आकर हमे दो-चार टेढ़ी-सीधी सुना जाता है। 
यदि हम उसको एक दिन पकड़कर पीट दें तो हमारा यह 
शुद्ध श्रतिकार नहीं कहलायेगा, क्योकि नित्य गाली सुनानेके 
डुःखसे बचनेके परिणामकी ओर भी हमारी दृष्टि रही। इन 
दोनो अवसूथाओबको ध्यानपूर्वक देखनेसे पता लगेगा कि दु'खसे 
उद्ठिप्न होकर दु.खदाताको कष्ट पहुँचानेकी अवृत्ति दोनोमे है। 
पर एकमे वह परिणाम , आदिके विचारोको विल्कुल छोड़े हुए 
है ओर दूसरेमे कुछ लिये हुए। इनमेसे पहले अकारका क्रोध 
निष्फल सममा जाता है। पर थोड़े पैयेके साथ सोचनेसे जान 
पड़ेगा कि इस शकारके क्रोधसे खा्थे-साधन' तो नहीं होता 
पर परोक्ष रूपमे कुछ लोक-हित साधन अवश्य हो जाता है। 
दुःख पहुँचानेसे हमे फिर दुःख पहुँचनेका डर न सही पर समाज 
को तो है। इससे उसे उचित दण्ड दे देनेसे पहले तो उसकी 
शिक्षा वा भलाई द्वो जाती है। क्रोधकत्ताकी इष्टि तो 
परिणामोकी ओर नहों रहती, पर सृष्टि-विधानसे इस प्रकार-- 
के क्रोधकी नियुक्ति है इन्हीं परिणामोके लिये । 


क्रोध सब मनोविकारोंसे फुर्तीला है इसीसे अवसर पढ़ने- 
पर यह और दूसरे मनोंविकारोका भी साथ देकर उनकी, सहा-- 
यता करता है, कभी वह दयाके साथ कूदता है, कभी घृण,के। 
एक क्रर कुमारगी किसी अनाथ अबलापर अत्याचार कर रहा 
है। हमारे हृदयसे उस अनाथ अवलाके प्रति दया उमड़ रही है 
पर दयाकी पहुँच तो आत्ते दी तक है यदि वह स्रीमूखी 
होती तो हम उसे कुछ रुपया पैसा देकर अपने दयाके वेगको 


( ७४ ) 


शांत फर ल्ैते, पर यहां तो उस दुःखका हेतु मूर्तिमान तथा 
अपने विरुद्ध अयत्नोको ज्ञानपूर्वक व्यथे करनेकी शक्ति रखं॑ने- 
वाला है। ऐसी अवसथामें क्रोध ही उस अत्याचारीके दमनके 
लिये उत्ते जित करता है जिसके बिना हमारी दयाही ज्यथ हो जाती 
है। क्रोध अपनी इस सहाग़ताके बदलेमे दयाकी वाहवाद्दीको 
नहीं वटाता। काम क्रोध करता है पर नाम द्याका ही होता 
है। लोग यही कहते हैं “उसने दया करके घचा लिया” यह 
कोई नहीं कद्दता कि “क्रोध करके वचा लिया ।” ऐसे अवसरो- 
पर यदि क्रोध दयाका साथ न दे तो दया अपने अनुकूल परि- 
णासम उपसिथत द्वी नहीं कर सकती। एक अथधोरी' हमारे सामने 
मक्खियां मार-मारकर खा रहद्ा है और इसे घिन लग रही है। 
हम उसे नम्नतापूषक हटनेके लिये कद रहे है और बह नहीं सुन 
रहा है। चट हमे क्रोध आ जाता है ओर हम उसे धलात्‌ हटाने 
में प्वृत्त दो जाते हैं । 


क्रोधके निशेधका उपदेश अर्थपरायण ओर घर्मपरायणु 
दोनो देते है। पर दोनोको जिस अतिसे अधिक सावधान रहना 
चाहिये, उसमे दोनो ही 'चूकते हैं, क्योंकि वाकी -रुपया चसूल 
कर नेका दद्भ ब्तलानेवाला चाद्दे कड़े पड़नेकी शिक्षा भी दे पर 
घनके साथ धर्मकी ध्वजा लेकर चलनेवाला धोखेमें भी क्रोव- 
को पापका वाप ही कहेगा । क्रोध रोकनेका अभ्यास ठगो ओर 
स्वार्थियोंकोी सिदूुध ओर साधकोसे कम नहीं होता। जिससे कुछ 
स्वाये निकालना रद्दता है, जिसे वातोमें फंसाकर ठगना :रहता 
है उसकी कठोरसे कठोर ओर अलुचितसे अनुचित चातोपर 
न जाने कितने लोग जरा भी क्रोध नहीं करते। पर उनका बह 
अकोघ न घमंका लक्षण है न साधन | 


इस विवरणसे सपष्ट है कि जेर उन्हीं प्राणियोमे होता है। 


( ७६ ) 


जिनमें धारणा अथात्‌ भावोके संचयक्री शक्ति होती है पशु 
ओर बच्चे किसीसे बैर नहीं मानते। थे क्रोध करते हैं और 
थोड़ी देरके बाद मूल जाते हैं। क्रोधषका यह सूथायी रूप भी 
आपदाओकी पहचान कएकर उनसे चहुत कालतक वचाये 
रखनेके लिये दिया गया है । 

अभ्यास 
( १ ) कोधके उतसन्न होनेका क्या कारण है ? 
(२ ) क्या सामाजिक जीवनके लिये क्रोध ऐसा मनोविकार भी आवश्यक है! 
(३) क्लोव सब मनोविकारोसे फुर्तोला होता है १ प्रमाणित करो । 
( ४) 'प्रतिकार' के लिये क्रोध केसे उत्पन्न होता है? उदाहरण देकर 

बतलाओ । 


(५) क्रोवको किस परिस्थितिमं और मनोविकारोंकी सद्दायता छेवी 
पढ़ती है १ 

( ६ ) इस पाठसे मानसिक-विज्ञानऊें विपयर्में तुम्हारे हृदयमे क्‍या थाएणा 
उत्तन्न द्ोतो है ? 

( ७ ) आविर्भाव, प्ररत, परोक्ष, अन्त करण, उपयुक्त इन शब्दोका छर्थे 
चतलाओ १ 


( ८ ) पाठक आधारपर 'कोध” पर एक छोटा निवन्ध रचो। 
( ९ ) चिरस्थामिनी, असस्कृतमें सन्धि घतछाओ ? 
( १० ) भसतर्झत क्रोध किसे कहते हैं १ 


'प्रकयन-मलु४+८ानम«त आकर 


( ७७ ) 
१६--प्रेम-प्रवाह 
[ क्षै०-पसिडित गोकुलचन्द्र शो, बी० ए० ] 

( जन्म वैशाख शुक्र १० स० १६४१ विं०, जन्म भूमि दरिनिगरा 
“अलीगढ' वर्तमान निवास-स्थान अलीगढ । आपने अपने ““परन्तप” नामसे 
द्रढ़ी छुन्द्र रचनायें लिखी हैं। आपकी अनेक कविता-पुस्तको में 'तपत्वी 
तिलक! एक उत्छ काव्य माना जाता है। हिन्दी-गय-रचना विषयपर 
आपने अभी द्वालदीमे एक भच्छी मौलिक पुस्तक लिखी है। आजकल 
आप अलीगढके एक हाई स्कूलमें अध्यापक हैं। लगभग १० बषोंसे 
आप दिन्दीकी सेवा कर रदे हैं 


८ (१) 
इच्छा नहीं इसमे है भगवन्‌ | दो सम्पत्ति हमारे पास। 
नहीं चाहिये आसादोका वह विज्ञास-मय सुखद्‌ निवास ॥ 
सोचें - सूखी दण-शय्या पर, कर फल्ष-पत्तो पर निबाह। 
पर समताका हृदय-भूसि पर रुद्वाल्ति द्वो प्रेम-प्रवाह ॥ 


(२) 
हाध्ठि हमारी घुघली होकर, घोरझा कभी न दे सर्वेश। 
भाठ-भावके शीशेमे से, देखे वबंघुबगे के फ्ल्लेश ॥ 
पतित जन्म-भूमिके छित दो, बदध्चा-बच्चा वीर वराह। 
रुधिरर्प मे उगढ़े अच्युत ! हन्निमिर से श्रेम-अचाह॥ 


(३) * 
स्वार्थ शुन्य हो सत्यमाचसे, मिल्ले नाथ हम सब जीं खोल। 
नीच भावफी कीच फाइकर, डउगे प्रीति पड्ुुंज अनमोल॥ 
तन, मन, घन, अप कर सेटे, देन्‍य-दासता दारुण दाह। 
हो खातंत्य-समीरएका फ़िर, भाधव | प्रचल्ति प्रेम अबाह। 


( ७८ ) 


(४) 
सहनशीलता साइससे दो भक्ति-पूर्ण , सच्चा अछुराग। 
सीखें सत्य ब्रत हित करना, सभी सम्पदाओका त्याग |] 
विपद्जका भ्रवलपात हो, पर निकले न कभी सी आद। 
चलते निरन्तर नेत्र नीस्से, साठ-भूमिका प्रेमअवाह ॥ 
अम्यपाप्त 
( १ ) प्रेम-अवाह, तृण-शैय्या, बन्धु-वर्गमे क्रीन समांस है ? 
( २ ) बिपद्ज्, नेत्र-नीर, हनि्माए, अच्युत, आदि दान्दोका अर्थ बताओ? 
( ३ ) 'दृष्टि हमारी-“हन्निर्मास्से प्रेम-प्रवाह” का भावार्थ समम्ताओ २ 
( ४ ) प्रेम क्या है ? और कितने प्रकारका द्वोता है १ 
(५ ) वात्सल्य-एसमें जो प्रेम वर्तमान है क्या वह देश-पेमसे विभिन्‍न है? 
( & ) छुद्ध प्रेम किसे कहते हैं १ 
( ७) इस पदके पढनेसे हृदयमे केसे भाव उठते हैं ? 
( ८ ) यदि ससारमें प्रेम का असिल न द्वोतो उसकी क्यों अवस्था 
द्ोगी ? 
२०--कबीर साहब 
[ ज्लै०-पं० रासनरेश त्रिपाठी ] 

( आपका जन्म सबत्‌, १९४६ विक्रमो, जौनपुर जिलान्तगंत 
कोयरीपुर भाममें हुआ। आपने 'परथिक' तथा 'सिलना नामक काव्य 
लिखकर तथा कविता-कोमुदी-अन्यमाला सम्पादित करके अच्छा यथौ- 
पाजेन किया है। आपकी कविता बढ़ी ही मावमयी होती है। आप 
प्रयागके हिन्दी-मन्दिरके स्वामी, पुस्तक्र विक्रेता और ऊँची श्रेणीके 
प्रकाशक तथा भावुक कवि हैं । ) 

संयुक्त प्रांतमें शायद ही कोई ऐसा हिंद होगा जो कबीर 


( ७६ ) 


साहवको न जानता द्वीगा। कवीर साहवके भजन सन्दिरोमें 
आर सत्संगतके अवसरोपर गएये जाते हैं। उनकी साखियोँ 
प्राय” कद्ावतोका काम दिया करती हैं। 

कवीर साहब एक पंथके प्रवर्तक थे, जिसे कबीर पंथ कहत्ते 
हैं। कबीर-पंथियोमे निम्नभेणीके लोग अधिकांश पाये जाते 
हैं। उनमेसे कुछ तो साधु दे जो गॉबोमे कुटी बनाकर रहते हैं 
ओर कुछ ग्रहस॒थ हैं। कवीरपंथी साधु सिरपर नोकदार पीले 
रंगकी टोपी पहनते है । 

कबीर साहब कौन थे ९? कहाँ और किस समयमें वे उत्पन्न 
हुए ? उनका असली नाम क्यू था ९ -बचपनमे बे कोन धर्मांव- 
कम्बी थे ? उनका बिवाह हुआ था या नहीं ९ और वे कितने 
समयतक जीवित रद्दे ? इन वातोमे बड़ा सतभेद है। कबीर 
साहवकी जीवनी लिखनेवाले मिन्न-मिन्न _ वातें वतलाते हैं। 
, उनमें सत्यका अंश कितना है, इसका पता लगाना सहज नहीं है। 
“कवीर कसौटी” से कचीर साहवका जन्स संवत्‌ १४४५ वि में 
ओर मरण १५७४ घिं० से होन! लिखा है। कबीर-पंथी लोग 
उनकी उम्र तीन सौ वर्णकी वतलाते हैं। उनके कथनालुसार 
कबीर साहवका जन्म १२०४ वि० से और मण्ण १४०४ विः से 
हुआ है। इनमेसे किसकी वात सत्य है ९? इसका निर्णय करना 
अडी खोजका काम है। कबीर पंथके बिद्दानोंकी रायमे कबीर 
साइवका जन्म सम्वत्‌ १४४४ दी सत्य कद्दा जाता है। 

कबीर साहबने अपनेको जुलाहा लिखा है। एक जगह वे 
कहते हैं --.. 

तू ज्ाक्मए में काशीका जुलाह्य बूमह मोर गियाना । 

( आदि अंथ ) 
इससे अब इस वातमे तो कुछ संदेह रह ह्वी नहीं जाता कि 


६ छ० ) 


कबीर साहब जुलाहे थे। परंतु वे जन्मके जुलादे नहीं थे, यह्‌ 
कहावतोसे मालूम होता है । 

कहा जाता है कि संवत्‌ १४४४ की ज्येष्ठ शुक्र पूर्णिमाको 
एक न्राह्मणकी विधवा कन्याके पेट्से एक पुत्र पेदा हुआ। 
लोक-लज्ञा-वश उसने वाल्क लहर तालाब (काशी , के किनारे 
फेंक दिया। संयोगसे नीरू जुलाद्या अपनी स्ली नीमाके साथ 
उसी राहसे आ रहा थां। उसने उस अनाथ वच्चेकों घर 
लाकर पाला। पीछे वद्दी कवीर नामसे विख्यात हुए। 


कबीर साहब बालकपनसे ही बढ़े धर्मपणायण ये। जब, 
उनको सुध बुध हो गई, तव वे तिलक लगाकर शाम राम करते 
थे। एक जुल्ादेके घरमें रहकर तिलक लगाना और राम राम, 
जपना असम्भव-सा अतीत होता है। परंतु संगतिका अभाव 
बड़ा विचित्र होता है, वह असम्मषको भी संभव कर देता है। 

ऐसी कहावत है कि कबीर साहव खामी रामानंदके 
शिष्य थे। खामी ग़मानंद्‌ शेष रात्रिमे गन्नासनानके लिये मणि- 
कर्शिका घाटपर नित्य जाया करते थे। एक दिन इसी समय 
कवीर साहब घाटकी सीढ़ियोपर जाकर सो रहे। अंधेरेमें 
खामीजीका पेर उनके ऊपर पड़ गया। तब बे छुलबुलाये। 
सामीजीने कहा--“राम-राम कह, राम-राम कह”। कवीर 
साहबने उसीको गुरु-मंत्र मान लिया। उसी दिनसे उन्होने 
काशीमे अपनेको खामी रामानन्दका शिष्य असिद्ध किया।, 
यवनके घरमे पालन होनेपर भी कवीर साहवकी अृत्ति हिल्दू- 
घमेकी तरफ अधिक थी | 

कवीर साहव अपने जीवनका निवाह अपना पैतक व्यव- 
साय करके ही करते थे। यद्द बात वे खय॑ खीकार करते 
हैं “हम घर सूत तनहिं नित ताना ।”? 


' ( ८5१ ) 


ऋबीर साहवने विवाह किया था या नहीं, इस विपयमे भी 
“2 बड़ा मतभेद है। कवीर-पंथके विद्वान कद्दते हैं. कि लोई नामकी 
स्ली उनके साथ आजन्स रही, परन्तु उन्होंने उससे विवाह 
नहीं किया। इसी प्रकार कमाल उनका पुत्र, कमाली 
उनकी पुत्री थी, इस विपयमे भी विचित्र वाक्तें सुनी जाती हे। 
५इचे वंश कवीरके, उपजे पूत कमाल” यह भी एक कहावतसा 
अखिद्ध हो रहा है। इससे पता चलता है कि कबीरने विवाह 
छ बश्य किया था और कमाल कवीरका पुत्र था। कमाल भी 
कविता करते थे। परन्तु उन्होने फवीर साहबके सिद्धान्तोके. 
खण्डन करनेसे ही अपनी सारी उम्र बिता दी। उसीसे ०“डूवे 
बंश कबीरके उपजे' पूत कमाल” कहा गया है। 


कवीर साइव पढ़े-लिखे न थे। सतसंगी थे। सतसखंगसे 

ही उन्होने हिन्दू-धर्मकी गृढ़-गूढ़ वार्तें जान ली थीं। उनके 

हृदयमें हिन्दू मुसलमान किसीके लिये छेेप नथा, बे सत्यके 

बढ़े पक्षपाती थे। जद्दा उन्हें सत्यके षिरुद्ध कुछ दिखाई पड़ा, 

43 उसके खण्डन करनेमें जरा भी द्विचकिचाहट नहीं 
। 


कथीर साहवने अपना अधिकार हिन्दू मुसलमान दोनोपर' 
जमाया। आजकल भी हिन्दू-मुसलमान दोनो अंकारके कबीर- 
पंथी मिलते हैं। परन्तु सर्वताधारण हिन्दू और मुसलमान 
दोनो का कवीर मतसे बेर, दो गया। हिन्दू धर्मके नेता एक 
अहिन्द्के मुखसे हिन्दू धर्मका अ्रचार देखकर भड़के ओर मुसल- 
मान, कवीर साहवके हिन्दू आचायेका शिष्य होने तथा हिन्दू 
घमंका अचार करनेके कारण कट्टर विरोधी हो गये । इस 
विरोधके कारण उनको वड़ी-बड़ी कठिनाइयों भोगनी पड़ीं॥ 
परन्तु उनके हृदयसे सदा सत्यका दीपक जल रहा था। व्‌ 


( ऊरे ) 


फकिसीके बुमाये न घुमा | 

कबीर साइबने खर्य कोई पुसतक नहों लिखी। वे सांखीः - 
आर भजन बनाकर कद्दा करते ये और उनके 'ेल्ले उसे कंठसथ 
कर लैते थे। पीछेसे वह सब संग्रह कर लिया गया। कबीर- 
हक अधिकांश «उत्तम-उत्तम ग्रंथ उनके शिष्योके रे हुए कद्दे 
जाते हैं । 
* _“ख़ास प्रन्थ” मे निम्नलिखित पुसतकको हैं। 

(कबीर पॉजी २--आननन्‍द यम सागर ३--शब्दावली 
४--रेखता ४--'फ्ूलन ६--ऋदरा ७--प्मैती +-साखी ९-बीजक। 

कबीर-पंथियोमे बीजकका बड़ा आदर है। वीजक दो है-- 
एक तो बड़ा, जो खयं॑ कवीर साहबका काशीराजसे कहा हुआ 
बतलाया जाता है और दूसरे वीजककों कवीरके एक शिष्य 
अम्युदासने संग्रह किया है । दोनोमें बहुत कम अन्तर है । 

कबीर साहवका उल्टा प्रसिद्ध है। मेरी समममे लोगोंको 
अपनी ओर आकर्षित कश्नेके लिये ही कबीर साहव ऐसा कहां 
करते थे। यो तो अर्थ लगानेवाले छुछ न कुछ उल्टा सीधा 
अथे लगा ही लेते हैं परन्तु खींच तानकर लगाये गये ऐसे 
अर्थोंसे कुछ विशेषता नहीं रहती । 

लोगोका ऐसा कथन है कि मगहमे भाण-त्याग करनेसे 
मुक्ति नहीं मिलती । मर्ला सत्यान्वेषक कबीर इस घातको कैसे 
मान सकते थे, उन्होने लोगोका यह असम भिटानेके लिये ही 
मगहमे जाकर शरीर छोड़ा। इस विषयमे उन्होने कह्दा है-- 

जो कबीर काशी मरे तो रामहिं कौन निहदोरा | 
जस काशी तस महगा ऊसर हंदय राम जो होर। 


कै कै क्र 
कबीर साहबकी कवितामें बढ़ी शिक्षा भरी है। एक एक 


( 5३ ) 


बदसे उनकी सत्यनिष्ठा प्रकट होती है। उन्होने जो कह है, 
आयः सभी एकसे एक बढ़कर हैं । 


अभ्पास 


(_ १ ) कबीर साहवके जन्मके सम्बन्धमें ठुम क्या जानते हो ? 

( २ ) कवीरदास किस धर्मके अनुयायी थे १ 

( ३ ) कवीरदासका स्वभाव कैसा था? 

( ४ ) आजकलके वरारमिक विचारों ओर कबीरदासकी भावनाओमें 
कितना सामछत्य पाया जाता है १ 

( ५ ) कबीरदासकी रचनाआमें कौनसो सबसे श्रेष्ठ सममी जाती है 
और किस दृश्सि १ 

( ६ ) स्वामी रामानन्दने उन्हें कब गुएनदीक्षाका मत्र दिया? 

( ७ ) कवीरदास किस जातिके थे १ 

( ८ ) कबीरदास पराखडके कट्टर विरोधी थे । सिद्ध करो ? 

( ६ ) जो कबीर काशी “ * निदोरा। 
उपयुक्त प्दसे कबीरदासका रामके प्रति हडविज्ञास भ्रकठ होता 
है| कैसे ४ प्िद्ध करो । 

( १० ) कवीरढासकें जीवन-चरिज्रपर एक निवन्य तेयार करो । 


२१--सजन-संकीत्त न 
[ ज्ञे०--ठाकुर गोपालशरण सिंह ] 

( जन्म पौष शुक्क प्रतिपदा स० १९४८ । आप रीवा राज्यान्तगंत उच्च 
अणीके प्रतिष्ठित इलाऊेदार है। सस्कृत और अगरेजीका आपको अययेष्ठ 
ज्लान है। हिन्दीऊे वर्तमान कवियोंमे आपका स्थान बहुत उम्च है । वाल्य- 
नकालसे ही आप कविताके प्रेमी है और विद्याथी जीवनसे दह्टी कविता करते 


( झट ) 


भा रहे हैं। स०.१९८२ में होनेवाले अखिल भारतीय कवि सम्मेलनके, 
जो इन्दावनमे हुआ था, आप सभापति मनोनीत हुए थे। भापका 
स्वभाव कोमल और भ्रजाप्रिय है। 


(१) 
जन्म अहण यद्यपि लाखो नर, प्रति दिन प्रथ्वीपर करते; 
जननी जन्म भूमिका आनन, उज्ज्वल सदा तुम्दीं करते 
द्ोते उदित गगनमें अगणित, अह नक्षत्र ओ तारे; 
सूर्य शशि ही किन्तु लोकको, फरते आलोकित प्यारे ॥ 


(२) 
कितनाही हो कलश भयंकर, तुम न तनिक घवराते हो; 
अपने कत्तेव्यों को जीसे; सदा सहप निभाते हो। 
अमणा, फष्टपर ष्यान न दे रवि, चक्कर नित्य लगाता है; 
धरणी घारण किये शीश पर, शेप नहीं उकताता है ॥ 
/ (३) 
बुरे भाव हृदयसथलमें तुम, कमी न आने देते हो; 
मनकी निनन्‍्य नीच कर्मोंकी, ओर न जाने देते हो। 
प्रवत्न उपद्रव भी न तुम्हारी, शान्ति भंग कर सकता है ; 
निसतव्धता नीर-निधिकी क्या, भव्मानित् हर सकता है? 


(४) 
तुम्दे अन्यका कष्ट देख कर, मर्मोन्‍तक दुख द्ोता है; 
“ पर-द्धित-सम्पादनमें तुमको, सोख्य सबंदा होता है। 
अन्य देश-वासी जनका भी, क्ल्लेश हषेसे दरते हो; 
अपनी पावन प्रेम्त राशिसे, पावन जगको करते हो ॥ 


(४) 
छुःखित दीन जनोसे तुम अति, सहानुभूति दिखाते हो; 
भूले भटके लोगोंको तुम, सत्रथ पर ले जाते हो। 


( ८५ ) 


होनेपर, परतन्त्र तुम्हारी, अकृति न पलटा खाती है 

परवश होनेपर भी कोक्तिल, सीठी कूक सुनाती है 
( ) 

कुछ भी हो पर सत्यत्रतको, छोड़ नहीं तुम सकते हो 

सदाचारके नियम कभी भी, ठोड़ नहीं तुम सकते हो 

तुम न कुपथ पर चल सकते हो, चादे प्राण चला जावे 

सच्चा वही धीर-धारी जो, सक्ूुट समय न घवरावे ॥ 


( ७) 
तुम समाजके दोप सदा ही, निर्मय होकर दिखलाते; 
वह उपाय उसके सुधारके, सोच सस्मक्तर वतलाते। 
अत्याचार किसीका तुमसे, ज्षणभर सद्दा न जाता है; 
तुम रहते हो जद्दों, चद्दों नित, का फदराता है ॥ 


आरोका गुण-गान श्रवशकर, मुदित सदा, तुम हो जाते: 
किन्तु प्रशसा अपनी सुनकर, अति बिनीत हो सकुचाते 
उल्नति-अवनंति दोनोंमे दम, तुम्हे प्रसन्न-चिच पाते 

अरुण वर्ण दो उदित दिवाकर, असुत अरुण ही हो जाते ॥ 


( ६) 
अपना समय अमूल्य कभी तुम, व्यथे न जाने देते हो ; 
काम शक्तियोसे तुम अपनी, पूर्ण रीतिसे लेते हो। 
कहीं रहो पर दृष्टि" तुम्हारी, सदा लोक-द्वितपर रहती 
रहे कहीं भी सुधा सुधाकर, से सदैव द्वी हे बहती॥ 


अभ्यात्त 
६१ ) सजनोके स्वमावका वर्णन करो । 
( ३२) से, चन्द्र, कोकिल और शेपनागके शुण-विशेषकों अपने दा्दोंमिं बर्ण- 
करो । 


( 5५ ) 


( ३ ) अरुण वणे.. हो जाते” मे भाव बतलाओ | 

(४ ) निस्तब्वता, कम्रानिठ, सम्पादन, सहालुभूति, परतन्त्रके शब्दार्थ 
बतलाओ । 

(५ ) भर्मान्‍्तक, न्याय-केंतु, नीर-निधि, छोकहितमे समास वतलाओ | 

( ६ ) सजनोंके गुणोपर एक छोटा-सा निवन्व तैयार करो। 

(७ ) तुम्हें सजन वननेके लिये किस विशेष गुणकी आवश्यकता पढ़ेगी। 

(८ ) इस पद्मसे तुम्हें क्या शिक्षा मिलती है 

२२---चरित्र-संगठन 

[ ल्ै०--वाबू गुल्ाव राय एम० ए०, एल० एल० बी० ] 

( वावू गुल्वाव गय एम० ए०, हिन्दीके सिद्धृह्त लेखक और दर्शन- 
शास्रके अच्छे विद्वान हें। आप छतखुर राज्यक्े-उच अधिकारियों 
हैं । आपने रस, तरंशाज़ आदिपर अनेक अन्य लिखे है। आपके फुटकर 
छेख समाचार पत्नोमे निकलते रहते है। यह छेख भी उन्हींमेसे एक है। ) 

मलुष्योकी विशेषता उनके चरित्रमें है। यदि एक मनुष्य 
दूसरेसे अधिक आदरणीय माना जाता है तो वह उसके चरिज्रके 
कारण। भलुष्यका आदर, उसके पद, धन, विचारके कारण 
द्वोता है, परन्तु यह सब एक अकास्से बाह्य है। पद स॒थायी नहीं 
यदि सूथायी भी हो तो उसके लिये जो आदर 'होता है, वह 
अयके कारण | धनका आदर बही करेगा जिसको घनीसे कुछ 
लाभ उठानेकी इच्छा हो । विद्याका मान सज्बन अवश्य करते 
हैं। वह भी जब विद्या, विनय एवं चरित्रसे युक्त हो। रावणमें 
विद्या, धन, बल ओर पद होते हुए भी वह अपने यक्षसी कमेके 
कारण निन्दुनीय था। राक्षस साक्षर होकर बन्दनीय' नहीं 


बन जाते । 


€ ८७ 9 


महुष्यका मूल उसके चरिज्रसे है। चघरिजत्रमें ही उसके 
आत्मवलका प्रकाश द्वोता है और यह पता लगता है, कि उसकी 
आत्मा कितनी वलवती है। मनुष्यका चरित्र द्वी बतलाता है 
कि वह कितने पानीका है । है 


यह चरिज्न क्या है, जो इतना महत्त्व रखता है ९ यह चरित्र 
उन गुणोका समूह है, जो हमारे व्यवद्रसे सबंध ख्खते हैं। 
दार्शनिक बुद्धि, वैज्ञानिक कौशल, काव्यकी प्रतिमा ये सब वाँछ- 
नीय हैं परन्तु ये इसारे चरित्रसे सम्बन्ध नहीं रखते फिर 
चरित्र में क्या वात आती है ? विनय, उदारता, लालचमें न पड़ता | 
घेये, सत्यमापण, वचनका प्रतिपालन एवं कत्तेज्यपरायणता आदि 
गुण चरित्रमे आते हैं.। चरिजमे इन सब बातोके अतिरिक्त और भी 
वहतसी वातें हैं, परन्तु ये मुख्य हैं।। ये सब गुण आय. खाभा- 
बिक दवोते हैं, परन्तु अभ्याससे वढ़ाये एब पुष्ट किये जाते है। 
अभ्यासमे सत्संग्से वहुत सद्दायता मिलती दै। अभ्यासके लिये 
वाल्यकाल द्वी विशेष उपयुक्त हैे। वह काल वनावका है। वनते 
समय जैसा मनुष्य वन जावे वैसा हीं, चह जीवन पय्यन्त रहता 
है। वाल्यकालमें सनायु-ससथान कोमल तथा अन्ध कार्य्य-संसकारो 
से दूषित नहीं दोता, इस कारण उस कालमे जी अभ्यास 
डाला जाता दै, वह सहजमे द्वी सिद्ध हो जाता है। ओढ़ा-- 
बसथामे अन्य संसकारोके दृढ़ हो जानेके कारण नये ससकार 
कठिनाईसे जमते हैं। 


सनुष्य-जीवनका अभात, जिसमें सब प्रकारकी शक्तियोके , 
विकासकी संभावना होती दे, विद्योर्थी-जीवनमे व्यतीत होता है। 
जो लोग इस विद्यार्थी-जीवनमे हमारे पथ-प्रदर्शक हैँ, उनका परम 
उत्तरदायित्व दै कि यह काल केवल जान सम्रहमे, ही न चला 
जावे। वाल्यवसथा फिर लौटकर नहीं आती। भावी चरित्र 


( छझे ) 

निर्माण करनेका यही सुअबसर है। विद्यार्थी ओर शिक्षक अपने 
अपने उत्तरदायित्वको समझ सीचे लिखे सिद्धान्तोपर ध्यान दें 
आर इनसे विद्यार्थीके चरित्र संगठनमें सहायता लें। यत्यपि यह 
सिद्घान्त आचीन कालसे बताये जा रहे हैं. और इसीलिये इनपर 
कुछ लिखना नीरस पिष्ट पेषण ससमा जाता है, तथापि इनके 
प्रचारक्री इतनी ही आवश्यकता है जितनी कि प्राचीन कालमें 
थी और चरित्र संगठनकी आवश्यकता देखते हुए इनपर विवेचन 
करना समयका दुरुपयोग नहीं समा जावेगा | 


विनय 


विनय विद्याका मूपण है। बिना विनयके विद्या शोभा नहीं 
देती। भ्रीमद्भगवद्गीतामे ज्राज्मणके विशेषण “विद्या विनय 
सम्पन्न” कहा है। जिस विद्याके साथ विनय नहीं है उससे. 
कोई लाभ नहीं उठा सकता । विनय केवल विद्याको ही नहों, वरन्‌ 
धन ओर वल दोनोको दी शोभा देती है । भम्ृगुजीने कृष्ण सगवानके 
वक्ष सुथलपर लात मारी तबी भगवान्‌ पूछने लगे कि महराज। 
आपके पेरें चोट तो नहीं आई। विनयका क्या द्वी उत्तम आदरोे 
है । घिनय केवल शिष्टाचारके लिये ही आवश्यक नहीं है परन्‌ 
इससे आत्माकी शुद्धिध होती है। विनयशील मनुष्य अमिमानके 
वचा रद्दता है। नम्र-साव दूसरेमे प्रेम-भ[व उत्पन्न करता है 

ओर अपनेसे अपूर्व शान्ति अनुभव करता है। धन, वल ओर 
विद्याके होते हुए भी जो विनय करता है उसको कोई कायर नहीं 
कह सकता । सय-वश विनय आत्माकों गिराती है कितु भेव और 
निरसिसानताकी विनय आत्माका उत्थान करती हे। विनयका 
अभाव एक प्रकारका खोखलापन प्रकट फरता है। जिन लोगोमें 
कोई श्लाघनीय गुण नहीं द्ोता, वह अपनी एंठ व्था डॉट 


( 5६ ) 


'फटकारसे लोगोपर प्रभाव जमाते हैं, किन्तु गुशवानोकों इसकी 
आवश्यकता नहीं, उनका प्रभाव खत सिद्ध है। यदि विनयशील 
मनुष्यका समाजमे प्रभाव थोड़ा हों तो विनयशील मलुष्यका 
दोष नहीं। यह समाजका दी दोप है ओर इसके अतिरिक्त श्रेस- 
का प्रभाव चाहे थोड़ा हो, दवावके प्रभावकरी अपेज्ञा चिरसथायी 
होता है। यद्यपि थोड़ी देरके लिये मान भी लिया जाय कि 
विनय सव स॒थानोमे कास नहीं ठेती, ' जेसे शत्रु के सम्भुख ) 
तथापि हमकी यह कहना पड़ेगा कि चिनयशील पुरुषकों ऐसे 
कम अबसर आवेंगे जब कि उसे अपनी विनयके कारण गोरब 
हानिका दुखद अनुभव करना पड़े। 


उदारता 


इदार्ताका अभिशवाय केबल लि संकोच भावसे किसीकी वन 

दे डालना नहीं वरन्‌ दूसरोके प्रति उदारःमाव रुखना भी है। 
उदार पुरुष सदा दूसरेके विचारोका आदर करता है ओर समाजमे 
सेचक भावसे रहता है। “उदार चरित्तानां तु वुधैव कुढु- 
स्वकम्‌” से जो उपदेश दिया गया है, वह केंचल धनकोी उदारता 
नहीं वरत्‌ उसमे प्रेस और सेवाकी भी उदारता सम्मिलित है। 
बहुतसे लोग आपकी घन-सम्बन्धी उद्रताकी अपेना नहीं करते । 
चहुतसे निर्धन भी इस चातकी अपनी निर्धनताके गोरबके विरुद्ध 
सममते दें कि चुद आपकी आर्थिक सहायता लें, किन्तु वह 
उदारतायूरं शब्दोके सदा भूखे रदते है। यह न सममो 

कि केवल धनसे दी उद्चारता दो सकती दै, सब्ची उदारता इस 
वातने है. कि मनुष्यकों मनुष्य समझा जाये। उसके भावोका 
उतनाही आदर किया जाबे जितना अपने भाषोंका | ऐसा आदर 
उदारता नहों, बर्न कर्चठ्य है। अत्येक मनुष्यमे आदरणीय 
गुण होते हैं। यह न सममना चाहिये कि घन, विद्या अथवा पद्‌ 

छ 


( ६० ) 


ही आदरके विषय है। गरीब आदमी यदि ईमानदार हैतो. 
बह बेइमान घनाव्यकी अपेक्षा आदरणीय है; क्योकि गरीवीदे 
ईमानदार रहना और भी कठिन है। 


छाडच 


मनुष्य जितना ही बलवान माना गया है उतना ही कप्रजोर 
है। जरासे अविचारसे मनुष्यका पतन दो जाता है और बधर्षोंका 
तप घूलमे मिल जाता है। लालच केवल घनका दी लालच 
नहीं, धरन्‌ हरएक ग्रकारका लालच होता है। लालच इसलिये 
दिया जाता है कि मनुष्यु खनकत्तेन्यसे च्युत हो जाय, किन्तु 
मनुष्यकी श्र छता इसीमे है कि चह न्याय पथसे न हटे। महाराज 
दिल्लीपको हर प्रकारका लालच दिया गया, किन्तु वह. फैत्तेब्ये 
न हंटे। अप्राप्य चसूतुके त्यागसे, श्राप्त बसूतुका त्याग अधिक 
कठिन है। यद्यपि लालचके होते हुए लालचके ऊपर विजय 
आप्त कर्नेमे बहादुरी है तथांप विज्ञ-पुरुपषकों यद्दी चाहिए 
कि वह लालचसे दूर रहे | इसाई लोग इेश्वरसे प्राथेना करते हैं 
“या खुदा मुझे परीक्षामे मत डाल ।” जहॉतक हो थोड़ेसे लालच 
से भी बचनेका प्रयत्न किया जाबे। जो लोग थोड्रेसे लालचपर 
विजय नहीं पा सकते वह लालचसे वचनेमे असमर्थ हैं। हमारे 
यहां भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रका ज्वकुंत उदाहरण मौजूढ़ है। 
उन्होने साम्राज्यया लालच छोड़ा और कर््तंव्यसे विभुखन 
हुए। यदि जरा ढील डालते तो महाराजा दशरथ तुंरत अपने 
बचनसे फिर जाते । 


धेर्य 
कठिनाइयोमे चित्तको सिथर रखना घैये कहलाता है। मलु- 
ध्यका-जीवन पथ कण्टकाकीणें हे। मनुष्य-जीवनमे कठिनाइयों 


( ६१ ) 


' आदी ही हैं, किन्तु उनका सामना ज्ञानी लोग ज्ञानसे करते हैं 
एवं भूल लोग येकर। कठिनसे कठिन सिथतिमें असच्न रहना 
आत्माकी उच्चताका सूचक है। हमको अपनी अध्यात्मिकताका 
गौरव है। 'कठिनाइया आयः वाह्मय दोती है। यदि दस उनपर 
विजय पा लें तो अच्छा ही है और विजय न पा सके तो उनसे 

दुखी होना कायरता है। कठिनाइयोसे दुखी होनेसे बह 
बढती ही हैं, घटती नहीं। हमको अपनी शक्तियोसे निराश न 
होना चाहिये। कठिनाइयोंसे दुखित न द्ोना द्वी उनपर विजय 
पाना है। कठिनाइयोमे दुखित होना अपने विपक्षियोकी जीत 
सूवीकार करना है। राजा हरिश्न्द्र धैयंके ज्वलन्त उदाहरण हैं । 
श्रीरामचन्द्रजीके लिये कद्दा जाता है कि राज्याभिषेकके कारण 
सनकी हपे नहीं हुआ ओर बनबाससे स्लान-मुख भी नहीं हुए । 
इसीसे चे जगत्‌ चन्दनीय हो रहे हैं । 


कर्त व्यपरायणता 


सत्यके अतिरिक्त कर्त्तव्यमे और बहुतसी बातें आती हैं, 

शेपमें एक व्यापक बात 'रख दी गद। यद्यपि यह कहना 
कठिन है कि कर्चेव्य क्या है, तथापि मोटी रीतिसे सब लोग 
अपना-अपना कर्तव्य जानते है। जो बातें वचनेकी हैं उनसे 
बचना चोहिये। वस, यही कत्तेन्यपरायणत्ता है। अपने कत्तेब्य 
से शेथिल्य न डालना चादिये। जहाँ जरा-सा छिद्र हुआ वहां 
सम्‌मना चाहिये कि पतनका हार खुल गया। कत्तेंन्य बह नहीं 
जो केवल कागजपर लिखा हो। अत्येक सिथतिके अनुकूल अपना 
कत्तेन्य निश्चित कर हमको उसके सम्पादनसे आरूद रहना 
चाहिये। हमको केवल कत्तेव्य द्वी नहीं वरन्‌ अपने कत्तेन्यसे 
भी अधिक करनेके लिये तैयार रहना चाहिये। अपना सबक 


( धरे ) 


याद करना हमारा कच्तैव्य है, किन्तु सामनेके घरमें आग लगी 
हो तो सबक याद करनेकी अपेक्षा आग बुमाना ही हमारा 
कत्तंव्य है। कर्तव्य पालन करनेमें ही दमारा 

कायम रह सकता है और आलसयवश या लोभवश कत्तेन्यसे 
च्युत दोना दी हमारा पतन है । 


अभ्यास 


( १) कोई मलुष्य दूसरोंसे आदरणीय कब समम्ता जाता है? समममा- 
कर बतंलाओ । 

(३ )) चरित्र क्या है, चरित्रका मनुष्यपर क्या प्रभाव पढ़ता है. १ 

( ३ ) कब घरित्रका अभ्यास हो सकता है? , 

(४ ) विनय विद्याका “भूषण” है, इसे समनताओ + 

(५) मलुष्योंकी दुखकी ओर कौन ढकेलता है, इसमें चरित्रवछ कहाँ- 
तक सहायक होता है / 

(६ ) घैयेका कोई ज्वलन्त उदाहरण दो। यह चरित्र निर्माणके लिये 
किन्नना आवश्यक है ? 

( ७.) विद्यावल, और धनवलसे, चरित्रवल क्यों उत्कृष्ट समा जाता है! 

( « ) चरित्र-निर्माणममे छालूच पतनोन्मुखक्री ओर छे जानेवाला क्‍यों 
समम्का जाता है  त्यागका क्या महत्व है १ 

( ९ ) उदार पुरुषके क्या लक्षण हैं ? 

(१०) चरित्र-पालनपर एक निबन्ध तेयार करो । 





( ९४३ ) 
२३--संसार सार ' 


[ ले०-ऊुमारी शान्तादेबी विद्ुपी “इन्दुः ] 
[१] 

। क्यो कहते इसे असार, 

भीरस है यह संसार, 
तुम्हारी है यह भारी मूल, 
मिलेगा" इसमें तुमको बार 
[२] 


ने, 


जगत्‌ केवल है झूठा सवप्न, 

विश्व केवल मायाका जाल; 
सूवप्र यदि यद्द १ तो क्या है सत्य ९ 
बता दो मुभकोी सारा द्वाल। 


( ६४ ) 


[४] 

इसी अममें यह जीवन-काल, 

बीतता जाता सारा हाय ! 
छोड़ दूँ चेष्टा करना भी, 
करूँ या कोई और उपाय ९ 


[६] 

पाप ओ पुण्य, भिन्न दो वसतु, 

लगे इस भानव-तनके,. साथ, 
खींचते अपनी-अपनी ओर 
किधर जाऊँ अब-मेरे नाथ 


[७] 

सत्य होषे या दोषे मूठ, 

मुके तो है यह भिय संसार; 
तुम्दे करने को अभुवर ! भाप्त, 
मिला है मुझे: यद्दी शुम द्ार। 
[८] 

तुम्हारी लीला लीलामय, 

जानता कोन, किसे है शक्ति ९ 
बचा लो मुमको भव-भय से, 
चरण कमलोकी देकर -भक्ति | 


अभ्यास 


( १) ससार असार नहीं है। इस पदके आधारपर सममाओ | 
(२ ) छेखिकाको यह ससार क्यों प्रिय है ? 

( ३ ) ससारको सृष्टि रुका ही विकास है। सम्रकाओ १ 
(४ ) अर्थ बतलाओ-- 


( ६४ ) 
(५) शब्दार्थ वताओ--- 
असार, नीरस, भान, मिथ्यामास, कन्पना । 
(६ ) छंद ४ का अन्चय करो । 
(७ ) सन्धि विच्छेद करो--मिथ्यासास, सत्पप्रकाश, नीरस । 
(८ ) जगन्‌ सार॒पर एक छोटासा निवन्ध तैयार करो । 





२४---प्रामवास और नगरवास 
[ लि०--पं० अम्बिकादत्त ज्यास ] 

( जन्म सम्वत्‌ १५१० वि०, स्वगेवास सम्वत्‌ १९७६ वि०, निवास 
स्थान, काशी । व्यासजी सस्कृत-साहित्यके दिग्गज विद्यान, हिन्दीके चढ़े 
अच्छे लेखर्क और वक्ता '। आपने “पियूत्र प्रवाह” नामक मासिक पत्र 
निकाला या। आप दी इसके सम्पादक भी थे। आपके लिखे सस्कृत 
और दिन्दीऊफे अन्योकी सख्या लगभग उ८ है। आपकी गदय-काम्य 
मीमासा पुस्तक बढ़े मद्दत््वकी ऐ ) 

लोग सममते हैं बडे यशस्घ्रो, घड़े पुरुपार्थी और बड़े 
विद्यानकों उत्पन्न करना नगरका ही काम हे। भाभवासी कहो- 
तक बडे हो सकेंगे, क्योंकि यह प्रसिद्ध है कि “गांवके गवार! | 
चे लोग सद्य यह सप्रमते हैं. कि गॉवमें सदा मैंस, बैल ओर 
मेड़का साथ रहता है। हल, मूसल, छुदाल और ऊखल आदिके 
अतिरिक्त और कुछ देखनेफ़ों नहीं रहता, अतः ऐसी संगतियें 
रहनेवाला क्या उन्नतिकी योग्यता रख सकता है ? यद्द योग्यता 
नगए-निवासोमे ही आ सकती हे, जहां सब अकारके पदार्थों के 
देखनेऊका अवसर रददता है। परन्तु यह उलटी बात है। नागरिक 
चटनाएँ' ऐसी होती हैं. जिनसे मनुष्यकी मनुष्यता अवनत होती 


( ६६ ) 


हैं न कि उन्नत । कलकत्ता, वम्बई आदि बड़े नगरोके निवासियों- 
पर कामका ऐसा चकर आता है कि उन्तके हृदयकों क्षणमात्रका 
भो अवसर नहीं मिलता | अ्रति क्षण सैकढ़ो काये और घटनाएँ 
सिस्पर गरजा करती हैं। नाना प्रकारके सुख-दुःखोकी परन्प 
राओके ज्लोत प्रवाहित रहते है। चिन्ताकी राक्षसी सदा छाती- 
पर पॉव धरे ही रहती है। इन घटनाओमे किसीका आरम्म और 
किसीका अन्त ओत-प्रोत होकर ऐसा महाजाल वन जाता है, 
कि उससे जी ज्यो-व्यों सुलमना चाहता है, त्यो-त्यों ओर भी 
उलमा ही जाता है। बस, रातको चिन्ताओके सपने देखते-देखते 
भातःकाल हुआ। चारो ओरके जन-रब और सड़ककी गाड़ियोकी 
घर्राटोसे नींग खुली। प्रकाशकी चसक देखनेके पहले ही ममक- 
कर कामोकी धमक मसितष्कमे जा पहुँची और लगा जी उसमें 
कर खाने | या३ टहलनेका नाटक़ करना हुआ तो पहले तो 

कल्पित सम्यताकी रक्ताके लिये अगकों ऐसा लंपेटा कि प्रातः 
कालकी पवित्र हवा आलिंगन कर आनन्दित करने न पाते । फिर 
एक पतली-सी सुटकुनियां हाथमें ली जो न तो अपना त्रोकः 
सम्हाल सके ओर न शत्र को हटा सके, फिर पैर खटखटते निकल 
पड़े तो आती जाती गांडियोसे वचते, सड़क भाइते हुए मंखोड़ 
माड, दारोकी भाड़ी थूलको रेशुकाओकों पलक ओर भेद्योपर 
रमाते, भेहतरोकी बगलोसे सटते ओर उंचे-ऊंचे गृहोंकी मलीन 
जड़ोंके समीपसे यात्रा करते चले आये ओर यह प्रथम अभिनय 
समाप्त किया। घरनें घुसते द्वी पुरानी चिट्ठी-पत्रियोका उत्तर 
घसीटने बैंडे ओर धमसे नई डाक आ पहुँची । बस, अब कोई 
चिट्ठी इंसाने लगी कोई रुलाने लगी । किसी चिट्ठीने कोई 

समाप्त किया ओर किसीने नग्रे कामको ,टांग पसारी। अब 
इतना काम फैल गया कि लड़का भी सामने आच तो दुरदुगया 
जाता है ओर ज्वी भी कुछ बोलना चाहे तो उसे अवसर नहीं 


( ६७ ) ८ 


दिया जाता । योही चटपट और काम कर खाने-पीनेंका भी 
प्रहसन कर लिया जाता है प८ उसमें सन कहीँ ओर द्याथ कहाँ । 
अब अपने प्रधान कार्यालयोपर परिकर कसे गये और बातकी- 
बातने दिन समाप्त । थके-मादे कुछ टदजे, कुछ संबाद-पत्र पढे, 
कुछ दादा ही-ही की, कुछ ममट देखें सुने और महद्दाकाये-जाल- 
की चिन्तामे चित्तको चक्कर खिलाते सोये, वस, जैसे उत्तद्न- 
तरच्नसे तरमित महासमुद्रके पर्वंत-कूलपर नहानेवालैकों जल- 
क्रीडाका कुछ आनन्द नहीं मिलता, किन्तु भाकोरोंसे दी आण 
बचाते समय जाता है, वैसे नागरिकोको जीवनका कुछ भी 
आनन्द नहीं मिलता, किन्तु कार्य-प्रवाइके धक्के द्वी बचाते 
प्राण जाते है । 


जो ओमसे रहते है. उनके कानोमे गाड़ीके घर्राटेके ओर 
जन-कलकलके घट नहीं रहते, स्वच्छुन्द विद्दार करते शुक-पिक- 
मयूरोकी कुठुकोकी मधुरता छाथी रहती है! वे घर बैठे ही 
पुष्पीकी परागोसे पीत मकरत्द-कणोंसे आद मंद-मद चलती 

५ ०५ कप 0, तियोंकी ] 

हवाका आनद उठाते है। ये खभाव-सिद्घ ही वनसप 
सुगन्वसे छुगन्वित रहते हैं । वो जिधर ही ऋृष्ट डाले उधर ही कहीं 
पके आमोके बोकसे भुकी हुई डाल ठेख पडेगो और कहीं 
जामुन चुआते बृक्त ठेख पड़ेंगे। जहों तक दृष्ठि जाय वद्दोतक 
घानोसे तरणित खेत ओर कट्दी खिलें कमलोसे व्याप्त सरोवर 
देख पडे गे। धारोष्ण-दुग्ध, उसी क्षणका मथके निकाला मक्खन 
'तथा ढटके फल ओर शाकका स्वाभाविक सोजन है। शारी- 
रिक परिश्रम उनका नित्य-कर्त हे। कृपि-कर्म और आकाशकी 
बृष्ठेठके. फन्न देखत-डेखते उद्योग और डैवका माहात्म्य उन्हें 
सीखना नहीं पडता। उनके शारीरमे सुकुप्रारताका रोग नहीं 
रहता, जिससे बिना गुलगुले गद्दी-तकियोके सो ही न सकें 


( ध्८ ) 
ओर घधाममे निकले तो सिर-पीड़ा और चरसातमें भाँगें तो 
सन्धि-पीड़ा। उसका दीपक प्रबल रहता है, अंगोमें शक्ति रहती 
है, वे चिरंजीबी होते हैं। इन्द्र कारणोसे उद्ाग-चरित और 
मद्दापुरुप होनेके योग्य उनका मसितष्क रहता है। अतएब 
नागरिक बड़ी शिक्षापर भी उतना बड़ा पुरुष नदों होता, जितना 
. दिद्वाती पुरुष थोड़े समय शिक्ता पानेसे दही दो सकता है। हा, 
यह दूसरी बात है कि अन्यान्य घटनाओके विषयमें नागरिककी 
बहुअता रहती है और दिद्दातीकी नहीं। पर साथद्दी साथ यह 
भी है कि नंगरोमे जेसे लॉकिक घहुज्ञता सम्पादक, कहीं धूम- 
चामके व्यापारवाज्ले गुदुम और बाजार रहते हैं, कहीं बढ़ी 
बढ़ी नाव्यशालाओंम नाटकामिनय दोते हैं, कहीं “घुड़दोड़ 
ओर मेले द्दोते हैं, कहीं इन्द्रजाल, खेल, संगीत और ज़्त्व होते 
हैं परन्तु वैसे ही कहीं नित्य चोरी, मारपीटके हल्ले, कहीं ठग 
और धूतोंके बखेड़े आदि ऐसी घटनाएं भी द्वोती हैं, जो ब्ृत्तियों 
को बिगाड़ें और धृत्तेताके अकुर जमावें। लोग सीधे-साधे 
दिद्ातीको दिद्वाती कद दुरदुरा देंते हैं। पर जैसे दिद्दाती पदसे 
यह मलकता है कि ज्ोकिक विपयोगे चतुर नहीं, बैसे द्वी यह 
भी मलकता है कि वह सीघा, सच्चा, निष्कपट और सब्मन है। 
हिरहुतका एक इतिहास प्रसिद्ध है कि किसी समय बहांके 
महाराजने एक परिडतजीसे पूछा, कि अभी सूर्य उत्तरायण हुए 
कि नहीं, पडेतने कहा कि पंचांग देखकर कहूँंगा। वबतक 
एक कोनेमे एक छुम्दार खड्ा था, वह बोल उठा कि महाराज 
उत्ततयण हो गया। पंढितने उपेक्षायृबंक कद्दा, कि सू क्या 
जाने, अभी नहुआ द्ोगा। उसने कद्दा, उत्तरायण दो गया, 
इसमे कुछ भी सदेह नहों। इतनेमे पंचाग मंगाया गया। 
वंडितजीने देखा तो विदित हुआ कि लगभग पन्‍द्रद दिन पूे 


( ६६ ) | 
ही उत्तरायण हो चुका है। महाराज और पणिडितने उससे 


पंढित हो । कुम्दारके लिये मद्दाराजके मुदसे जो पडित शब्द 
निकला उसका ऐसा प्रभाव हुआ कि आजकल अमिथिलामें 
झुम्दारमात्र पंडित कहलाते हैं, इत्यादि नामा उदाहरण हैं, 
जिनके द्वारा किसी-किसी विपयकी बुद्धिमता आमीणोंमें ही 
अधिक पाई जाती दै। फलत इसमें कुछ भी सन्देद्द नहीं कि 
महापुरुष होनेकी योग्यता जैसी प्रामीणोंमें छोती है. चैसी 
नगर-निवासियोमें नहों, क्‍योंकि दया, क्षमा, शील, विश्वास, 
अद्धा, निष्कपट, छइतक्षता, गुणम्राहिता, परिश्रम, पारसूपरिक 
सनेह आदि गुण जिसमें रहते हैं, वही महापुरुष दोनेका 
अधिकारी होता है । 


अभज््यात 
(१ ) आम्य-जीवनसे नगर-जीवनमे क्या विशेषता है ? 
(३ ) शुम आम्य-जीवन और नगर-जोवनमें किमको पसन्द करते हो २ 
(३ ) आम्य-जीवनमें क्या-क्या विशेषताएं हैँ ॥ 
( ४ ) आाम्य-जीवनमें शातिका अनुभव क्यों होता दे १ 
(५ ) जीवनम शातिका मद्दत्तत आममें अविक क्यों सुगम है ? 
(६ ) तुम प्राम्य-जोवन और नयर-जीवनमे किसे उत्तर समझते दो? 
(७) दे क्या सुविधाए दें जो नगरसे झुलम हैं किन्तु प्रामे नहीं 
( ८ ) ग्राम ऐसी कौन-छौनसी वस्तुएं हैं जो नगरमें निरन्तर भप्राप्य हैं! 


/ जा “|. “ 


( १०० ) , 
२५---मुरकाया हुआ फूल ' 
[ ल्ैे०--महादेवी बर्मो ] 


( भाप सुक्त आ्रतकी कायस्थ महिला हैं। आप एम० ए० हैं। 
'हिन्दीमं सरस और आदश कविता करनेमें आप सिद्धहस्त हैं। आपने 
शनीहार' नामकी एक उत्तम पुस्तक लिखी है । , 


था कलीके रूप शैशवसे, अद्दो सूखे सुमन। 
हासूय करता था खिलाती, अड्ठमे तुककी पवन ॥ १॥ 
खिल गया जब पूरा तू, मंजुल सुकोमल पुष्पवर । 
लुब्ध मधुके देतु मेंडराने, लगे उड़ने अमर ॥ २॥ 
सिग्ध किरणें चन्द्रकी, तुमको दंसाती थीं सदा । 
ओस मुक्ता जालसे, श्द्धारती थीं सर्वदा॥ ३ ॥ 
वायु पंखा मल रही, निद्रा विवश करती तुके। 
यत्न माली का रहा, आनन्द से भरता तुमे॥ ४ ॥ 
कर रहा अठलेलियां, इतरा सदा उद्यान में। 
अन्तका यह दृश्य आया, था कभी क्या घ्यानमे || ५॥ 
सो रददां अब तू धरा पर, शुष्क विखराया हुआ | 
गन्ध कोमलता नहीं, मुख-मंजु मुरकाया हुआ ॥ ६॥ 
आज तुभकी देखकर, आहक अमर आता नहों । 
वक्त भी खोकर तुके, हा | ऑसु बरसाता नहीं ॥ ७१॥ 
जिस पर्वनने अड्ूमे ले, प्यार था तुमको किया | 
तीत्र मोके से सुला, उसने तुमे मूपर दिया॥ ८॥ 
कर दिया मधु और सोरभ, दान सारा एक दिन | 
किन्तु रोता कौन है, तेरे लिये दानी सुमन ॥ ६ ॥ 
मत व्ययित हो पुष्प, किसको सुख दिया संसारने | 
स्वार्थभय सबको बनाया, है यहाँ करतारने ॥१०॥ 


( १०१ ) 


विश्वसे हे पुष्ष | तू सबके हृटय भाता रहा। 
दान कर सर्चेख् फिर भी, द्वाय दरखाता रहा ॥१५॥ 
जब न तेरी ही दशापर, दुख हुआ ससारको। 
कौन रोयेगा सुमन, हमसे सतुज निससारकों ॥१२॥ 
अभ्यास 
(१) इश्त पयमें क्या दार्शनिरु भाव हैं ? समकाओ । 
( २ ) फूछफों कौन-कौन सो तीन अग्रग्थाएँ हैं? मनुप्पक्षी अवस्थाओंसे 
तुलना करो । 
(३)७ वें और ८ वे पदका भावार्थ सममझाओ । 
(४ ) 'फिसको सुस्त दिया ससारने? ! इन कथनकी , पुष्टि करो । 
( ५) पर्यायवाची शब्द चतलछाओ-- 
हास्य, स्वार्य, अछु, शेझव, दानी, सौरभ । 
(६ ) मडराना, इतराना, अठखेल्या करना; जात यरसाना, इन 
मुद्दावरोंफा अपनी भापाने प्रयोग करो । 
(७) इस पाउमें क्या शिक्ष दो गई है ? सममझ्ाओ। 
(८) जब न ॒तेरी द्वी दशापर दुस हुआ समारको' की पद व्याख्या करो। 
(९ ) तत्सम रुप बतलाओ -- 
हरसाता, मनुज, आइक, आतसू | 


२६---सव ग्रुणाधार श्रीकृष्ण * 
[ ल्ले०-पं० जगन्नाथ प्रसादजी चतुर्चेंदी 
( जन्म स० १९३३ वि०, निवास-स्थान मलयपुर मुगेर । चतुर्वेदी- 
जी हिन्दीके अच्छे गय लेखकों ऊँचा स्थान रखते हैं । आपके लेख 
त्तवा भाषण बड़े सरस तथा भावपूर्ण, व्यय और इहात्यरसमें भोत-प्रोत 


»( १०२ ) 


दोते हैं। इसके अतिरिक्त समालाचक भी हैं। आपके लिखे अन्थोमे 
अधिकाश लाहित्यिक साषण, सम्राछोचना, नाटक, उपन्यास तथा काव्य 
हैं। चतुर्वेदोजी साहित्य रत्िक, मधुरभाषी, द्वास्यरसके श्रेमी, मिलनसार 
भर हिन्दी साहित्यके सच्चे सेवक हैं । ) 

“कष्णुसूतु भगवान्‌ खयमृ” यद्द अक्षरश: सत्य है | श्रीकृष्ण 
जैसा सर्वेगुण सम्पन्न महापुरुष भारत क्या सारे संसारमें 
नहीं हुआ दे । उनका कार्य-कलाप इसका अमाण है। श्रीकृष्ण 
जेसे साहसी मीर थे, वेसे दी संगीतके पारदर्शों। एक ओर 
गीताका ज्ञान तो दूसरी ओर वंशीकी तान, जिससे मनुष्य 
ही नहाँ, पशु पक्ती भी मोहित हो गगे। यह जैसे राजनीतिज्ञ 
थे, वेसे ही धर्माचुरागी भी, श्याम वर्णो होनेपर भी सोन्दर्यकी 
खान थे। इसीसे उनका दूसरा नाम श्यामठुन्दर भी हैं। दीन 
दुखियोपर दया करते, पर दुष्टोके द्‌ भी नहीं करते 
थे। रास-क्रीड़ाके प्रेमी होकर भी योगेश्वर थे। सारांश यह 
कि पह सबे-गुशाघार थे। उनका सतत ध्यान करनेसे 
का कल्याण द्वता है। उन्हे मूल जानेसे हमारी यह. दुगेति है। 


बंकिम बाबू अपने “ऋष्णु-चरित्र” मे लिखते ३--“बचपनमे 
श्रीकृष्ण आदशे बलवान थे। उस ख्रमय उन्होंने केवल शारीः 
रिक बलसे दी हिंसक जन्तुओसे बृन्दावनकी रक्षा की थी। 
कंस और कंसके मंज्लादिकोको भी मार गिराया था। गो 
चरानेके समय स्वाल-बालोके, साथ खेल-कूद और कसरत 
कर उन्होने, अपने शरोरिक बलकी वृद्धि कर ली थी। दौड़ने 
मे काल यवन भी उन्हे न था सका। छुरुत्षेत्र-युदूधमे उनके 
स्थ हॉकनेकी भी बड़ी प्रशंसा है |” 


, शल्बालक्ी शिक्षा मिलनेपर वह कज्षत्रिय-समाजमें सर्वेश्रेष्ठ 
घबीर समझे जाने लगे । उन्हे कभी कोई परासत न कर सका। 


( १०३ ) 


कंस, जरासंघ, शिशुपाल अस्ृति तत्कालीन प्रधान योद्घाओसे, 
तथा काशी, कलिब्न, पोण्ड्रक, गान्धारादिके राजाओंसे बह लड़ 
गये और सबको उन्होने, परासत किया । उन्हें कभी कोई न जीत 
सका। सात्यकि और अभिमन्यु उनके शिष्य थे। बह दोनो भी 
सहज द्वी द्वारनेवाल्षे न थे। सृवय अजुं नने भी उनसे युद्धकी 
वारीकियों सीखी थीं । हे 


श्रीकृष्ण योदूघा द्वी नहीं, अच्छे सेनापति भी थे। सेनाप- 
तित्व ही योद्धाका वासतविक गुण है । उन्होंने अपनी अुट्ठीमर 
यादब-सेना लेकर जरासन्धकी अगशित सेनाको मथुरासे भार 
भगाया था। अपनी थोड़ीसी सेनासे जरासन्धका सामना करना 
असान्य सममक्तर सथुरा छोड़ना, नया नगर बसानेके लिये 
हारिकाहीपको चुनना और उसके सामनेंकी रैबतक पर्वतमाला- 
में दुर्मे दुर्ग बनाना, जिस रखनीतिज्ञताका परिचायक है, 
बह पुराणेतिदासके और किसी क्षत्रियमे नहीं देखी जाती है। 
श्रीकृष्णणी ज्ञानजेनी-च्ृत्तियों सब द्वी विकासकी पराकाछ्ठाको 
पहुँची हुईं थीं। वह अद्वितीय बेदज्ञ थे, क्योकि भीष्मने उन्हे. 
अआर्ध-प्रदान करनेका एक कारण यह भी बताया था। उनकी 
गीता तो अनन्त ज्ञानका साण्डार है। 


श्रीकृष्ण सबसे श्रेष्ठ और माननीय राजनीतिज्ञ थे। इसीसे 
युधिप्ठिरने बेदृब्यासके कहनेपर भी श्रीकृषष्णके परामशे बिना 
राजसूय-यज्ञलमें द्याथ नद्ां लगाया। जरासघकों मारकर उसकी 
केदसे राजाओकों छुड़ाना उन्नत राजनीतिका अति झुन्द्र 
उद्दादरण है। यह साम्राज्य सथापनका बड़ा सहज परमोचित 
उपाय है। 

श्रीकृष्णकी घुद्धिका विकास 'चरम सीमातक वढ़ा हुआ था | 
इसीसे वह सब्वे-व्यापी,सर्वे-द्शां और सब॑ उपायोकी उद्धावना 


( १०४ ) 


करनेवाली थी। जिप्त अपूर्व आत्म-तत्व ओर धर्म-तत्वके 
आगे अबतक भनुष्यकी बुद्धि नहीं जा सकती, उससे लेकर 
चिकित्सा, संगीत और अगश्व॒ परिचर्यातक चह भत्ी-भाँति जानते 
थे। उत्तरके सृत-पुत्रको जिलाना; उनकी चिकित्साका, वंशी- 
वादन उनके संगीतका ओर जयद्रथ-चधके दिन घोड़ोक्की चिकित्स 
उनकी अश्व-परिचर्याका उदाहरण है। 


श्रीक्ृष्णके साहस, फुर्ती और सव कामोमै उनकी तत्परता- 
- का परिचय पद-पदपर मिलता है। उनका घर्म तथा सत्य अचल 
था। ठोर-ठोर उनकी दयालुता और प्रेमका परिचय मिलता है। 


बलामिमानियोकी अपेक्ता बलवान होना भी लोकद्धित करना 
है। वह शान्तिके पुजारी थे ओर शान्तिके लिये इंढ्ृताके साथ 
प्रयन्न कप्ते थे। बह सबके हिलेपी थे। केबत्त मनुष्योपर ही 
नहीं, गीवत्सादि जीव-जन्तुओपर भी दया करते थे। इसका 
पता गोव्धेन पूजासे लगता है। भागबतमें लिखा है कि वह 
बन्द्रोके / लिये माखन चोरी करते और फल ।वेचनेवालोंके 
फल छीन लेते थे । वह अपने भाई-बन्धु कुटुम्ब-कबीले के दितेषी थे, 
पर साथ ही उनके पापाचारी हो ज़ानेपर वह उनके पूरे शत्र, 
वन जाते थे। वह क्षम्राशील दोनेपर भी जरूरत होनेपर 
पापाण हृदय द्ोकर द्इ देते थे। वह खजन प्रिय थे, पर लोक- 
हितके लिये खजनोके विनाश करनेभे भी कुरिठत नहीं होते थे। 
कछ उनका सामा था। जैसे पाडव उनके भाई थे बैसे शिशुपाल 
भी था। दोनो ही उनके फूआके बेटे थे। उन्होने मामा ओर 
भाईका मुलाहिजा न कर दानोको ही दण्ड दिया। फिर थादव 
लोग सुरापायी द्वी उद्ण्ड दो गये तो उन्होंने उन्हें भी अबूता 
नहीं छोड़। । 

श्रीकृष्ण सर्वदा और सर्वत्र सर्व-गुणोके प्रकाशसे तेजखी 


( १०४ ) 


जे। वह *पराजेय, अपराजेत, विशुद्ध, पुस्यम्य, प्रेमसय,. 
दयासय, दृढ्कर्मो, घर्मात्मा, वेदक्ञष, नीतिज्ञ, धर्मेज्ञ, लोकहितैपी, 
न्यायशील, छमाशील, निरपेक्त, शाज्ी, निरहंकारी, योगी ओर 
तपस््री थे। वह सानुषीशक्तिसे कार्य करते थे, परंतु उनका चरित्र 
असासुषिक था। अब पाठक ही अपनी अपनी बुद्धिकें अचुसार 
इसका निर्णय कर लें कि जिसकी शक्ति मानुषी, पर चरित्र सनु- 
ध्यातीत था, वह पुरुष मनुष्य है या इंशचर। जो अश्रीकृष्णकों 
निशा सनुष्य ही समसे, वह उन्हे कससे कमर महापुरुप और सहा- 
ज्ञानी ही माने ओर जिसे श्रीकृष्णके चरित्र्मे इेश्वरका अभाव 
दिखाई दे, वह मेरे साथ हाथ जोड़कर विनयपूर्चक कहें--ओऔर 
कोई कहे चाहे नहीं पर में तो कहता हू- 
। जाहि देखि चाहत नहीं, कछु देखन मन मोर | 
घसे सदा धगन, सोई ननन्‍्दकिशोर ॥ 

चस यही कामना है, यहयो इच्छा है, यही अमिल्ाषा है और 

यही आकाक्षा है। 
अभ्यास 

< १ ) सरल भापाम अथथ सममाओ--- 

कार्यकलाप, समावेश मे होना, राजनीतिश, योगेज्वर, स्वगुणाघार, 

इुर्मे, सर्वेदर्शी, अमानुपिऊ, मनुप्यातीत, निरपेक्ष, अध्यात्मतत्व 
(२ ) समास वत्तताओ--- 

वर्मानुरागी, पापाण-हृद्य, अज्परितवर्या, घलामिमानी | 
(३) सौन्दय, तत्परता; दयाकृता समाओका पद-परिचय करो तया इनमें 

गुणवाचक सज्ञा बताओ । 
(४) भीकृष्ण भगवान्‌ ससारके लिये आदशो व्यक्ति क्यों हैं ? 
५) श्रीकृष्फे बालकपनका जीवन अलनुकरणीय है या नहीं? यदि 

है तो क्यों 2. हक पक लय 


च्द 


( १०६ ) 
२७---मारत-वन्दना 


[ ज्ञे--परिडित वद्रीनारायण चोघरी '्रेसघन” ] 


( जन्म भाद कृष्ण ६ स० १९१२ वि०, स्वर्गरोहण स० १९८० 
वि०, जन्मस्थान मिर्जापुए। आप कट्टर सनातन धर्मावरम्बी, हिन्दू-धर्मके 
परिपोषक, स्व॒देशप्रेमी, रसिक हृदय कवि थे । आप हिन्दी, फारसी और 
सछ्तके अच्छे पण्डित थे और भारतेन्दुजीके सखा थे। आपकी कविताओं- 
में आपकी अतिभा स्पष्ट रुूपसे कलकती है। सन्‌ १९१२३ ई० में आप कल- 
फत्तेमें होनेवाले हिन्दी-साहित्य-सम्मेलनके सभापति हुए थे । 

जय जय भारत-मूमि भवानी। 
जाकी सुयश पताका जगके दसहूं दिसि फहरानी। 
सब सुख सामग्री पूरित ऋतु सकल समान सोहद्दानी ॥१॥ 
जा श्री शोमा लखि' अल्का अरु खिसानी 
घर सूर जितठ उयो निति जहाँ गई प्रथम पहिचानी ॥शा। 
सकल कला गुन सहित सभ्यता जहंसो सबहिं । 
भये असंख्य जहाँ जोगी तापस ऋषिवर मुनि ज्ञानी ॥शा 
विविध विप्र विज्ञान सकल विद्या जिनते जग जानी | 
जग विजयी जप रहे कवहुँ जहं न्याय निरत गुनखानो ॥४॥ 
जिन प्रताप सुर असुरनहू की हिम्मत विनसि विलानी। 
कालहु सम अरि तन समुमत जहं के क्षत्री अभिमानी ॥५॥ 
' 'बीर बघू बुध जननि रह्दी लाखन जित सती सयानी | 
कोटि कोटि जित कोटि पती रत वनित बनिक घनदानी ॥ध॥ 
सेवत शिल्प यथोचित सेवा सूद सम्रद्ध बढ़ानी। 
जांको अन्न खाय ऐंड्ति जग जाति अनेक अघानी ॥ण। 
जाकी सम्पति लूटत हजारन बरसनहूं न खोटानी। 
सदहस सहस वरिसन दुख नित नव जो न ग्लानि उर आनी ॥5॥ 


( १०७ ) 


धन्य धन्य पूरब सम जगनृप गन मन अजहूँ लोभानी। 
प्रनमत तीस कोटि जन अजहूं जाददि जोरि जुग पानी ॥ध्या 
जिनमें कलक एकताकी लखि जगमति सहमि सकानी । 
इंश कृपा लद्दि वहुरि 'प्रेमघन” वनहु सोई छवि छानी ॥१०॥ 
सोइ प्रताप गुण जन गवित है भरी पुरी धनघानी। 


अभ्यास 
(१) कविका खंदेश-प्रेम इस पयके भआाधारपर सममाओ । 
(२) 'वीरघू----- सती सयानी' का भावाथ सममाओ। 
(३) 'सकल कला *«* » मुनि ज्ञानी! का अन्वय फरो। 
(४) सुयशपताका, अपरूय, विदुध, विलानी, जुगपानी, अलका, 
अमरावती के शब्दार्थ चताओ 
(५) भारत-गरिमापर एक छोटा निवन्ध तेयार करो । 
(६) इस पयको पढकर तुम्दारे हृदयमे क्या भाव जागरित होते हैं २ 


न्ग्ग्म््ट. हि. 


२८---ीरता 
[ संकलित ] 

बीरत्व संसारमें एक अमृल्य रत्न है। इसका आविर्भाव 
बत्साहसे दोता है। सादित्य-शास्षमे उत्साद द्वी इसका सथायी 
भाव माना गया दे अर्थात्त विना उत्साहके यह कभी सिथर नहीं 
हो सकता। जिस पुरुपमें किसी प्रकारका उत्साह नहीं है, वह 
किसी वातमे कभी घीरता नहीं दिखला सकता। यह एक ऐसा 
गुण है कि जिसे न केवल वीर वरन्‌ काद्र भी सम्मानकी दृष्टिसे 
देखता है। बीरसे बढ़कर सर्वेप्रिय कोई नहीं होता और संसार- 
पर बीरताका जितना अभाव पड़ता है उतना प्रायः और किसी 


( १०८ ) 

शुणका नहीं। सत्य आदि भी घड़े अनमोल गुण हैं; किंतु जितना 
आकसिसक ओर रोमांचकारी अभाव वीरत्यका/ पड़ेगा, उतना 
सत्य आदिका कभी न पड़ेगा। इसलिंये वीरत्वमे जुगमोहिनी 
शक्ति सभी अन्य गुणोसे श्रेछ्तर है ओर यह कीर्तिका सबसे 
बड़ा वद्धंक है। काद्रता और भयसे इसका सद्दज विरोध है । 
कादरतामे तिलमात्र आकर्षए-शक्ति तथा भयमे कुछ भी प्रीति- 
योग्य नहीं है। कादरताका कोई अंश किसीका चित्त अपनी 
ओर आक्ृष्ठ नहीं करेगा ओर भयमें कोई ऐसा अंश नहीं है जो 
किसीका आीतिभाजन हो सके। वीरत्वकों वहुत लोगोने सामथ्ये- 
में मिला रखा है, किन्तु इन दोनोमे कोई मुख्य सम्बन्ध नहीं है। 
सामथ्ये केवल इतना ह्वी करती है कि वीरत्वकी मद्दिमा बढ़ा 
देती है। यदि वीर पुरुष वलद्वीन हुआ तो उसकी वीरता बैसी 
नहीं जगमगाती जैसी कि वलवान्‌ वीरकी। यदि इनुमानजी 
झम्नुद्र न उल्लंघन कर गये द्ोते तो भी उतने द्वी बढ़े वीर होते 
जितने कि अब माने जाते हैं, किंतु उनके मद्दाबीरत्वको चमकाने- 
वाले उद्धि उल्लंघन और द्रोणाचल-आनयनके ही कारये हुए। 
वीरत्व ओर पराक्रममे इतना ही भेद दै। वास्तविक वीरत्वका 
मुख्य आधार शारीरिक वल न होकर मानसिक वल है, जिसे 
इच्छा-शक्ति कहते है । इस शक्तिका वेग कोई नहीं रोक सकता | 
एक पुरुषकी उद्दयाम इच्छा-शक्तिसे पूरी सेनामें पुरुषत्व आ सकता 
है और एक कादर कभी-कभी पूंरे दलकी कांद्रताका कारण 
हो जाता है। शरीरका वासत॒विक राजा मन ही है। 

'आज्ञासे शरीर तिल-तिल कट जानेसे मुद्द नहीं मोड़ता ओर 
इसीकी आज्ञासे एक पत्ते के खड़कनेसे भी भांग खड़ा होता है । 
बुद्धि, अछुभत्र आदि इसके शिक्षक है। येहीं सब मिलकर इसे 
'जैसा बनाते हैं, वैसा ही यह बनता है। इच्छा इसी शिक्षित-वा 


( १०६ ) 


अशिक्षित सनकी आज्ञा है। मन जितना ही द॒ृद अथवा डॉवा- 
डोल होगा, उसकी आज्ञा ( इच्छा , बसी ही पुष्ठ अथवा शिथिल 
होगी। जिसका मन जितना दी शिक्षित ओर ख़बश है, उसीकी 
इच्छामे वल्नत्रत्‌ दृद़ता दोगी। विना ऐसी इच्छा-शक्तिके कोई 
पुरुष पूरा वीर नहीं दो सकता । इसलिये दृढ़ता वीरत्वकी सबसे 
चड़ी पोषिका है। जिसका सन उचित कास करनेसे तिलमात्र 
चतायमान होता ही नहीं और जो अल्ुुचित कार्य देखकर बिना 
उसे ठीक किये नहीं रद सकता, वही सच वीर कहतावेगा । 


वीरत्वका द्वितीय पोपक न्याय है। बिना इसके वीरत्व शुद्ध 
एव अशंसा सपद नहीं होता । न्यायके ठीक होनेके लिये बुद्धिकी 
आवश्यकता है, ओर साधारण नन्‍्यायको उदारतासे अच्छी 
कांति प्राप्त होती है। अतः बीरताके लिये न्‍्यायशीलता उदा- 
रता ओर चुद्धिकी सदैव आवश्यकता रहती है । 

सच्चे चीरको अन्याय कभी सहाय न होगा ! हमारे यहां वीरता 
का स्वोत्कृष्ट उदाहरण भगवान रामचन्द्रका दै। इन्हींको 
महा कवि भवभूतिने महावीरकी उपाधिसे भूूपित करके महावीर 
घरिज्रके नामसे इनकी जीवनी एक नांटकमे लिखी है। दण्ड- 
कारणयमे जिस समय आपने निशाचरों द्वारा भक्षित त्राक्मणो- 
की असिथयोका समूह निरीक्षण किया तो छुरत-- 

“निसिचर-द्वीन करों महि, भुज उठाय अण कीन्द” 

यही उत्साहका परमोज्ज्वल उदाहरण था जौ आपने निशा- 
चरोसे बिना कोई बैर हुए भी दिखलाया। ससय पर आपने यह 
कठिन प्रण सत्य करके दिखला दिया। इनकी इच्छा लोदेके 
समान पुष्ट थी जो एक वार जाग्रत होने पर फिर दव नहीं सकती 
थी। इच्छा और कमेमे काये कारणका सम्बन्ध है। कारण 
शिथिल होनेसे कायेका होना कठिन होता है। कहते है कि विना 


! ( ११० ) 


हद च्छाके सइसहिवेकिनी बुद्धिको आज्ञा अरणयरोदन दो जाती 
है। शुभ कार्यारंभके विषयमे कह है कि विन्ने भयसे अधम पुरुष 
किसी शुभ कायेका आरम्म द्वी नहों करते ओर मध्यम श्रेणीके 
'लोग प्रासम्स करके भी विन्न पड़ने पर उसे छोड़ चैठते हैं, किन्तु 
उत्तम प्रकृति वाले हजार विन्नोंकी दृवाकर एक घारका प्रारम्भ 
किया हुआ शुभ कार्य पूरा करके दी छोड़ते हैं । सत्य निष्ठा भी 
शोय के लिये एक आवश्यक गुण है। बीर पुरुष लोभको सदैव 
रोकेगा, ईमानदारीका आदर करेगा, असत्य भाषणसे बचेगा 
आर अपना वासतविक रूप छोड़कर कोई कल्पित भाव अथवा 
गुण प्रकट करनेकी सूवप्रमें भी चेष्टा नहीं करेगा । बहुधा संसार- 
में साधारण पुरुष लोक सान्यताके ल्ालचमें सिद्धादोंकों भंग 
करते हुए देखे गये हैं। सिद्धांत प्रिय पुरुष माने जानेकी 
इच्छा लोगोकी ऐसी बलवती देखी गई है कि लोगो द्वारा 
सिद्धांती माने जानेके लिये वे सबसे बड़े सिद्धांतकों इंसते 
हुए चकनाचूर कर देंगे। 

जो लोकप्रान्यताके लोभके सिद्धांत भंग करनेको तैयार 
नहीं है वह पुरुष सच्चा वीर कदलानेके योग्य है। इस चीरतव का 
परसोत्कृष्ट उदाहरण हमारे उपनिषद्ेमे सत्य काम-जावालका 
मिलता है। जब यह पुरुष रज्न अपने गुरुके पास विद्याष्ययनार्थ 
उपसिथत हुआ, तब ,उन्होंने इनके मांता-पिताका नाम पूछा। 
सत्यकामने माताका नाम तो जब्राल्ञा वजज्ञा दिया किन्तु पिंता- 
विषयक पअ्रश्नका यही सीधा उत्तर दिया कि भेणा पिता अज्ञात 
है; क्योंकि एक बार मेरे पूछने पर मेरी माताने कह था कि मैं 
नहीं कह सकती कि तू किसका पुत्र है। इस उत्तरकों सुनऋर 
सत्यकामका शुरु अवाक रह गया, किन्तु भावी शिड्यक्री सत्य 
प्रियतासे सन्तुष्ट होकर उसने आर्ज्ञ दी कि तू दी सत्य प्रियताके 


(१११ ) 


कारण अव्यात्म-विद्याका <्सवोत्कृष्ट अधिकारी है। इतना कह- 
कर गुरुने उसे शिष्य किया ओर. सत्यकामका जावाल नाम रख 
उसे अपने शिव्योंसे श्रेष्ठतर माना। समय पर यही सत्यवादी 
पुरुष अञ्म विद्याका सव॒त्क्रिष्ट परिंडत हुआ | यह पुरुष-रत्ष सत्य- 
का अवतार था। इसका मन निर्मेल था और इसऊा वर्ताब 
उच्च था। इन्दों बातोंसे एक जारज पुरुष होकर भो यह ऋ्रक्ष- 
विद्या सबसे ऊंचा अधिकारी हुआ। इसलिये कहा गया है 
कि मन ओर बर्ताव द्वो मिलक( मनुष्य का चंरित्र बनते है । 


वीर्वका सर्वश्रेष्ठ सम्रय चाल-बय दै। जितना उत्साह 
सलुष्यमँ इस अलूल्य-काल में होता है, उतना ओर किसी समय 
नहों होता । श्लाध्य चरित्रवान्‌ मनुष्यकों एक बालक जितना 
बड़ा मान सक्ृदा है. उतना कोई दूसरा कभी न मानेगा। वाल- 
चयतें सन सकेदर कागजकी भांति होता है। इसपर झुगमता- 
पूथंक जो चाहे, लिश्व सकते हैं। उद्गार चरितावलीमें वोर- 
पूजनका भाव अधिकतासे दोता है ओर ऐसा पुरुष किसी-न- 
किसीको श्लाध्य एवं महावोर अवश्य मानता है । 


केवल मझनोचोकों द्वी संस्तास्मे कोई श्लाध्य नहों समता । ! 
जिपते शल्ाध्य-चारेन्र पूजनक्ी कामना वलयती होतो है, उसमें 
चीरता कप्रसे कप वीज रुपसे रूतो द्वी है। कदाचित्‌ इन्हों 
विचाऐसे हम यह मशवीस्युज़नक्ों रोति चलाई गई है। 
बिना दूसऐेके गुण-म्रह किये लोग प्राय' उद्ारचेता नहीं दांते 
इसीलिये दोणेमे कामलता ओर उद्यासता प्राय साथ हो साथ 
पाई जाती है। अप्तन्नचित्त रहना भी इन्दों वातोका एक अग है। 
कहा गया है कि बुराह रोकनेफा पहला उपाय मानसिक प्रसन्॒ता 
दी है। बिना इसके बुराई रुक ही नहों सऊती। सानसिक प्रतत- 
खअताका प्रादुभाच प्र भावसे होता है। जिस व्यक्तिसे दम प्रेत 


( ११२ ) 


करेंगे वह बदललेमे हमसे भ्री प्रेम करेगा । इसलिये जो संसार प्रेमी, 
होता है; उससे सारा संसार प्रेम करता है, जिससे वह, सदैव 
असन्न रहता है। ऐसी दशामे वह बुराई किसके साथ करेगा ? 
प्राय. देखा गया है कि अपने साथ किसीकी खोटाई की जड़ 
कल्पना मात्र होती है। हम सूचर्य असभ्यता कर बैठते हैं और 
जब दूसरा उसके बदलेमें हमारे साथ असभ्यता करता हैं तब, 
हम आत्म-प्रेमसे अन्धे दोकर समझ बैठते हैं कि वह निष्कारण 
हमारे साथ खोटाई करता दै। इसलिये सम्भावित ,पुरुषको 
बुराईसे सदैव बचना उचित और क्षुमासे अवश्य काम क्लैना 
चाहिये, क्योकि वेज्ाने हुए भी हमारे द्वारा क्षमा -पात्रका अप- 
कार हो जाना सम्भव है। खोटाई और बविफलताका पहले ही 
से भय कद्ापि न करना चाहिये क्योकि ऐसा करनेसे कोई 
इनको जीत नहीं सकता। इनके जीतनेका सबसे सुगम उपाय 
आशा दी है। इसलिये कहा गया है, कि आशा न छोड़ने वाला 
सव॒भाव्‌ भी बहुत ह्वी मूल्यवान्‌ है। 

सवार्थ-त्याग बीरताका सबसे बड़ा मूषण है। दास भाव 
अ्रददण करके यदि कोई विवाद्द बन्धनमे पढ़े तो उसके इस कत्तेन्य- 
में कुछ-न-कुछ क्षत्ति अवश्य पहुँचेगी! धीरबर हनुमानने जब 
भरवानका दासत्व प्रहण किया तब आत्म-त्यागका ऐसा अतुल 
उदाहरण दिखाया कि जीवन पयेन्त कभी विवाह द्वीन किया 
इधर भगवानने जब ,देखा कि उनकी प्रजा उनके द्वारा सीता 
अहरके कारण उन्हे उद्चातिउच्च आदशेसे गिरा हुआ समः' 
मती है, तब उन्होने श्राणोपम अदूधोड़िनी सती सीता तकका 
त्याग करके अपने प्रजा-रंजन वाले ऊदचे कत्तेंन्यको हाथसे 
जाने नहीं दिया। बाल-वयसे भी झपने पिताकी ब्ेमनकी आज्ञा 
मानने तकसे भी.उन्होंने तिल्मात्र सक्लोच नहीं किया। उन्होने 


( ११३ ) 


यावज्जीवन खाथे-त्याग ओर कत्तैठ्म़ पालनका ऊँचा आदशे 
िक्लाप्य सानो ये सरेह कर्येब्य होकर प्रष्यी पर अकतीखे 
हुए थे । 
कार्य-साफल्य तो साधारण इदृष्टिसे वीरताका पोषक है, ' 
किन्तु दार्शनिक दृष्टिसि उसका शौर्यसे कोई सम्बन्ध नहीं है॥ 
दार्शनिक शुद्धता प्रत्येक वासतबिक वीर कर्ममे आ जाती है। 
चाहे धह तिलमात्र भी सफल न हुआ हो और साधारणसे 
साधारण पुरुष हाश संपादित हुआ हो। एक साधारण 
सेनिक जो अपने सेनापतिकी आज्ञासे मोर्चे पर शरीर त्याग 
देता है, दा्शनिक दृष्टिसे बडे विजयीके वराबर है। वीरताके 
मूल-सूत्र कर्तेव्य-पालन ओर खारथे त्याग है। बिना इनके कोई 
मनुष्य घासत॒विक वीर नहीं हो सकता। एक वार दो रेलोके मिड 
जानेसे एक एजिन हॉकने वाला अपने ए जिनमे दवकर वायलरसे 
चिपक रहा, बह सृतप्राय था, किन्तु उसके होश-हवाश नहीं 
गये थे। इसलिये वह जानता था कि वायलर जल्दी फटकर 
उड़ेगा। जब ओर लोग उसे छुड़ानेके लिये अयत्न करने लगे, 
तब उसने उन सबको वहॉसे यह कहकर खबेड़ दिया कि में तो 
मरा ही हूँ, तुप्त सव यहा आण ठेने क्यो आये हो ९ क्योकि भापके: 
वायलर असमी फटना चाहता है, जिससे सबके प्राण 
जायगे। मरणावसथामे भी दूसरोके लिये इतना ध्यान रखना 
चीरताका बड़ा लक्षण है। 


अस्यास 


(१ ) रोमाचकारी, कायरता, पोषक, ज्ञौ्, सर्वोत्तश, जारज, खोठाई 
मोरचा और उपेक्षाका अर्थ बत॒लाओ | 

(६९) दसारे यद्दा वीर-चरिन्र-पूज़नकी रीति किस '्येयकों दृष्मि रखकर: 
चलाई गई है ? 


( ११७ ) 


( ३) श्म कार्यासम्म कजेमें सत्तारके छोगोंको कितनी श्रेणियोर्म विमक्त 
किया गया है ? समर्काओ । 

4 ४ ) जगमगाना, तिल-तिक कड जाना, पता खड़कना, मोर्नेपर जान 
देना मुहाविरोंकों अपने वाक्येंमें प्रयोग करो? 

६ ५) बीरताते क्या अभित्राय समझते हो, वह किस प्रकार प्राप्त की 
जा सकती है ? 

(६ ) वीरता ओर साफन्य क्‍या दोनों एक हैं अयवा भिन्न १ 

हूँ ७) श्रीरामचन्द्रजीकी वीरता क्यों सर्वश्रेष्ठ भानी गयी है ? 

4 ८ ) सन्धि-किच्छेद करोः--- 
जगन्मोदिनी, प्रशसाम्पद, सर्वोत्तट । 


कब 


२६---विपदु-स्तरागत 
न्नज्च्च्वप्सस्स्च््ा 
( ले०--मो देवीप्रखाद गुप्त कुपुप्ताकरः बी० ए०, एल०-एल्न० बी० ] 
( जन्म फाल्यगुन स० १९५० वि०, स्थान बनखेड़ी, जिला होशगावाद। 
“आप वत्तेमान कवियोंमें अच्छा स्थान रखते हैं। हिन्दी-ठ्दू दोनों भाषाओमें 
आप कविताएँ लिखते हैँ। आपको कविताएँ बढ़ी भावमगी और सुन्दर 
डोती हैं। ) / 


[8१] | 
तुंमकों पाया तभी खेल में, खूब निराले खेला हूँ, 
आओ- प्यारी विपदा | आओ, फिर में आज अकेला हू । 
करे खूब आलिंगन मुकसा प्रेमी कहाँ न पाओगी, 
जितनी देर करोगी उतना तुम मनमे पछताओगी॥ 


[* |] 
आओ तुम संकोच छोड़कर किसी वेशमे आ जाओ, 
आांति और सुख यहाँ नहीं है अिये । न मनमे सरमाओ। 


( ११४ ) 


दोनो गये तुम्हाय सुनकर ही मेरे घर को आना, 

चैभवने सी छितकर पा उनके ही पीछे जाना ॥ 
ई] 

लब्जा, विनय, शीलता 'अपनी सखियों साथ न तुम लाना, 

कहना उनसे नम्न॒ भावसे ठहरों तुम पीछे आना । 

जिससे क्रीड़ा समय न सम्मुख वाघा छुआ प्रसुतुत दोषे, 

अभिलापाएँ पूरी होबें आलिगन अद्भुत होवे ॥ 


छ ] 
चरसोसे तुम मिली नहीं हो आत्म-शुद्धि करनेवाली. 
दया-प्रेसके  सदभावोकी हृदयोंमे. भरनेवाली । 
विरह-वेदेना सवाथे-रूप वन मुझको नित्य सताठी हे. 
। चौंक-चोंक पड़ता हूं. कह कद्द प्यारी चिपदा आती है ॥ 


अभ्पास 


(१) इस पद्यका भावार्भ बतलाओ | 
# (२) कवि जापदाओका क्यो लागत करना चाहता है? चौथे पदसे 
स्पष्ट करो । 
(३ ) विपदा तथा सुख और शातिमे क्‍या अन्तर है ? 
(४) तीपरे छन्‍्दका जय बतलाओ । 
(५) छज्जा, विनय, शीलताको कवि विपदाक्रे साव क्या नदों आने _देना 
चाहता है ? 
(६) शद्दार्थ बतछाओ -- 
निराले, क्ीडा, आलिप्नन, विरद्-वेदना, सदभावों । 
(७) इस पयसे कया शिक्षा मिलती है ? 
५ ८ ) पेदके मुख्य भावोको समकाओ । 


( ११६ ) 


३०--मत्स्य-देशमें पाण्डव 
[ लै०--श्रीयुत्‌ ५ं० लालताप्रसाद सुकुल एम्र० ८०] 


( आपका जन्म-त्यान बदनेरा-जिला अमरावती--निवास स्थान प्रयाग 
है। आपका जन्म ८ फरवरी १९०४ हैं० को है। आपके पिता सिविल- 
सर्जन डाक्टर ये । आपने प्रयाग विस्वविद्यालयते हिन्दी और भइरेजी दो 
विषयोंमें एय० ए० किया है। आजकल कलकत्ता विश्ववियालयम हिन्दीके 
अध्यापक हैं, आप बहुत ही योग्य और प्रतिमा-सम्पन्न पुरुष हैं। हिन्दी 
गयके अभ्यत्त लेखक हैं। आपके छेख सदा उच्च और गम्भीर 
देते हैं। ) 

कदाधचित्‌ भारतवपेका प्रत्येक मनुष्य कुछ कुछ अंशोत्तक 
'. शमायण ओर' महामारतकी कथाओसे परिचित अवश्य है। 
उसके सम्मुख इनमेसे किसी भी कथाका नाम ज्षेना उसे चकित 
नहीं करता, चरन्‌ बह उसके सुननेके लिये उत्सुक हो उठता है। 
इन भ्रन्थोके विषयमे मलुष्योकी सिन्न-भिन्न अनुमतियां हैं। कोई 
इन्हे एक बढ़ा धर्म-प्रन्थ समभता है, कोई केवल ऐतिहासिक , 
घटनाओका एक अच्छा खजाना | यदि इन्हे कोई राजनीतिका 
भ्रन्थ बताता है तो दूसरा एक ऊँचे दर्जेका साहित्य; परन्तु 
आम्ये तो यह है कि अपनी इन विविध प्रकारकी धारणाओंके 
लिये वहुधा पे निम्।ित उत्तर नहीं दे सकते । इसका कारण यही 
है क्लि आयः ऐसे बहुत कम ही भलुष्य मिलेंगे जिन्होंने सूबरय॑ 
पढ़ा हो ओर इनके गृढ़ सूथलोपर विचार किया हो, अन्यथा 
ओरोंका ज्ञान तो केवल श्रवश-अधघान हुआ करता है। 

कुछ भी हो, उनकी उपयुक्त सम्मृतियोँ अशुद्ध नहीं हैं। 
बासतवमें इन दो अन्थोमें इन सभी विषयोका पूर्ण समावेश है । 
इन सभी अंशोसे वे परिपूर्ण है। यदि इनको इन विपयोका अन्य 
कहा जाता है तो कुछ अनुचित नहीं । 


( १५७ ) 


आज अन्य विषयोको छोड़कर हमे केवल नीतिकी दृष्टिसे 
ही महाभारतमे चर्ित'एक घटना की जॉच करनी है। निसस- 
न्देद्द ऐसी-ऐसी घटनाएँ तो उसमे अंगरित पड़ी हुई हैं, परन्तु 
हमें तो आज इसी एक घटनाकी जॉच अभीष्ट है। , 


अज्ञात-चासके लिये पाण्डवोका द्रोपदी-सहित मत्सय देश- 
में आना तो कदाचित महाभार्तकी कथा से परिचित सभी 
मनुष्य जानते हैं इसलिये उसका यहाँ वर्णन करना व्यर्थ 
जान पड़ता है। 

यहाँ पहुँचकर पांडवोकों इस वातकी चिन्ता हुई कि एक 
चपे तक किस प्रकार कालक्षेप किया जाय कि किसीको पता 
भी न लगे। निससन्देह यह प्रश्न बड़ा टेढ़ा था। पहले तो 
द्रोपटीका साथ होना ही उनके मार्गमे एक बड़ी कठिनाई थी। 
द्रोपदी श्री दोनेके कारण रनिवासके अतिरिक्त अन्य कहीं भी 
किसी कार्यके योग्य नथी। इसके अतिरिक्त इन्दे और भी 
अनेक आशंकाएं थीं कि कोरब लोग इनका पता लगाकर कहीं 
किसी गुप्त रीतिसे द्वी इनका 'अनिष्ट न करवा दें । अथवा महाराज 
“विगटसे द्वी किसी भाति सिलकर इनको द्ानिन पहुँचा दें । 
ऐसी ही आशंकाओंके कारण उन्हे नीतिकी शरण लेनी पड़ी । 


” - चारो ओरसे सुरक्षित रहनेके लिये उन्होंने जिस अकार 
कार्य करना निश्चित किया था वह निससन्देह सराइनीय था, 
उससे उन लोगोंकी नीति कुशंलता भली भांति विदित दो 
जाती है । 

महारानी द्रोपदीने, जैसा पहले कद्दा जा चुका है कि वे रत्ति- 
'बसके बाहर रहकर कोई भी काये नहीं कर सकती थीं, सैर- 
न्प्रिणी घनकर रहना सवीकार किया था | यह काये राजकन्याओंके 


( श्श्८ण ) 


यहां ऐसी सख्रियोको दिया जाता था, जो देखनेमें सुन्दर 
होती थीं तथा अपनी बुद्धि विलक्षणता ओर पदुताके कारए 
मनोविनोद करनेमे कुशल द्ोती थीं। सैरन्श्रियोंकी बहुत अधिक 
सेवाका काये नहीं करना पड़ता था।. 


, यह काये तो उन्हें दे दिया गया, परन्तु अश्न यह थाकि 
प्रासादके भीतर रहते हुए उनके सन तथा गौरबकी भल्ी- 
भांति रक्षा कैसे हो सकेगी ९? यह अश्न कुछ अनुचित नथा+ 
क्योंकि ये पांचों भाई राज सभामे ही रहना सूवीकार कर हछेते 
दो उस दशामें (द्रोपदीसे भेंट करना उनके लिये यदि असम्भव. 
नहीं तो कम से कम कठिन अवश्य ही हो जाता, जो सम्भव 
था कि अन्तमें द्वानिप्रद सिदूघ दोता। क्योंकि, एक तो द्रोपदी 
सूचर्य अत्यन्त सुन्दर थी, इसके अतिरिक्त विराट मद्दाराजके 
साले कीचक इत्यादिकी वहां सत्ता तथा उनका आचरण 
पांडवो को भ्ती भांति विदित था। बस, ऐसे ही अवसरों पर 
“रूपवती भाय्यां शत्रु :” की यथार्थता सिद्ध होती दै । 


असूतु इस शकार द्रोपदीके सेरंभ्रीका पद सूचीकार कर 
लेने पर यददी उचित समझा गया कि पांडवोमेसे एककों रनि-“ 
चासके भीतर द्वी रद्दनेका प्रबंध करना चाहिये, इसके लिये 
अजु नके अतिरिक्त और कोई सी उपयुक्त न समम पड़ा, क्योंकि 
, रनिवासमें रहना तो उसीके लिये सम्मव था जो श्वियोका 

वेश घारण कर सकता। पांडवोमें केवल अजुन दी ऐसे ये 
जो नृत्य और गान-विद्यामें कुशल थे, इसके अतिरिक्त वे 
( अलिप्ट भी इतने थे कि द्रोपदीकी रक्ताका भार उनपर भली 
भांति रखा जा सकता थां। अत: उन्होने स्लियोंका वेश धारण 
किया ओर “वृहन्लला? के नामसे कुमारी उत्तराके समीप उसे: 
नृत्य-गान सिखानेके बहाने रहने लगे। 


( ११५१६ ) 


किन्तु कठिनाइयौका अन्त वहीं न था । बड़ी आशक्का 
यह भी थी कि कहीं राज्यमें इनका किसी सौ देख 
कर कोई गुप्त रीतिसे इन्हे द्ानिन पहुँचा सके। वैसे शारीरिक 
बल्लमे तो ये लोग किसीसे भी कम्त न थे; परन्तु आशक्ला यह थी 
कि कहीं भोजन इत्यादि मे कोई विप न मिला दे। यह आशक्ला 

चहींके मनुष्योंसे न थी, चरन्‌ कौरबोकी ओय्से भी की जाती 
थी कि कदाचित्‌ इनका समाचार उन्हे किर्सा भाँति ज्ञात हो 
जाय और वे इस प्रकारकी गुप्त बंचना करनेका अयल्न करें। 
साथ द्वी साथ यह ठो सम्भव नहीं था कि सबके सब अपने 


भोजनका अवन्ध प्रृथक प्रथक्‌ करें, क्योकि इसमे तो सन्देहकी: 
आशा थी और असुविधायें भी अनेक होतीं | 


इसलिये इस कार्यकां भार भीसको सपा गया, क्योकि वे 
पाक क्रियामे चहुत कुशल थे। बस, इसी अभिप्रायसे भीमने 
पाकशालाका कार्य सूव्षीकार किया। 

युधिप्टिरके लिये कद्दा जाता है कि थे यू त-क्रीडामे अबीण थे; 
इसलिये थे राजसभामे कार्य करनेके योग्य समके गये। हो.,- 
ठीक है, यदद तो था द्वी किन्तु इसमें अभिप्राय कुछ ओर ही था । 


राजाओंके यहां जिन्हें जीवन विताना पडा है वे राजसभाके- 
महत्वकों तथा राज-सम्मानित पुरुषोंके गोखको भलीभॉदि 
जानते हैं। किसी भी राजाके यहाँ रहकर उसकी सभाके मद्दत्वकी. 
ओर ध्यान न रखना अनेतिक सममा गया है, क्योकि राज्यकी 
व्यवसथाके सारे परामश राज्य-सभाकों छोड़कर कद्दों हो सकते 
हैं? इसलिय पाण्डवोकेसे नीति-कुशल पुरुषोंके लिये सभाका 
ध्यान न रखना असम्भव था। परन्तु सभामें रहकर कायेको 
सिद्ध कर लेना सबका काये नहीं है। केवल युधिष्ठिर जैसे 
सहनशील, दूरदर्शों, नीतिज्ञ पुरुष द्वी ऐसे जटिल कायोंको कर. 


( १६० ) 

सकते थे। भीमसेनकेसे उप्र सव॒भाववाल्लै पुरुपषका राजसभामें 
रहना लाभदायक न दोता। इन उपयुक्त गुणके अतिरिक्त 
एक विशेषता ओर यह थी कि वे चूत-क्रीड़ामें भी निपुण थे। 
इसके द्वारा कार्य-साधनमे उन्हे और भी अधिक सुविधा 
होती थी, क्योकि उस समय दूत-क्रीद्ाका प्रेम राजाओमे 
व्यसन नहीं सममा जाता था। प्राय. सभी नृप इसमें कुशल्नता 
आप्त कप्नेका यत्र करते थे। बंस, फिर कया था ९ इस ड़ामे 
(विशेष कुशल दोनेके कारण युधिष्ठिर एक साप्रारण समासद्‌ 
डी न्‌ रहे, बरन्‌ महाराज विराटके एक परम मित्र वन बैठे । इस 
/ अ्कार सभाकी ओरसे आशक्लित अनिष्टॉसे छुटकारा पम्रिला। 


परन्तु पाण्डबोकी नीति-कुशलता यहीं समाप्त नहीं होती। 
,अभी तो उन्हे अपनी रक्षाका सबसे बड़ा प्रबन्ध करना था। वृह 
यह था कि किसी अकार कुछ बल भी अपने शासनमे होना 
आवश्यक है। केवल शारीरिक बलपर ही भरोसा करना सप्मुचित 
सथा। इसके अतिरिक्त अभी उनकी फ्राण्टियर पालिसी? की 
व्यवसथा होनी तो शेष द्वीथी। नकुल ओर सहदेवके द्वारा 
से भी पूर्ण करके वे अन्तमें निश्चिन्त हो सके । 


बलके विषयमे तो प्रश्न यह था कि इतनी व्यवस था हो 'चुकन 
'पर पैदल सेना तो वशमे की ही नहीं जा सकती थी और न उससे 
,इछ अधिक लाभ द्वी था। 


। नकुल और सहृदेव अश्व तथा अन्य जीवोकी विद्यामे अत्यन्त 
'कुशल थे, इसलिये इनके द्वात अश्वोको अपने अधीन कर लैना 
डी श्रेयसकर जान पड़ा। अश्वोपर भी पाण्डबोका पूरा 
“आधिपत्य द्वो जानेपर एंक बार महाराज विशट सृवर्य इन 
व्लोगोको द्वानि पहुँचाना चाहते तो भी नहीं पहुँचा सकते थे; 
क्योकि अश्योके बिना केवल अश्व-सेना द्वी उनके दाथसे न निकल * 


( १११ ) 


जाती, घरन्‌ उनकी रथ सेना भी व्यर्थ हो जाती, केवल रह 
जाते पैदल, जिनसे शक्लित दोने की आवश्यकता न थी। इप 
प्रकार अश्वोपर नकुंलका अधिकार द्वो जानेसे बलका अ्श्न तो सिद्ध 
हो गया । अब आई उनकी “फ्रांटियर-पालिसी ।? 


यो तो उस समथ सभी नृप गो और ज्राह्मणोंके भक्त हुआ 
करते थे और भायः सभी के यहाँ सहस्तों गायें पत्नी रहती थीं, 
परन्तु महाराज विराट इसके लिए विशेष अख्यात थे। उनके 
यहा जितनी गायें थी, उतनी किसी औरके यहाँ नहीं थीं उन्हें 
गायोसे कुछ भक्ति सी विशेष थी, इसलिए पांडवोंका कुछ 
अनिश्चित समाचार-सा पाकर जब कोौरव उनका निमग्धित रूप- 
से पता लगानेके लिए उत्सुक हुए थे, तब भीष्मने सत्सयराज 
विराटकी अन्य किसी भी घलतुफे छआपहरण करनेका परासशे नहीं 
दिया, केवल गायोका ही अपहरण करने के लिए कहां ! क्योंकि 
यह तो मनुष्य खभाव है कि उसकी जितनी छ्वी अधिक प्रिय 
चसूतु अपदृरण की जायेगी उतना दी वह अधिक च्षुव्ध दोगा। 
चस इसीलिये पितामद भीष्मने गायोंके अपहरण कर लैनेका 
परामर्श दिया था। वे जानते थे कि गाय ही मदारान विराटको 
सबसे अधिक प्रिय हैं। इसके अतिरिक्त एक और भी कारण 
था। महाराज विराटकी गार्ये जहां रखी जाती थीं, वह स्थान 
ठीक कौरवोकी ठथा मत्व्यदेशकी सरहद पर था, यद्यपि उसका 
निरीक्षण राजधानीसे ही द्योता था।' इसी कारण कौरवोंको 
घेतु अपहरणमें सुचिधा अधिक पड़ी ओर सरददेके ” कारण उन्हे 
चढनेके लिए अकारण ही एक कारण मिल गया। 

सहदेवने इनका निरीक्षण स्वीकार किया था। इससे असि- 
आय यही था कि गायोके सरहदपर रहनेके कारण -इनके सलुष्य . 


कौजोंके राज्यका समाचार सम्य-समयपर दे सकेंगे। कौरवों- 
६. 


( १२२ ) 
के समाचारोसे परिचित रहना तो पांडवोंके लिए सदैव 'ही उचित 
आर आवश्यक था। 
प्रकार पॉचों पाण्डव द्रोपदी सहित अपनी अपनी 

योग्यताके अनुसार नीति-अदर्शित पथका अनुसरण करते हुए 
अपने-अपने पदोपर नियुक्त हुए थे। यदि नीतिका वे लोग 
पद्पदपर सद्दारा न क्ैते तो कदाचित सर्वप्रकार सुरक्षित रहनेमें, 
थे सफल भी न हो सकते । यदि नीतिका प्रश्न दी न होता वो 
पांडव कौरबोके समीप रहनेकी न सोचते, वरन्‌ दूर ही रहनेका 
प्रयत्न करते, परन्तु नहीं; उन्हें अपनी नीति कुशलतापर विश्वास 
था कि मत्त्यराजके यहां कौरवोंके इतने ससीप रहते हुए भी, वे 
सुरक्षित रह सकेंगे | 

निससन्देह उनका वह विश्वास अनुचित न था। इसी नीतिके- 
बल्॒पर पांचो पांडवोने जो कुछ चाहा, उसे सौ कोरवोके विरुद्ध. 
होते हुए भी पूर्ण द्वी कर डाला | 


/ अमन्यास 
( १ ) पाड्वने अपने वर्मकी रक्षा क्से की ? 
( * ) द्रोपदीको किस प्रकार उन छोगोंने अपने साथ रखा। 
( ३ ) पाइवोकी वीरताके सबृधसे क्या जानते हो 2 
(४ ) पाडव अल्यन्त राजनीति कुशल थे, इसका क्या श्रमाण है ! 
( ७) पाठवोंने न्‍्यायकी रक्षाके लिए क्‍या क्या प्रयज्ञ किये ९ 
(६ ) इसका प्रमाण दो कि पाडव शात्तिके पुजारी और घर्मात्मा थे 
(७) पाडवोंकि दु खमें श्रीकृष्ण भगवादते क्या सद्दायता दी ? 


( १र३ ) 
३१---बीर शिवाजी 
[ संकलित ] 
जीती, जाती हुई जिन्होंने भारत बाजी। 
है जग-जादिर वही छत्र पति भूप शिवाजी ॥ 
वीस-वंशमें खयं॑ जन्म था जिस माताका। 
वीर-कोखसे घबीर उसीने जाया वॉका॥ 
बीरोचित कतेव्य उसीने सुतका ताका। 
अग्न शोचसे गिरी उसीके मुगल-पताका ॥ 
राजपूतका रक्त मिला उसके नस नसमें। 
क्यो फिर आकर शक्ति न द्योती उसके बससें || 
थे जिसके सबचरित अलोकिक बाल-वयससें । 
करता सभव क्यों न असम्भव वह साहससे | 
दादाजी से वीर विग्नने जिसे पढ़ाया। 
रामदासने जिसे धमे-डपदेश सुनाया ॥ 
वही शिवाजी बीर, बीर माताका जाया। 
रहने देता भला कहीं निज देश पराया॥ 
देश, नाम, कुल, धर्म हिंदुओंका मिट जाता ! 
आपना शब्द पुनीत न कोई कहने पाता |॥ 
आर्य गुणोंका गान कहों से कोई गाता। 
/ यह अबतारी बीर न जो भारतमें आता॥ 
करके उसका ध्यान चित्त होता है चंचल। 
जिसके कारण वँधा हिंदुओका बिखर बल ॥ 
उसे अश्वपर देख फूल उठता था रण थत्र । 
विकट मरह॒ठे बीर जूमते थे दलके दल ॥ 


( १२४ ). 


दूर दूर जय ध्चजा शिवाजीने फहराई। 
निज खतंत्रता गई हिन्दुओने फिर पाई॥ 
एक बार फिर जन्मसूमि यह निज कहलाई। 
राम-राज्यकी छटा इृष्टिमें फिरसे आई॥ 
सहदे देशके लिए उन्होंने नाना संकट। 
गिने न पगके कष्ट वाट भी लगी न ऊबट ॥ 
पग-पंग छिनछिन यद्पि खड़ेथे सिरपर घांतक | 
तो सी उनका भ्ुुका न रिपुके आगे ससृतक ॥ 
कठिन विपतमे भी न उन्होंने त्यागा धीरज । 
गूढु अनूठी युक्ति सोच साधा निज-कारज ॥ 
आपसका विश्वास दूसरे देशो को तज। 
आ धरता था सीस मरहठेके पदकी रज ॥ 
निज जुज चलसे शीघ्र राष्टको सदा! बनाया। 
हरद्वार, गुजरात, सेतु, जगदीश जगाया ॥ 
, चैश्योको सी समर-मूमिका खेल दिखाया। 
पलमे कर दी दूर परालम्बन की साया ॥ 
राजनीति में रही शिवाजीकी चहुराई। 
वेरी ने भी छिपे वेड़ाई उनकी गाई॥ 
शूर-साघु, कवि गुणी इन्हे थे जीसे प्यारे। 
दया, भक्ति, नय, शील रहे वे हियमे धारे | 
गुरु गो-हिजके चरण प्रेमसे सदा पखारे। 
किया न कोई कास बिना नुप धर्म विचारे।। 
उचित यही है करें वीर-यूजा मिल हम सब । 
यही धर्म है सत्य, यही है. सथ्या करतब॥ 


४ अभ्यात 
' (१ ) शिवाजीकी बीरताके बारेगें तुम क्या जानते हो १ 


(१२४ ) 


(२ ) निम्नलिखित शब्दोके झुद्ध रूप बतलाओ 2? 
यद्यपि, विषत, कारज, करतव | 
( ३ ) मलुष्योंका सच्चा कर्तव्य क्या है १ 
( ४) निम्नलिखित शच्दोंमें कौन समास हैं 2 
वीर-पूजा, उ॒प-घर्म, मुगल-पताका, बाल वयस । 
(५ ) दादाजीसे-----छुनाया । इस पद्मका भावार्थ लिखो | 
(६ ) अवतारी, विखंरा, शीघ्र, राष्ट्र, घारे--ये व्याकरणसे क्या हैं १ 
(७ ) जग-जाहिर, वीर-कोख, अनूठी, परालम्बन शब्दोंका अथे 
बताओ । 
( ८ ) कठ्वि------निज कारज । इस पद्मका अन्वय करो । 


३२---च रितावली 
महाकवि कालिदाम, 
[ ्ञे०--भारतेंदु वायू दरिश्चन्द्र ] 


(जन्म भाद छुक्क ७ स १९९७ बि०, खर्गवास स० १६४२ 
वि० जन्म स्थान काशी । आप वर्तमान हिन्दी-साहित्यके सर्वश्थम. भद्दा- 
सथी हैं। दिन्दी-नाटक साहित्यके जन्मदाता भी आप द्वी हैं।आप बंड़े 
दी सादित्-रसिक, उदार, प्रेमी, सहृदय, तथा हिन्दी, हिन्दू) दिन्दुस्‍्तानके 
सच्बे भक्त थे। ) 

राजा विक्रमकी सभामे नो रत्न थे। उनसेसे एक फालि- 
दास थे। कदते हैं कि क्डढकपनमें इन्होने कुछ भी नहीं पढ़ा- 
लिखा। केवल एक ख्लीके कारण इन्हे अनमोल विद्याका धन 
हाथ लगा । इसकी कथा यो प्रसिद्ध है:-- 

( १) राजा' शारदानन्दकी लड़की विद्योत्तमा यड़ी पंढिता 
थी। उसने यद्द प्रतिज्ञा की थी कि जो मुझे शाल्वार्थने जीतेंगा 
उसीको व्याहूंगी। उस राजकुमारीके रुप, यौचन और विदयाकी 


( १२६ ) 


प्रशंसा सुनकर दूर दूरसे परिडत आते और शाखाय्में उससे 
हार जाते। जब परिडतोंने देखा कि यह लड़की किसी तरद्द वश-' 
से नहीं आती ओर सबको हर देती है, तव मनमें, लब्विद 
ट्ोकर सबने एका किया कि किसी ढवसे विद्योत्तमाका विवाह 
किसी ऐसे सूखेके साथ कराये, जिससे बह जन्सभर अपने 
घमंडपर पछताती रहे । निदान वे लोग नूखेकी खोजमे निकल्ते। 
जाते जाते देखा कि एक आदमी जिस पेड़के ऊपर बैठा है, 
उसीको जड़से काट रद्द है। परिडतोंने उसे महामूले सममकर 
बड़ी आवमगतसे नीचे बुलाया और कहा कि चलो, हम 
छुम्दारः व्याह णशजाकी लड़कीसे करा दें। पर खबरार, 
राजाकी सभासे मु द्दसे कुछ भी वात न कहना, जो वात करनी हो 
इशारेसे बताना । निदान जब वह राजाकी सभामें पहुँचा, तब 
जितने परिडत वहां बैठे थे, सवने उठकर उसकी पृजाको, ऊँचीं 
जगह बैठनेको दी और विद्योत्तमासे यह निवेदन किया कि ये 
बृहसपतिके समान विद्धान हमारे गुरु आपको व्याहने आये 
है। परन्तु इन्होंने तपके लिये मौन साधन किया है। जो कुछ आपको 
शाखाथे करना हो इशारोसे कीजिये। निदान उस राजकुप्तारीने 
इस आशयसे कि ईश्वर एक है, एक उँगली उठाई। मूखेने यह 
सममक्कर कि धमकानेके लिये उँगली दिखाकर एक आँख फोइने- 
का इशारी करती है, अपनी दो उँगलियाँ दिखलायीं। पंडितों- 
ने इन दो उँगलियोके ऐसे अथे निकाले कि उस राजकुमारी- 
को द्वार माननी पड़ी ओर विवाह भी उसी समय दो गया, 
रातके ससय जंब दोनोका एकान्तमे साक्षात्तार हुआ तब 
किसी तरफसे,एक ऊंट चिल्ला उठा। राजकन्याने पूल्ला कि यह 
क्‍या शोर हैं ९ मूखे तो कोई शब्द शुद्ध नहीं बोल सकता था; 
बोल उठा-/डट्र! चिल्लाता है ओर जव राजकुमारी ने दुददराकर 


( १२७ ) 


पूछा तब “उट्र! की जगह उस कहने लगा, पर शुद्ध रूप 'उष्ट्र” 

का उच्चारण व कर सका तव तो विद्योत्तमाकों प ' 
दगाबाजी माल्म हुई और अपने धोखा खानेपर पछताकए फूह- 
फूठकर रोने लगी। यह मूल भी अपने मनमे वड़ा लज्जित हुआ । 

पहले दो चाह्य कि जान ही दे डाल, पर फिर सोच सममकर 

घरसे निकल विद्योपार्जनमे परिश्रम करने लगा और थोड़े दी 

दिनोमे ऐसा परिडत हो गया, जिसका नाम आजतक चला 
आता है। जब वह मूले परिइ्त होकर घफ़े आया, उस समय 

जैसा आनन्द पिद्योत्तमाके मनमे हुआ, लिंखनेसे बाहर है। 

सध है, परिश्रमसे सव कुछ दो थकता है । 

कालिदास घड़े चतुर पुरुष थे। उनकी चतुराईकी बहुत- 
२३ आल वे सब मनोरंजक हैं। उनमेसे कई एक 


(२) एक समय कालिदासके पास एक ' मूह ज्राह्मयण आया 
ओर कहने लगा कि कविएज, में बहुत द्रिद्र हूं ओर मुममें 
कुछ गुण भी नहीं दै। मेरा आप कुछ उपकार करें तो भला 
होगा | 

कांलिदासने कद्द--अच्छा, एक दिन हम तुमको राजाके 
पास ले चलेंगे, आगे तुम्हारी प्रारधध। परन्तु रीति है कि जब 
राजाके दर्शनके निमित्त जाते हैं तो कुछ मेंट ले जाया करते हैं। 
इसलिए जो इखके चार डुकड़े देता हू सो ले चलो। श्ाह्मण घर 
लोटा और/उन ईखके टुकड़ोको उसने घोतीमे लपेट रखा। यह 
देख किसी ठगनें उसके बिना जाने उन टुकड़ोको निकाल लिया 
और उनके बदले लकड्ीके उतने द्वी ुकढ़े वॉध दिये। 

ण्जाके दशेनोको चलते समय बआाह्षणने इंखके डुकड्ोको 
नहीं देखा। जब सभामे पहुँचा तव इस काठकों राजाको अपेण 


( १२८ ) 
किया। राजा उसको देखते दी बहुत क्रॉंधित हुए। उस समय 
कालिदास पास हद्वी थे। उन्होंने कहा, महाराज ! इस ब्राह्मण- 
ने अपनी दरिद्वतारूपी लकड़ी आपके पास इसलिये लाकर 
रखी है कि उनको जलाकर इस ब्राह्मणको आप सुखी करें॥ 
यह बात कविके भुखसे सुनते ही राजा बहुत असन्न हुए ओर 
उन्होने त्राष्षणको बहुत धन दिया । 


(३) एक समय कविवर कालिदास अपने मकानमें चैठकर 
अपने प्रिय पुत्रको अध्ययन कराते थे, उसी समय ज्षत्रिय-कुल- 
मूपण शकारि विक्रमादित्य संयोगसे आ गये। कविचर कालि- 
दासने मद्दाराजको देख, पढ़ाना छोड़ शिष्टाचारकी रीतिसे महा- 
राजका आद्र-मान किया। ज़ब महाराजने पढ़ानेकी ग्राथेना की 
तब फिर अध्ययन कराना आरम्भ किया। उस समय कविवर 
कालिदास अपने पुत्रकों यही पढ़ाते थे कि राजा अपने देशमें ही 
मान पाता है और विद्यनका मान सब सथानोमे होता है। महा- 
राज इस झ्कारकी शिक्षाकों सुनकर अपने मनसें कुतर्क करने _ 
लगे कि कविवग कालिदास ऐसे अमिमानी परिडित हैं कि मेरे ही: 
सामने परिडतोकी वड़ाई करते हैं और राजाओं या धनवानोको ' 
वा मुमे नीचा दिखाते है। में परिडतोका विशेष आदर-मान 
करता हू ओर जो मेरे वा अन्य राजाओं वा घनवानोंके यहाँ 
पस्डितोका आदर नहीं हो तो कहाँ द्ो,सकता है? ऐसा ऋतर्क: 
करते हुए राजा, अपने घर गये। 


महाराज विक्रमादित्यने कविवर कालिदासकों जो घन 
: संपत्ति दी थी, उसको हर लेनेके लिंये मंत्रीको आज्ञा दी । मंत्रीने 
बैसाद्दी किया, जैसा महाराजने कह्य था | कविद्रर कालिदासकी 
'जीबिका जब हर ली गई तब दुखी होकर वे अपने वाल-चच्चोके 
साथ अनेक देशोमे मटकते हुए अंतमे करनाटक देशमे पहुँचे । 


( १२६ ) 

' करनाटक देशाधिपति बड़े पण्डित और गुणमाहक थे। उनके पास 
जाकर कविवर कालिदासने अपनी केंचिता-शक्ति ठिखाईं। उसपर 
करनाटक देशाधिपतिने अति प्रसन्न द्वोकर बहुत-ःसा धन और 
भूमि देकर अपने शज्यसे उन्हें रखा ।  कविवर कालिदास शाजा- 
से सम्मान पाकर उस देशमें रहकर प्रति दिन राज-सभामे जाने 
ओर वहां राजाके सिहासनके पांस ऊँचे आसन पर बैठ सब 
राजकाजोमे सम्मति देने लगे और अनेक प्रकारकी कविताओसे 
सभासदोके सनकी कली खिलाते हुए सुखसे रदने त्तगे। 


जबसे कविवर कालिदासको विक्रमादित्यने छोड़ा तबसे वें 
घडे शोकसागरमे डूबे ये। नवरत्नोमे कालिदास द्वी अनमोल रन 
थे। इसके सिवा जब राजाकों राज-काजके कामोसे फुरसत मिलती 
थी, तव केवल कविवर कालिदासकी द्वी अद्धूत कविताओको सुन- 
कर उनका मन अफुल्लित होता था। इसलिय॑ ऐसे गुणी मलुष्यके 
बिना राजाका सब चसूतुओसे मन उदास होने ल्गा। फिर राजाने 
कविराज कालिदासका पता लगानेके लिये सब देशोमे दूतोकों 
भेजा । जब कद्दीं पता न लगा तव राजा आपद्वी भेप बदलकर 
' खोजनेके लिये निकलते | कई देशोमे घूमते-फिस्ते जब वे कर्नाटक 
देशमें गये, तबे उनके पास पथ-व्ययके लिये हीरा जड़ी हुईं एक 
अगृठीको छोड़कर और कुछ नहीं था। उस अंगूठीको वेचनेके 
लिथ वे किसी जोहरीकी दूकान पर गये । रन-पारखीने ऐसे द्रिद्र- 
के हाथमें ऐसी अनमोल रक्त-जड़ित अंग्रृहीकी देखकर मनमें 
घोर समझा और कोतवालके पास भेजा | कोतवाल राजसभामे 
जैगया। वे चारो ओर देखते-भालते जो आगे बढ तो कविवर 
कालिदास को देखा ओर कद्ा-“महाराज, मैंने जैसा किया वैसा 
हो फल पाया ।” कविबर कालिदासने उठकर राजाको अडद्भुमे 
लगाकर कनोौंटक देशाविपतिसे परिचय कराया और सब व्यौस 


( १३० ) 
'कहकर राजा बीर विक्रमादित्यके साथ चल्ले आये। 
४ कोई कोई कहते हैं. कि कविबर कालिदास की सहायतासे 
'यक आ्रद्मणने राजा भोजसे एक श्लोकपर अनेक रुपये इस चतु- 
राईसे लिये थे :-- | 


उज्जेन नगरीमे राजा भोज ऐसे विद्या-रसिक शुशज्ञ और 
दानशील थे कि विद्या प्रचारके निमित्त उन्होंने यह नियम प्रचलित 
किया था कि जो कोई नवीन आशयका श्छोक वनाक्र लावे, 
उसको एक लाख रुपये दक्षिणा दी जाय। इस बात्को सुनकर 
देशदेशान्तरके परिडत लोग नये-नये आशयके श्लोक बनाकर 
लाते थे। परन्तु उनकी समामें चार ऐसे पंडित कि एकको 
एक वार, दूसरेको दो बार, तीसेरेको तीनचार और चोथेकों चार 
वार छुननेसे नया श्लोक कण्ठसुथ हो जाता था। इससे जब कोई 
परदेशी पंडित राजा की सभा से नवीन आशयका श्लोक वनाकर 
लाता था, तब वह राजा के सम्प्रुख पढ़कर सुनाता था । उस समय 
राजा अपने पंडितोसे भूछतै थे कि यह श्लोक नया है या पुराना, 
तब वह मनुष्य जिसको एक वार सुनकर कंठसथ दो जानेका 
अभ्यास था कहता 'कि यह पुराने आशयका है और आप भी 
'पढ़कर सुना देता था। इसके अनन्तर घह् मनुष्य जिसे दो वार 
सुननेसे कठसूथ हो जाता था, पढ़कर सुन्नाता और इसी प्रकार 
बह मलुष्य जिसको तीन घार और वह भी जिसको चार वार के 
सुनने से कंठसुथ होने का अभ्यास था, क्रम से सब राजाकों कठाप्र 
सुना देंते। इस कारण परदेशी विद्वान्‌ अपने मनोस्थसे रहित 
दो जाते थे। इस बातकी चर्चा देशैदेशान्तरोंमे फैल गई । परन्तु 
शक विद्वान ऐसा देशकालमें चतुर ओर बुद्धिमान निकला कि 
उसके वनाये हुए आशयको इन चार मनुष्योकी भी नवीन अट्ली- 
कार करना पड़ा और वह यह है कि हे तीनो लोकके जीतने- 


( १४३४१ ) 


चाले राजा भोज ! आपके पिता बढ़े धर्मिप्ठ हुए हैं। उन्दोने 
मुझसे निन्नानवे करोड़का रत्न लिया है, सो मुझे आप टीजिये और 
इस बरतान्तको आपके सभासद विद्वान जानते द्वोंगे, उनसे पूछ 
लीजिये। जो वे फह्टे कि यह आशय फेवल नवीन कविता सात्र 
है तो अपने प्रणके अनुसार एक लाख रुपया मुझे दीजिये। इस 
आशयको सुनकर चारों चिह्ानोंने विचार किया कि यदि इसको 
पुराना आशय ठद्दरावें तो मद्दाराज़्को .- निन्नानवे करोड द्रव्य 
देना पढ़ता है और नवीन कहनेमे एक लाख, सो उन 
घचारोने क्रमसे यही कद्दा कि पृथ्चीनाथ ! यह नवीन आशयका 
श्लोक है। इसपर राजाने उस विद्वनकों एक ल्ञाख़ रुपया दिया। 


अभ्यास 
(१ ) पण्डितं। फो विद्योत्तमा से क्यो ईर्ष्या हुई २ 
(२ ) कालिदासको केसे विद्या लास हुआ ४ 
( ३ ) विक्रमादित्यने कालिदासकी वन-सम्पत्ति क्यों हर छी थी १ 
(४ ) “राजा का सम्मान अपने राज्यम और विद्वानका, सर्वत्र दोता हे” 
इस कथन की पुष्टि इस पाठ के आवार पर करो १ 
(५ ) विद्वान ब्राह्मणणे भोजसे एक लाख रुपया किस प्रकार प्राप्त किया १ 
( ६ ) समास चतलाओ ४--- 
क्षत्रिय कुल-भूषण, शकारि, नवरन्न, देशाविपत्ति, अनमोलर्ल-जटित । 
(६ ७ ) शब्दार्य बताओ «--- 
अध्ययन, विक्रम, अफकल्लित, अनमोल, विदया-रसिक । 


कल कपपमर ० 


( श्र )... 
३३--गिरिधरकी कुण्डलियाँ 


७०-60 88 0 ००००० 


[ ल्े---गिरिघर कवियय ] 


( जन्म अनुम्तित स १७७० १ निवासस्थान अवधके आसपास । 
आपकी कुण्डलिया बहुत लोकप्रिय हैं, लौकिक विचारोंका इनमें प्रचुरताते 
समावेश है । किंवदन्ती प्रसिद्ध है कि जिन छन्दोके आरअम्ममें 'सहे” 
शब्दका अयोग हुआ है, वे उनकी ज्री द्वारा लिखे गये हैं । ) 


( १) 
मित्र विद्योहा अति कठिन, मत दीजे करतार। 
बाके गुन जब चित चढ़े, चरसत नयन अपार ॥ 
बरसत नयन अपार, मेघ सावन भरिलाई। 
अब बिछुरे कव मिलें, कहो कैसी वनिआई।॥। 
कह गिरिधर कविराय, सुनो ,हो विनती एहा। 
हैं करतार दयाल देह, जनि मित्र विद्लोह्दा ॥ 


( ४२) 
साई घोड़न के अछत, ग्रदहन पायो राज। 
कौोआ लाजे द्वाथ में, दरि कीजिये बाज॥ 
दूरि कीजिये बाज, राज पुनि ऐसो आयो। 
सिंह कीजिये केद, सयार गजराज चढ़ायो॥ 
कह गिरिधर फषिराय, जहों यह चूक बढ़ाई। 
तहाँ न कीजे भोर, सांक उठि चलिये साई ॥ 
( ३) 
साई अगर उजार मेँ, जरत महा, पछितात्। 
गुन-गाहक कोंऊ नहीं, जादि झुवास सुद्दाय ॥ 


( १३३ ) 


जादि सुबास सुदाय, सुने घनमे कोउ नाहीं। 
के गीदड़ के हिरन सुनो, कछु जानत नाँहीं॥ 
कह गिरिधर कविरय, बढ़ी दुख है गुसाई। 
अगर आककी राख भह, ।मलि एके साई ॥ 
(४) 
बगुला भपटत बाज पै, वाज रहे सिर नाय। 
कुलहा दीन्‍्हें पग चंधे, खोटे दे फद्दराय ॥ 
खोटे दो फहराय, फहे जो जो मन आबे। 
कुलद ले पग छोरि, धन्ती विन कौन छुडावे ॥ 
कह गिरिघर कविराय, अरे तू सुन खग बंगुला। 
समय पतलत्यो जान, वाज पे मपटे बगुला॥ 
(४) 
कौआ कहत मराल सो, कौन जातिको गोत। 
तो सो बदरूपी महा, कोउ न जगमे दोत॥ 
कोड न जगमें दोत, कुंटिल मैज्े मलखाने। 
उसर बैठ भय्योद-श्रष्ट, आचार "न जाने॥ 
कह गिरिधर कविराय, कहाँ ते आयो होआ। 
धन्य हमारो देश, जद्दों सब्जन जन कौआ ॥॥ 


अभ्यास 
(१)'जिन उन्‍्दोंमे साई शाब्दका अ्रयोग हुआ है, उनके "विषयमें तुम 
क्या जानते द्वो 
(२) दूसरे छन्दकों अन्दय करो । 
( ३ ) तीसरे छन्दका भावाथे समकाओ | _ 
(४ ) शब्दाव बतकाओ ४-- ' 
विछोदद, करतार, छुवास, भाक, म्यदा-अष्ठ, मराल । 


(१३४ ) 


(५) “अगर-भाककी राख भहं मिकि एके साई” का भावार्क 
] |] 
( ६ ) पद-विन्यास करो:--- 
बगुछा भरत वाज पे बाज रहे सिर नाय। 
( ७ ) इस पाठके विशेष्य और विशेषणोंको चुनो । 
( ८ ) कौआ कद्दत ०००००७०७७७ ते आयो हौगा । 
उक्त पय्के मुख्य भावपर एक निवन्ध तेयार करो। 


३४--चीर-जननी-राजस्थान 
की , संकलित ) 

यदि संसास्में कोई ऐसी वीर-जननी वीर-मूमि है, जहांकी 
धप्पा-चप्पा जमीन बीरताकी सरगुजिश्त हो और जंहां जगह- 
जगह वीरोके कारनामोंसे पत्रित्र ओर अमर बनी हुई नदियाँ 
आर उपत्यकाए बीरोके शहीद दोनेकी गवाद्दी देती हो, तो वह 
हमारी जननी-जन्ममूमि भारतवर्णका गोर्व राजसथान है। 
सूपार्टावालोंकी बहादुरी, रोमन लोगोंकी घीरता, तुकोंकी निड- 
रता, वीर-जननी-राजसथानके सम्मुख कोई वकअत नहीं रखती। 
यदि स॒वाधीनताके साज्ञात्‌ अवतारके चरणु-कम्त॒लकी पवित्र रज 
कहीं मिल सकती है, तो वह हमारी गौण्व सथापिनी मेवाड़ मूमि 
ही है। भारतवर्णषका चमचसाता हुआ सूये, मद्दाराणा प्रताप, 
जिसने सांरे संसारको दिखला दिया कि सूवाधीनताके'मुकाविल्े- 
सें ।राज-पाट घन-दौलत, महल्ोके ऐशो-आराभकी कोई कीमत 
' नहीं-वह खामिमानकी अ्रतिमूर्ति रणा प्रताप; जिसको अपने 
जिगरके टुकड़े, महल्ोमें पल्ले हुए राजकुमार और राजकुमारीका 
कांटेदार जंगलो और नुकीले पत्थरोके बीच भारि-ारे फिरते: 


( १३४ ) 


ओर भूख-प्याससे विलखते हुए देखनेका हृदय-विदारक दृश्य 
भी बिदेशियोके सामने सिर भ्ुकानेपर मजबूर न कर सका,. 
इसी चीर-जननी भेचाड़-भूमिकी पवित्र गोदमे खेला था। यही 
वह भूमि है, जहाँ आत्म-सम्मानकी अतिमूर्ति वाके अमरसिद्‌ 
राठौरने संसारकों बता दिया कि राजसूथानके वीसेका खून: 
भौतके डरसे भी अपभान सहन नहीं कर सकता। आह ! इस 
भूमिके जलमे वह तासीर थो कि इसके छोटे-छोटे बालक भी: 
देशपर मरना अद्योभाग्य समझते थे। इसीकी वायुमें चद्द तेज 
था कि जिसने बारह वर्षके बादल ओर सोलह वर्षके फत्तेमे वह 
' निम॑कता पेंदा कर दी, कि देशकी खतन्‍त्रताकी रक्षाके लिये 
बे अपने प्राणोकी "आहत दे देनेमे जय भी न हिचके। इसी 
भूसिके अन्नमे चह मादकता थी जो खानेचालोकों देशके मदमें 
मतवाला वना देती थी । 


अपनी जन्म-भूमिके नासका भी अनादर न सहनेकां अद्वितीय 
गोरव इसी वीर भूमिको श्राप्त है। उदयपुरके मदहाराणाने शपथ 
ली कि यदि भोजन कहूँगातो बूंदी फतद करके करूेंगा। 
मेवाइसे दूरसथ बूदीको फतदध करना कोई आसान काम न था| 
सरदारोंने राणाकी समझाया कि इसका मतलब तो आत्महत्या. 
करना होगा। सरवारोंकी सन्त्रशानुसार तय इआ कि नकली चूदी: 
को फतद कर राण। अपनी अतिक्षा (री करें। रायाकी फोजमें ' 
कुछ बूदीके हांडे राजपूत भी थे। उनसे अपनी साठ्मूमिका 
अपसान_ न सहा गया ओर उन्होंने वद्दी कर दिखाया, जा कि 
राजसूथानके गौरवके योग्य था। भेवाड़के बहुसंख्यक राजपूतोंके 
बीच, अल्प-सख्यक यू दीके हांढ़े मर मिटे । किसपर १ बूीके 
' नामपर | घन्य राजसथान, घन्य |! 


राजस्थान ही वद भूमि है जिसकी गोदमे भामाशाह उदार, 


( १३६ ) 


त्यागी खेले है। सचमुच वीर-जननी तू धन्य है ! तेरी गोढके 
लालोने संसारमे भारतवर्षका नाम उज्जवल कर दिया। काश्मीर- 
से लेकर कन्याहुमारीतकक सारा भारत तेरे सुपुत्नोपर फख्‌ 
करता है। तेरी द्वी छातीपर वष्पा रावल जैसे वीर खेले हैं, 
जिन्होंने सूय्यंवंशी अतापी भांडा न केवल भारतवर्षमें द्वी ,प्रत्युत 
अफगानिसतान, विज्ञोचिसतान और खुरासानतक फहराया । 
तेरे पुत्र उदाण्तामे अपनी नजीर आपही थे, जो उनकी शरणामें 
आया आखीर दसतक रक्ता की। यदि संसारके किसी देशको 
यह फल्लन हो। सकता है कि उसके वीर-पुत्रोने क्षज छीनकर 
बख्श दिये, तो वह महाराणा राजसिंद जेसे तेरे द्वी सुपुन्नोंकी 
बठौलत राजसथानको भ्राप्त है। तेरे लालोने धर्म और देशके 
लिये चार-बार अपना गमे खून चढ़ाकर हिन्दू-कौमोकी 
जत्तेजना पैदा की--मेबाड़के राणा कई पीढ़ियोतक केषल एक 
धर्मसुथान गयाकी रक्तामे एक दूसरेके वाद प्राणोकी आहुतियाँ 
चढ़ाते रहे। सचभुच वीर-जननी माँ | यदि तू दुर्गादास, 
राजसिंह, जयपुरके रामसिंह आदि वीरोका असव न करती तो 
शायद भारतवषेमे ओऔरहइजेव जेसे घादशाहोके होंते हुए एक भी 
हिंदू नजर न आता । 


ओ राजसथान । तेरे पुत्र द्वी नहीं, पुत्रियों भी देश व 

रक्षार्थ सदेच्‌ . तत्पर रही हैं, तेरी पुत्री पद्मिनी, ताराबाई- 
में वह शक्ति थी कि शत्रु ओके छकी छुड्डा सकती थीं ,. वेरी 
पुत्रियों अपने बेटों और पतियोको प्रसन्नता-पूवेक रणक्षेत्रमे 
अलिदानके (लिये भेज सकती थीं। फत्तेकी माता कएंवबती भी 
ज्ेरी ही पुत्री थी, जिसने पुत्रकी जरा-सी कमजोरीको देखकर 
स॒र्य पुत्र-बधू सहित रणक्षेत्रमें जा श्राण विसर्जित कर दिये। 
तेरी पुत्रियोने सतीत्वरक्षाथं जो जो. उदाहरण संसारके सामने 


(१३७ ) 


पेश किये, वे तो समसत सी जातिके लिये हैक 
हैं। क्‍या शाजसथानकी पुत्रियोसे अधिक उच्ज्यल 

उदाहरण सारे संसारके इतिहासका कोई पृष्ठ दे सकता है ९ 
तेरी पुत्रियों एक थार नहीं, अनेक वार सतीत्व-रक्षाथ॑ जलते 
हुए आगके कझुडोमे इजारोकी संख्थामें कूद पढ़ीं। सचमुच 
भारतकी चीरताका इतिहास तेरा ही इतिहास है। कितु 
जननी ! आज तेरी पुत्रियोके कारनामे केवल इतिहासके प्रप्ठोकी 
ही रौनक रह गये। तेरी बर्त्तमान दशाकों देखकर हृदय विदीर्ण 
होता है। आज वीरोकी जगह कायर और घबुजदिलोने ले ली। 

दुर्गादास जैसे बीर, जिनको घन और राज-पाटका त्ालच भी 
बल घी जोन रा ही अल ढोल 

जगह चापलूस 

कलझ लगानेके लिये पैदा द्ो गये हैं। दुर्गांबदी जैसी पवित्र 
देवियोंका स्थान, जिसने अपना हाथ एक गौर आदमीका 
सूपर्श होनेके कारण काटकर फेंक दिया था आज खाली सा 
साल देता हे। जहां कभी तेरे पुत्र आदरके पात्र थे, आज 
घुणाके केन्द्र वने हुए हैं। यदि स्वेच्छाचार, चापलूसी, सवा 
आदि दुगुंश तेरे पुत्रोमे इसी तरह बढ़ते गये तो चंह दिन दूर 
नहीं जब कि उन पूर्वेजोकी कीतिपर पानी फिर जायगा। अब 
केवल आवाहन है उन पुतन्रोका, जिनके दिलमें देंरे' लिये कुछ 
जोश हो और द्वो उनमे अतुल पराक्रम। तभी तेरी पूर्व-संचित 


सूथिर रह सकती है; अन्यथा नदों। भगवन्‌ ! तू शीघ्र 
ही ऐसे पुत्रोंकी फिए राजसथानमे भेज अर 
अभ्याप्त 


५६१) राजस्थान किस्ते कहते हैँ । इसमें “ कौन-कौनसे वीर भत्यन्त 
प्रसिदूष हुए हैं । । 
१०. । 


( श३८ ) 


(२ ) राणा-प्रतापके धारेमें क्या जानते हो ? ये ससारमें इतने यशात्वो 
क्यों सभम्क्े जाते हैं ? 

( ३ ) वीरताकी प्रतियूत्रि यह राजस्थान द्वी क्यों कद्दा जातों है ? 

(४ ) मेवाढ़, चित्तौड़ कहां हैं, इनके सम्बन्धम क्या जानते हो १ 

(५ ) यद्ाकी वीर ल्ियोंके सम्बन्धमें अपनी राय दो । 

(६ ) राजस्थानको वीर-भूमि बनानेमें यद्मकी स्नियोका कितना हाथ है £. 

(७ ) राजस्थानके छोटे-छोटे बच्चोमें मी इतना अदम्य उत्साद्द, प्रतिमा, 
बल और बीरताका सचार क्यों दिखलाई पड़ता था १ 

( ८ ) राजस्थानके वीरोंने अपनी मातृ-भूमिके रक्षार्थ किन-क्रिन मुसल-« 
मान वादशाहोंसे लोह्दा लिया। 


५ 


३५--सूरदासके पद 
(ज्ञे०--महात्मा सूरदास ) 


( आपका जन्म, अनुमानसे स० १७५४० वि० में हुआ या, आपकी 
झत्युका अनुमान स० १६२० वि० में किया जाता है। झाप श्रीकृष्णजीके 
अचन्य भक्त थे । आपका रचित सूर॒ सागर त्रज भाषाका एक सर्वोत्कृष्ट- 
और मदान्‌ धन्य है। आपका” पवित्र विरद हिन्दी साहित्यमें सदेव 
अमर रहेगा। सरसमभावोंसे प्रवाहित आपको भाव-घारा श्रीकृष्ण भक्तोंके 
हृदयको आनन्दसे परिष्नावित करनेवाली है । ) 

(५ १/ 
हम सक्तनके सक्त हमारे | 
सुन अजुन परतिज्ञा मेरी, यह ज्रत टसतन टारे॥ 
_>सक्ते काज लाज हिंये घरिके, पाह पयादे घाऊ। 
जहूँ जहँ भीर परे भक्तन पे, तहेँ. तहँ जाइ छुड़ाऊँ ॥ 


( १३६ ) 


जो मम भक्तसों वेर करत है, सो निज वैरी सेरों। 
देखि विचारि भक्त हित कारन, हॉकत हो रथ तेरो ॥ 
जीते जीत भक्त अपनेकों, हारे हारि विचारों। 
वसूरदास सुनि मक्त विरोधी, चक्र सुदर्सन जारों॥ 


(२) 

छांडि मन दरि विभुखन को संग। 

जिनके संग कुबुधि उपजत है, परत भजनमें भद्ग ॥ 
कहा द्वीत पथ पान कराये, विप नहिं तजत सुजंग। 
कागहि कद्दा कपूर चुगाये, सूवान ” नद्ाये गंग।। 
'खरको कहा अरागजा लैपन, सकट मूपन अंग। 
गजको कद्दा नद्यामे सरिता, चहुरि घरे खहि छज्न ॥ 
पाहन पतिक वान नहिं. बेघत, रीतो करत भनिखन्न। 
सूरदास खल कारी कासरि, चढ़त न दूजों रघञ्न ॥ 


( ३० 

फिर ब्रज वसहेुँ गोकुलनाथ । 
बहुरि न तुमहिं जगाय पठवों, गोधननके साथ | 
वरलजो न साखन खात कवहूं, देदो देन छुटाव। 
कवहूं न देहों उरहनों; जसुमतिके आगे जाय॥ 
दौरि दाम न देहूँगी, न जसुमति पानि। 
चोरी न देहुँ उघारि, किये आऔगुन न कहिदों आनि।॥ 
करिद्दों न तुमसो सान दृठ, इठिद्योंन मॉगत दान। 
कहिहों न भ्ृदु मुरली वजावन, करन तुमसों गान ॥ 
कहिहों न चरनन देन जावक, शुद्दन बेलना फूल। 
कहिद्दों न करन सिंगार हलक बसन जमुना हि.8 

भमृूपननत युत्त कनन्‍्ध धरिके, रास तुत न | 
हु निकुल्ज वसिके, दूति मुख न जुक्षाउँ॥ 


( १४० )« 


एक बार जु द्रस दिखावहु, भीति पन्‍थ वसाय। 
चंबर करो चढ़ाय आसन, नयन अंग अंग लाथ || 
देहु दस्सन नन्दनन्दन मिलन ही की आस। 
सूर अभुकी कुंवर छविको भरत लोचन प्यास॥ ७ 
(४) 
विनगोपाल वैरिन भइईं कुजे। 
तबये लता क्गति अति शीतल, अब भइई विपम ज्वालकी पुजे॥ 
वृथा ब्द्दति जयुना, खग वोलत, वृथा कमल फूले, अलि गुब्जे। 
पवन पानि घनसार सजीवनि, द्धिछुत किरन भांनु भइ मुजें॥ 
ए, ऊघो कहियो माधव सो, विरह सदन करि मारत लुजें। 
सूरदास प्रभूको मग जोबत, अंखिया भई बरन ज्यों गुजें॥ 


(४) 

ऊधो ज्जकी दशा विचारों । 

ता पीछे यह सिद्धि आपनी, जोगकथा विसतारो॥ 
जेद्दि कारन पठये नंदनन्दन सो सोचहु मन साही। 
केतिक बीच बिरद, परमारथ जानत हो किधों नाहीं॥ 
तुम निज दास जो सखा श्यामके संतत,निकट रहत हो । 
जल बूड़त अवलम्ब फेनको फिरि फिरि कहा गहत हो ॥ 
वै अति ललित मनोहर आनन कैसे मनहि बिसारों। 
जोग युक्ति औ मुक्ति विविध विधि वा मुरत्वीपर वबारो ॥ 
जेद्दि उर बसे श्यामसुन्द्र घन, क्यो /निगुन कद्टि आबे। 
सूरदास सोइ भजन कहावे, जादि दूसरी भावे॥ 


अभ्याप्त 


( १ ) कृष्णजी भक्त-अतिपालक हैं। इस पाठसे सिद्ध करो। 
(३) नीचोंका स्वभाव नहीं छूठता'। दूसरे छन्दसे|प्रमाणित करो । 


( ९७१ ) 


( ३ ) गोपिकाए कृष्णती किशोरावत्थाका स्मरण कर, किन-किन वातों 

को याद करती हैं ? त्तीसरे छन्‍्दको सद्दायताते बताओ । 
(४) 'दधि सुत किए भानु भइ भु जै, में भावाथं बताओ । 
(५ ) छब्दार्थ बताओ : -- 

भजह्न, अरगजा, छग, लछुटो, सकेत, निकज, दूति । 

«० दी30०-७ 
३६---कंस प्रवंचना 
[ ज्लै० लल्लुजी ज्ञाल ] 

( भाष शुजराती ब्राह्यण थे। आप स॑० १८६० में वर्तमान थे। 
आप कुछ दिनोतक कलकततेके फोर्टविलियम कालेजमे शिक्षक रहे! वहीं 
आपने म्जमाषा-मिश्चित वर्तमान बोलवालकी भापषामें. श्रीकृष्णचन्धका 
चरित्र लिखा। आपका प्रेम-सागर नामक श्रन्य बहुत ही लोकप्रिय है । 
आप प्राचीन गयके जन्मदाता कहे जाते हैं | ) ; 

श्री शुकदेवजी वोलें कि मद्दाराज, एक दिन श्रीकृष्ण बलराम 
सांक समे घेनु चरायके बनसे धरकों आते थे, इसी बोच एक 
असमुर अति चड़। चेल चन आय ' गायोसे मिला। 
आफाश लो देह तिनि धरी। पीठ कड़ी पाथर सी करी॥ 
बढ़ें सींग तीकछन दोउ खरें। रक्त नैयनन अति ही रिस भरे ॥ 
पूंछ उठाय डफ़ारतु फिरे। रहि रहि मूतत गोबर करे॥ 
फड़के कन्‍्ध दिलाने कान। भजे' देव सव छोड़ विसान॥ 
खुरसों खोदें नद्दी करारे। पवेत उथल पीठ सो डारे॥ 
सबको श्रास भयो तिदहि काल। कंपदि लोकपाल दिकपाल ॥ 
पृथ्वी इले शेप थरहरे । तिय ओ घेलु गे सू परे॥ 

जसे देखते द्वी सब गायें तो जिधर तिधर फेस गई और जज 
वांसी दौड़ चहां आये, जहाँ सबके पीछे श्रीकृष्ण वलराम चत्ते 
आते थे। प्रणामकर कद्दा--भदह्ायाज, आगे एक अति बड़ा वैल 


( श्र ) 


खड़ा है, उससे हमें वचाओ। इतनी बातके सुनते ही अन्तर- 
जामी श्रीक्षष्णचन्द्रजी बोले कि तुम कुछ मत डरो' उससे, वह 
बृषभका रूप बनाकर आया है नीच, हमसे चाहता है अपनी 
भसीच। इतना कह आगे जाय उसे देख बोले वबनवारी, कि आव 
हमारे पास कंपट तन धारी, तू ओर किसको क्‍यों डराता है, 
मेरे निकट किस लिये नहीं आता ? जो बेरी सिंहका कहावता 
है सो झुगपर नहीं धावता। देख, में दी हूं कालरूप गोविन्द; 
' भैंने तुमसे वहुतोकों मारकर किया है. निकन्द | 


यों कद्दू फिर ताल ठोक ललकारे-आ मुमसे संग्राम कर। 
थद्द बचन सुनते द्वी असुर ऐसे 'फ्रोधकर धाया कि मानो इन्द्रका 
वच्च आया। जो जो हरि उसे हटाते थे तो तो वह संभल्न चढ़ा 
आता था। एक वार जो इन्होने दे पटका तोंही खिजलाकर- उठा 
और दोनो सींगोमे उसने हरिकों दवाया, तव तो श्रीकृष्णजीने मी 
फुरतीसे निकल मटपट पांवपर पांव दे उसके सांग पकड़ थों 
मरोड़ा कि जैसे कोई भींगे चीरको निचोड़े। निदान वह पहाड़ 
खाय गिरा ओर उसका जी निकल गया। तिस समे सब देवता 
अपने अपने विमानोंमें वैठ आनन्‍्द्से फूल वरसाने लगे ओ गोपी 
गोप कृष्ण जसगाने । इस बीच श्रीसधिकाजीने आ हरिसे कहा 
कि मद्दाराज वृषस रूप जो तुमने सारा इसका पाप हुआ इससे 
अब तुम तीरथ नहाय आओ तब किसीको हाथ लगाओ। इतने 
बातके सुनते ही प्रभु बोले, सब तीरथोंको मै त्रजहीमे बुला लेता 
हूँ। यो कह गोवर्धन निकट जाय, दो ओड़े कुण्ड खुदवाए , तहीं 
सव तीरथ देह घर आये, ओ अपना-अपना नाम कद उसमे 
जल डाल-डाल चले गये । तब श्रीकृष्ण उनसे स्लानकर, बाहर 
आय अनेक गोदान दे बहुतसे श्राह्मण जिसाय शुद्ध हुए, 
उसी दिनसे ऋष्ण-कुण्ड, राघा-कुण्ड करके वे अखिद्ध हुए । 


( १७३ ) 


यह प्रसद्न सुनाय श्री शुकदेवमुनि वोले कि महाराज, एक 
दिन नारदमुनिणी कंसके पास आए, ओ उसका कोप बढ़ानेकों 
जव उन्होंने च्तराम और श्यामके होने और मायाके आने ओ 
, #ष्णुके जानेका भेद समझकर कह तव कंस क्रोधकर बोला-- 
नाखजी तुम सच कहते हो) 


प्रथम दियो सुत आनिके, मन परतीत बढ़ाय | 
लो ठग कह्नू दिखाइके, सर्वसु लैभजिजाय।॥ 


इतना कह वसुदेवको घुल्ाय पकड़ वाधा ओर खांडेपर द्वाथ रख 
अकुज्ञाकर चोला-- 


मिल रद्द कपटी तू मुझके। भा साधु जाना में तुमे ॥ 
दिया नन्‍्द॒के कृष्ण पठाय। देवी हमें दिखाई आय॥ 
मनमें कलछु कही मुख और । आज अवश्य मार इहि ठोर ॥ 
प्रित्र सखा सेवक हितकारी । करे कपट सी पापी मारी ॥ 
मुख सीठा, सन चिप सर, रहे कपटके हेत। 
आप काज पर द्रोहिया, उससे भला जु प्रेत ॥ 


ऐसे वक भक फिर कंस नारदजीसे कद्दने गा; कि सहराज, 
इसने कुछ इसके सनका सेद न पाया, हुंआ लड़का 'ओ कन्याकों 
ला दिखाया जिसे कहा अवूरा गया सोई जाय गोकुल में 
चलदेव भया। इतना कह क्रोषकर खद्ढ उठाय, ओठ चबाय, 
जो चाह्य कि बसुदेवकी भार तो नारू मुनिने हाथ पकड़कर 
कहा--राजा बमुवेचकों तो तू रख आज, ओ जिसमें श्रीकृष्ण 
चलदेद आवबें सो कर काज। ऐसे समकाय घचुकराय जब 
नारद भुनि चले गये, तव कंसने वसुदेव देवकीको एक 
४ सर दिया और आप भयातुर हो केसी नाम राज्सको 


( १४७ ) 


महाबली तू साथी मेरा। वड़ा भरोसा मुमूको तेरा ॥ 
एक बार तू श्रजमे जा राम ऋष्ण हनि मुमे दिखा॥ 
इतना बचन गुनते दी, केसी तो आज्ञा पा विदा हो दण्डचत्‌ 
कर वृन्दाबनकी गया ओ कंसने साल, तुसाल, चानूर, अरिष्ट, 
व्योमासुर आदि जितने मन्त्री थे सबको बुला भेजा। वे आए, 
तिन्‍्ददे समकाकर कहने लगा कि मेरा चैरी पास आय बसा है, 
छुम अपने जीमें सोच विचार करके मेरे सनका सूल जो खटकता 
है निकालो। मंत्री बोले-प्रथ्वीनाथ, आप महाबली हो किससे 
डरते है। रामक्षष्णाका मारना क्‍या बड़ी वात है, कुछ चिन्ता मत 
करो, जिस छलबलसे वे यदो आवें, सोई हम समता बतावें। 


पहले ठो यहाँ मली भांतिसे एक ऐसी सुन्द्र रक्ञमूमि वनबावें 
कि जिसकी शोभा सुनते ही देखनेको नगर-नगर गॉव-गॉवेके लोग 
उठ धाबे । पीछे महादेवका यज्ञ करचाओ, ओ द्ोोमके लिये 
बकरे मैंसे मंगवाओ। यह समाचार सुन सब अ्जधासी सेंट 
लावेंगे, तनके साथ राम कृष्ण भी आवेगे। उन्हे तभी कोई 
मल्न पछाड़ेगा के फोई और ही बली पौर पे मार डालेगा। , 
इतनी बातके सुनते दी-- 


कहे कंस सन लाय, भलोी समता मन्‍्त्री कियो॥ 

, लीने मक्न बुलाय, आदर कर बीरा दुए॥ 
फिर सभा कर अपने बड़े बड़े राक्षसोसे कहने लगा कि जब 
भानजे' राम कृष्ण यहाँ आयें तथ तुममेसे कोई उन्हे मार 
डालियो, जो मेरे जीका खटका जाय। बिन्हे यो सममाय पुनि 
महावतको बुलाके बोला कि तेरे बशमें मतवाला द्वाथी है; तू 
द्वारपर लिग्रे खड़ा रहियो। जब वे दोनों आवे ओ बारे 
पॉव दें, तब तू दथीसे चिरवा डालियो, किसी भाँति भागने न 
पाबै, जो विन दोनोको मारेगा, सो झुद्द मांगा घन पावेगा। 


( १४४५ ) 


ऐसे सबको सुलाय सहुकाय चुकाय कार्तिक बटी चौदसको 
शिवका जज्ञ ठहृराय, कसने सॉक समे अक्ररको बुलाय अति 
आवभगति कर, घर भीतर ले जाय, एक सिंहासनपर अपने , 
पास बैठाय, हाथ पकड़ अति प्यारसे कहा कि तुम यदुकुलमें 
सबसे बड़े ज्ञानी, धस्मात्मा, धीर दो, इसलिये तुम्हे सब 
जानते हैं। ऐसा कोई नहीं जो तुम्दे देखा सुना न द्वोय, इससे' 
जैसे इन्द्रका काज वावनने जा किया जो छलकर वलिका साय 
राज ले लिया और राजा वलिको पाताल पठाया, तैसे तुम 
हमारा काम करो तो एक बेर वृन्दावन जाओ ओर 
दोनो लडकोको जो वने तो छल्षवलकर यहाँ ले आओ | 


कहा है जो बडे है सो आप दुख सहा करते है पराया 
काज, तिसमे तुम्हे तो है हमारी सब वातकी लाज। अधिक 
क्या कहदेगे, जेसे बने वैसे उन्हे ले आओ, तो यहाँ सहज ही में 
भरे जायेंगे। के तो देखते चान्र पछाड़ेगा, के गज कुबलिया 
पकड चीर डलेगा, नहीं तो में ही उठ मारूगा, अपना काज 
अपने हाथ सवारूगा। औ उन ढोनोकों मार पीछे उम्रसेनको 
हनूंगा, क्योंकि वह बड़ा कपटी है, भेरा मरना चाहता है। 
फिर देवकीके पिता देवककों आगसे जलाय पानीमे डुबोऊगा। 
साथ ही उसके वसुेवको मार हरिभक्तोको जइसे खोढद गा, 
तब निष्झंटक राजकर जरासिघु जो भेरा मित्र है अचण्ड, उसके 
न्ाससे कॉपते हू नो खण्ड और नरकासुर, चानासुर आदि 
वडे-चडे महावली राक्षस उसके सेवक हैं. तिससे जा मिलगा* 
जो तुम राम ऋष्णकों ले आओ | 

इतनी बातें कदफर कस फिर 'अक्र रकों सममाने लगा कि 
तुस्त वृन्दावनमे जाय ननन्‍दके यहाँ कहियों कि शिवका यज्ञ है, 
धनुप घय है औ अनेक पअकारके कुतूहल बहाँ होयंगे। यह: 


( १४६ ) 


खुन नन्‍्द उपनन्द गोपों समेत बकरे मैंसे ले मेंट देने लावेंगे 
तिनके साथ देखनेकी कष्ण बलदेव भी आवेगे। यह तो मैंने 
। त॒म्द्दे उनके ल्ाचनेको उपाय वता दिया, आगे तुम सज्ञान हो, 
जो ओर उकत बनि आये सो करि कहियो, अधिक तमसे क्‍या 
कहे । कहा है: 
होय विचित्र चसीठ, जादि बुद्ध वल आपनो | 
पर कारज पर ढीठ, फरहिं:भरोसो ता तनो ॥ 
इतनी बातके सुनते द्वी पहले तो अक्र रने अपने जीमें 
विचारा, कि जो मे इसे कुछ सली बात कहूंगा तो यह न 
भानेगा इससे उत्तम यही कि इस समे इसके मनभाती सुद्दाती 
जात कहँ । ऐसे और भी ठौर कहा है कि वही फट्टिये जो जिसे 
सुद्याय। यो स्ोच-विचार अक्र र हाथ जोड़ सिर झकाय बोला- 
महाराज, तुमने भला भना किया, यह बचन हमने भी सिर 
ढ़ाय मान लिया, होनद्वारपर कुछ वस नहीं चलता। मंलुष्य 
अनेक मनोरथ कर धावता है, पर करमका 
है। आगम बाघ तमने यह बात विचारी है, न जानिये कैसी 
दोय मैंने तुम्दारी घात मान ली, कल भोरको जाऊँगा और 
खल्राम ,कऋष्णकों ले आऊँगा। ऐसे कह कंससे विदा हो 
अक्रर अपने घर आया। ' 
अम्पास 
(१) प्राचीन गयय साहित्यका जन्मदाता कौन है ? 
(२ ] कृष्णकुण्ड और राधाकुण्ड' के विषय ठुम क्‍या जानते हो ! 
(३) नारद और . कप के बीच जो बातचीत हुईं, उसका पणन 
करो १ 
(४ ) इस- पाठके अतगत वलिकी कथाके विषयर्में तुम क्या 
- जानते हो 7 


( १४७ ). 
( ५) शब्दार्थ चताओ--- 
बसीठ, मछ, प्रचण्ड, आगम, मूल, भीच ! 
(६ ) बशुद्धियोंको शुद्ध करो--- 
प्राद्मन, सेठ, विन्हें, पावता है, उक्त । 
( ७) मुद्ाविरोंका अपनी भाषासें अ्रयोग करो--- 
अपना काज अपने द्वाय सवारना, घीरा देना । 
६ ८ ) इस पाढठ़को भाषा क्या आधुनिक हिन्दो-भापासे भिन्त है ? 
केसे 2 ॥' 


, (९) घद्द खड़ी भाषा और बत्तेमान पाठकों भाषामें क्या अन्तर हे? 


३७---रहीमके दोहे 
[ ल्षे---कविबर रददीम ] 


( इतिदास-असिद्ध घेरस खाके पुत्र अन्दुर्रहीम खा खानसानाका 
लनन्‍्म स० १६६१ में हुआ या अकपरी दरवारके नवरत्रोमें इनको भो 
गणना है। रद्दोम एक प्रतिमाशाली कवि और अरबी, फारसी, सस्क्ृत 
सथा हिन्दीके अच्छे विद्वाय थे। इनकी रचनाते शात द्वोता है कि राम 
सौर छृष्णपर इनकी पुरी श्रद्धा थी । यह कवियों और गुणियोंक्रे कहप- 
सूत्र थे। कवि गढ़कों एक ही छन्दके लिये २६ लाख सुपये दे ढाले 
ये। इनका देहावसान स० १६८२ में हुआ | ) 

तरुव॒र फल नहिं खात हैं, सरवर पियद्दि न पान । 
फहि रद्दीम परकाज द्वित, सम्पति संचदि सुजान ॥१॥ 
पान परे रहीम कद्दि, मूलत सब पहिचानि। 

नहीं बित दहानिको, जो न होय हितद्वानि॥ २॥ 


« ( १४८ ) 


कहि रद्दीम सम्पति सगे, वनत बहुत" बहुरीत । 

विपति कसौटी जे' कसे, तेई सांचे भीत ॥ ३ ॥ 

घनि रद्दीम गति मीनकी, जल बिछुरत जिय जाय । 

जियत कंज तजि अंत वसि, कद्दा भौरकों भाय ॥ ४॥ 

असर वेलि विन मूलकी, प्रतिपालत है ताहि॥ 

रहिमन ऐसे प्रभुद्दि तजि, खोजत फिरिये काहि ॥ ४॥ 

जे.रहीम विधि बढ़ किये, को कहि दूपण काढ़ि । 
कूबरों, तऊ नखत ते बाढू॥ ६॥ 

सर सूखे रे सरन समाहिं। 

दीन मीन बिन पच्छ के, कहु रहीम कह जाहि॥ ७ ॥ 

राम न जाते हरिन संग, सीय न रावण साथ । 

जो रहद्दीम भावी कतहूँ, होति आपने हाथ ॥ ८॥ 

खीराको मुंह काटिके, मत्तियत लोन लगाय। 

रहिमन करुये मुखन की, 'चहिये यही सजाय ॥ ६॥ 

आप न काहू काम के; डार पात फल फूल | 

ओऔरनको रोकत फिरे, रहिमन पेड़ ॥ १० ॥ 

यो रहीम सुख द्ोत है, बढ़त देलि निज गोत | 

ज्यों बढ़री अंखिया निरखि, आंखिनको सुख होत ॥ ११ ॥ 

' कौन बढ़ाई जलधि मिक्ति; गंग नाम भो घीम। 

केहि की प्रभुता नदिं घटी, पर घर गये रहीस ॥ १३ ॥ 

जो पुरुपारथ ते कहुं, सम्पत्ति मिलति रहीम 

पेट ल्ागि बेराट घर, तपत्त रसोई भीम ॥ १३ ॥ 

अनुतित उचित रहीम लघु, कराहे वड़नके जोर | 

ज्यों शशि के संयोग ते, पचवत आगि चकोर ॥ १४ ॥ 

रहिमन नीचन संग बसि, लगत कलंक न काहि। 

दूध कलारिन हवाथ लखि, मद समुभदि सब ताहि॥ १४५ ॥ 


( १४६ ) 


मुकता करे कपूर करि, चातक जीवन जोय। 

ये तो बड़ो रहीम जल, व्याल बदन विप द्वोय ॥१ का 
दोय थ जाकी छोंद ढिग, फल रहीम अति दूर | 
वाढ़ेहु सो विन काज ही, जेसे तार खजर ॥५णा 
रहिमन पानी राखिये, विन पानी सव सूत्र । 

पानी गये न ऊबरे, मोती मालुस चन ॥१८ा 
वढ़त रह्दीम घनाड्य घन, धने घनी को जांइ । 

घटें बढ़ी तिनको कद्दा, भीख मांगि जो जाइ ॥१६॥ 
रहिमन विपदा तू भली, जो थोरे दिन दोय | 

हिंत अनहित या जगतमें, जानि परत सब कोय ॥२०।। 
साधु सराहे साघुता, जती जोखित जान। 
रहिमन साँचे सूर को, वैरी करे बखान ॥२श॥। 


अभ्यास 
(१) अ्रेतिपालत, परकाअ, विछुरत, सरन, अनरोतें, रीतें आदि शाब्दोंका 
अये वत्तताओं । 
(२) 'यो रदोम --छुख द्वात, में पद्यका सावा् लिखों । 
(३) आप न काहू कामके ...पेड़ बयूछ। इस पदका अन्वय करो। 
(४ ) अन्वय करो :-- 
जाय समानी**« गये रहीम । 
(५) झुख्य अयंको बताओ ४ 
चन्द्र दूबरो , ,..नखत ते धाड़ि। 


७०००० हैं €([) जम्याम्यी 


( १४० ) 


१८--चित्तौड़-चर्चा 
[ संकलित ] 

भारतवर्पके इतिद्वासमें राजपूतानेका जो उच्च स्थान है, उससे 
संसार-मात्रके इतिहास-प्रेमी परिचित हैं और इस देशका तो 
बच्चा-बधातक उसे जानता है। हिन्दू-जातिके पतन-कालमें राजपूतोंने 
उसकी गोरबकी रक्षाके लिये जो असीम वीरता और त्याग दिखाया, 
उससे भारत॒वासी कभी विसम्ृत न हो सकेंगे। राजपूतानेका यह 
गौरव प्रधानतः भेवाड़ने रखा है, जिसकी राजधानी लगातार ८०० 
वर्षतक चित्तौड़गढ़ रहा है। 

चित्तोड़गढ़ अरावली पबेतके एक शिखरपर बना हुआ है और 
,कदाचित्‌ भारतवर्षका सबसे बढ़ा किला है। इसकी लंबाई लगभग 
पॉच मील और चोड़ाई दो मील है। राजपूतानेके अन्य राज्योके 
समान मैवाड़की भूमि-सरुभूमि नहीं है। राजपृतानेमें तो भेवाड़ 
ही दृरा-भरा के शक" माना जाता है। आरावलीकी श्रेणियोंके 
कारण चित्तोडगढ़के चारो ओर तो आ्रकृतिक दृश्य और भी सुन्दर 
दो गया है। पर्वेत-पुन्जोके कारण जलकी अधिकता, जलके 
कारण जलाशयोकी अधिकता और जलाशयोके कारण बृक्षावली 
तथा ऋृषिकी अधिकतासे चारो ओर दरीतिमाका द्वी राज्य दिखलाई 
पड़ता है। वर्षा-ऋतुमे तो फिर कहना ही क्‍या है। 

घी० बी० एण्ड सी० आई० रेलवे ओर उदयपुर चित्तौड़गढ़ 
'रेज्वेके चित्तोड़गद नामक जंकशनसे किल्नेतक पक्की सड़क गई 
है। सटेशनके निकट ही यात्रियोके ठहरनेके लिये राज्यकी ओरसे 
एक घमेशाल्ला वन॒वा दी गई है ओर एक छोटीसी बसती भी बस 
गई है। एक सटेशन पहलेसे द्वी किला दिखाई देने लगता है 
ओर जबवृक गाड़ी चित्तौढ़गढ़के आगेके सूटेशनपर नहीं पहुँच 
जाती, तवतक बरावर दिखाई देता रहता है। ह 


(१४५१ ) 


सटेशनसे चित्तौडगढ़ लगभग तीन मील पड़ता है। किलेको- 
जामेंके लिये दो घोड़ोंका तांगा तथा वैल्गाड़ी मिलती है। किलेतक- 
पहुँचनेमे घोड़े-तांगेको एक ओर बैलगाड़ीको दो, घण्टे लगते है। 
जाने-आलनेका किराया तॉगेंका ४। ओर बैलगाड़ीका २ राजड्ारा 
नियुक्त कर दिया गया है। 


समर्भूमिपर _लगभग मीज्भर चल चुकनेके पत्थात्‌ एक 
छोट़ीसी नदी मिलती दै। नदीके पार द्वोते ही चढ़ाई आरम्भ 
होती है। एक मीलके- लगभग चढ़नेपर किलेकी चद्दारदीवारी 
आरम्म द्योती है। आचीर चधृदु ओर सुन्दर है। उसके ,ऊपर 
अंगूरेबन्दी है. ओर सथान-सथानपर सुन्दर बुर्ज बने हुए हैं। 
प्राचीरकी मरस्मतपर यूरो ध्यान दिया जाता है ओर अबतक 
वह अच्छी अवसथामें है। गढमे प्रवेश करनेके लिये सचसे पहले 
४शमपोल? नामक फाटक मिलता है। यहद्दों फाटककों 'पोल? 
कहते हैं। 'रामपोलसे? दी सड़क घुसावढार हो गई है। गढ़के- 
ऊपर सप्त-मूमिपर पहुँचनेके लिये तीन घेरे और “लक्ष्मण-पोल,? 
पणेश-पोल,” 'दइसुमान-पोत्न, “नई-पोल” ओर “पांडर-पोल? नामक- 
छः फाटक औरः- पार करने पड़ते हैं । 


एक पोलसे दूसरे पोलकी ओर जाते हुए मार्गमे अनेक- 
छोटे-छोटे मन्द्रि ओर समाधियों मिलती हैं। अधिकाश समा-- 
थियॉ उन वीरोकी हैं, जिन्होंने चित्तोड़गढ़की रक्षामे विशेष' 
आत्मत्याग किया था। जिस सथानपर जो चीर मार गया है 
या जद्दॉपर जो धराशायी हुआ है, उसकी समाधि उसी स॒थानपर 
बना दी गई है। इन्हीं समाधियोमे जयमलकी भी समाधि 
है। अझकवरकी गोल्तीका निशाना होकर लिस सुथानपर इस 
चीरका शरीर गिए था, उसी सुथानपर यह समाधि बनी हुई 
है। इसपर दृष्टि पड़ते ही शरीसमे रोमान्व दो उठता है ओर.. 


( १४२९२ ) 


जयमलके युद्ध "और उसकी वीरगतिका समसर्त दृश्य, विना 
देखे हुए भी, नेत्रोंके सम्मुख चित्रित सा द्वो जाता है। इन 
समाधियोमें कोई कल्ला-कोशल नहीं, तथापि देरतक देखते 
रहनेपर भी उप्ति नहीं होती है। 
कोटमे अवेश करते ही चित्तौड़गढ़की कचहरी मिलती है, जहाँ 
किलेको देखनेके लिए राज्यका आज्ञा-पत्र मिलता है, किला 
दिखानेके लिए प्रदेशेक भी मिल सकता है। प्रदशेकके कार्य- 
करनेवाले लोगोको राजद्वारावेतन आदि नहीं मिलता और न ये 
लोग दूसरा कोई व्यापार ह्वी करते है। दशेकोंको किला दिखाने 
ने जो कुछ उन्हे प्राप्त दोता है, उसीसे उनका निर्वाह हो जाता है। 
किलेके भीतर भी बसूती है। इस समय इसकी जनसंख्या 
सात सहस्तके लगभग है। एछिन्दू और मुसलमान दोनो यहाँ 
पाये जाते हैं। हिन्दुओमे चारों वर्णके लोग मिलेंगे। किल्लेके 
इन निवासियोकी जीविका ऋषि है । इनमें अधिकाश गरीवीकी 
* द्वालतमें दिखाई पड़ते हैं। 
गढ़-निवासियोंके छोटे छोटे मकानोको छोड़कर राज्यकी 
कचहरी, तोपलाना आदि ढो-चार बड़ी-बड़ी इमारतें भी हैं जो 
नई बनी हुई जान पड़ती हँ। इनके अतिरिक्त एक बहुत बड़ा 
राजमदल और वन रहा है। अचतक इसका कार्य पूरा नहीं हुआ। 
किलेकी पुरानी इमारतोंमे कालीजी और मीराबाईके मन्दिर, 
वविजयसतम्भ और पद्मिनीके महलको छोड़कर शेष इमारते आयः 
नष्टअष्ट हो गई है। उपयुक्त दोनो सन्दिये और विजयसूतम्भकी 
शिल्पकला देखने योग्य है। कालीजीके मन्दिरकों देखकर उस 
, समयका सूमरण दो आता दे जब राजपूत बीर युद्धके पूर्व मन्दिरमे 
एकत्रित हो विजयका वर मांग उत्साहसे रख-वाय वजाते हुए 
समरमूमिमें जाते थे ओर बिजयके उपरान्त घूमघामसे जीव-बलि 
सहित कालीजीछी पूजा करते थे। 


/ शएृ्ट३ ) 


मन्दिस्मे कालीकी आचीन श्यामधूर्तिके साथ द्वी-साथ 
और दो नवीन मूर्तियों अतिप्ठित हैं। मीराबाईके सन्दिर्की सर- 
स्मतपर पूरा ध्यान रखा गया है। इस मन्दिरमे राधाऋृष्णकी 
युगल मूर्तियां सथापित है। इन्हे देख सीरावाईकी प्रगाढ भक्ति- 
का समरण दो आता है ओर भक्त यात्रीसे मीरावाईका यह 
भजन शुन-शुनाये बिना नहीं रहा जाता--“मेरे तो गिरिधर 
गोपाल इसरो न कोई ।? 


विजयसूृतम्भ महाराणा कुम्मका वनवाया हुआ हे, जो सन्‌ 
१४१६ ईं० में भेवाड फे सिहासनपर बैठे थे। खिलजी-बंशके 
अन्तिम दिनोसे दिल्लीश्वरके कमज़ोर हो जानेपर अन्य सूबोके 
साथ मालवा ओर गुजरात भी खतन्त्र दो गए थे। मैवाइकों 
समृद्द देख, इन दोनो सूवेदारोने मिलकर सन्‌ १४४० ई० में 
उसपर आक्रमण किया; किन्तु राणा कुम्भ छारा ये बुरी तरह 
परासत हुए। मालवाके नवाव मुद्स्मद खिलजीको तो मद्दा- 
राजकी सेनाने कद भी कर लिया, किंतु उदास्ताके कारण उन्होंने 
उसे विना कोई दण्ड दिये ही छोड़ दिया। इस विजयके दस 
चपे पत्चात्‌ उसके समारक रूप मदाराणाने यह विजय सतस्भ 
चनवाया। यह विशाल सूतम्भ नो खण्डोका है। चढ़नेके 
लिये सीढ़ियाँ वनी हुई' हैं । ऊपरसे पूरे किल्ले और उसके 'चारों 
ओरका कई मीलका दृश्य टिखलाई पडता है। इसके अंतर 
ओर वहिरंग दोनो भाग मूर्तियोसे भरे पढ़े है। इसके वननेमें 
इस वर्ण लगे थे। उपयुक्त युद्ध समसत बत्तान्त सतम्भपर 
खुट् हुआ है। मेवाड़कों केवल इस चिजयका दी समारक नहीं, 
दिंदू-जातिके अतिस गोरबका सम्रारक कहना द्वी उचित द्वोगा । 


पद्मिनीका महल एक जलाशयके तटपर होनेके कारण अवश्य- 
दी सुन्दर जान पड़ता है, किन्तु उसमे और कोई विशेषता नहीं 
११ 


( १४७ ) 


है। बनावटसे यह बहुत प्राचीन भी नहीं जान पड़ता। 
आजकल जब कभी महाराणा या राजकुमार चित्तोड़गढ आते 
हैं तब इसी मददलमें ठदरते ह.। इसी कारण इसकी मरम्मतपर 
विशेष ध्यान दिया जाता है। 


इन इसारतोके सिवा, प्राचीन इमारतॉमें जैनसूतम्भ, महा- 
णाणा कुम्मका महल, शबज्लास्वोरी तथा और भी कुछ हटी-फूटी 
इमारतें हैं। जैनसतम्भ जीशँ-शीर्ण अपसथामे है। मद्दागणा 
कुम्सके महलका अधिकांश साग टूट गया है। इसकी सरमस्मतत 
आरम्भ की गयी थी, किन्तु इसका सुधरना सम्भव न जान यह 
विचार त्याग दिया गया। इस महत्लकों देखकर जान पड़ता है 
कि उस समय भेवाड़की शिल्प कन्ला चरम सीमाकों पहुँच चुकी 
थी। जहदां कहीं मरम्मत की गयी है, उस सथानके काम और 
पुराने काममें सृपष्ट अन्तर दृष्टिगोचर होता है ओर सालुम होता 
है, कि प्राचीन शिल्प कला वत्तेमानकी अपेक्षा कितनी बढ़ी हुई 
थी। इसी महतलमें 'जोहरः का स॒थान है, जहाँ मुसलमानोके 
सपशकी अपेक्षा स॒त्युको श्रेष्ठ माना जाता था ओर अनेक बार वीर 
राजपूत ललनाओने अभिमें प्रवेश किया था। संसारके इतिद्दास- 
में आत्म प्रतिष्ठाके लिए इस. अकार अलोकिल बलिदान भारतको 
छोड़कर और कहीं नहीं पाया जाता । ऐसा कौन भारतीय होगा 
जिसका हृदय इस सथानके दशेनसे भर न आता हो ९ शगार- 
चौरी बिवाह-सथल है। यह भी जीखें-शीणें है। फिर भी 
इसकी शिह्पकारी दर्शनीय है । 


किलेमें चौरासी जलाशय हैं, जिनमे गोमुख, हाथीकुण्ड, 
फतहकुए्ड, सूरजकुण्ड, आदि पसिद्ध हैं। गोमुखका दृश्य दशे- 
नीय है। एक पहाड़ी मरनेका जल गोमुख हारा गिरकर एक 
सथानपर एकत्र हो जानेसे एक बड़ा कुण्ड बन गया है। घाट पक्का 


( श्थू४ ) 
बना हुआ है। जहॉँसे पानी गिरता है, चहां कहे शिव-लिह्ठः 
बने हुए हैं। चारो ओर पहद्दाड़ियोके आ जानेसे यह सूथान 
अत्यन्त रमणीय हो गया है। 
अभ्यास 

( १ ) चित्तौदगढ़, भद्दाराणा प्रताप और प्मिनीके विषयम क्या जानते द्वो? 
(२) जौदर किसे कहते हैं ? उसमे क्या होता था? 
( ३ ) शिखर, कठाचित, पोल, समाधि, दर्शक, प्रतिष्टित, सूचा, उपयुक्त 

और अलेकिकका अर्थ तथा शब्दमेद बतलाओ | 
(४ ) चित्तौंढ़गढ़की इमारतेंको देसफर यान्रीके हृदयमें क्या भाव आते 

हूँ? 


(५ ) विजयस्तम्मफरे विषयमे क्या जानते द्वो ? यद्ध किसकी विजयका परि- 
सूचक दे 

(६ ) चित्तौदगढ भारतीय गौरवका ज्वढन्त उदादरण है, इस पाठ द्वारा 
प्रकाशित करो । 

( ७ ) सन्धि-विच्छेद करोः-- 
जलाशय, रोमाथ, इस्तावली । 


३६---भूषण कविके पद्म 
[ ले*--मद्दाकवि सूपण ] 

[ जन्म स० १६७० के लूगभंग और मरण स० १७७२। जप 
शिवाजीके द्रबारी कवि थे । आपकी कवितामें थीर-रस प्रधान है, जिन्हें 
पढ़नेसे मुर्दा दिलोंमिं भी जान आ जाती है'। सलेष और यम इनकी कविताके 
अधान गुण हैं। सम्रय-समयपर दिवाजीको उत्सादित करनेमें इनकी 
कविताओंने बढ़ा काम किया है। आपको गणना हिन्दीके नवरत्ोंमें हे। 


( १४६ ) 


आप जातीय कवि थे, आपने हिन्दू जातिकी रक्षाके निमित्त सतत चेशा 
कीहै।] 
इन्द्र सिंज हेस्त फिरत गजेन्द्र अरू, 
इन्द्रको अनुज हेरे दुग्ध नदीस को। 
मूपन भनत सुर सरिताकों इंस हेरे, 
विधि हेरे हंसको चकोर रजनीस को॥ 
साहि तने सिवराज है 
दहोत है अचम्भो देव कोटियो वैंतीसको 
पावत न हेरे तेरे जस में हिराने सब, 
गिरिको गिरीस हेरें गिरिज्ा गिरीसकों॥ 


[२] 
वाने फहराने घददराने घण्टा गजनके, 
नाहीं ठहराने राव-राने देस-देसके। 
नग महरालने ग्राम नगर पराने झुनि, 
बाजत निसाने सिबगज ज नरेश के॥ 
हाथिनके होदा लो कसाने कुम्स 
ग्ञीनकी भजाने अलि छटे लटि केस के। 
दलके दरारे हूं ते कमठ करारे फूंटे, 
केरा केसे पात विदराने फत सेस के॥ 
# [३ )] 
प्रेरित पिसाचिनी, निसाचर मिसाचरीन, 
मिल-मिल आपुसभे गावत बधाई हें। 
मैरो भूत प्रेत भूरि का कक दा है 
जुत्थ जुत्थ जोगिनी जमात जुरि आई है ॥ 
किलकिके करति 


कुतूहूल काली, 
डिमि डिसमि डमरू दिगम्बर वज्ाई है। 


( १४७ ) 


सिवा पूछे सिव सो, समाज आज कहों चली, 
काहू पै सिवा नरेन्द्र भ्कुटी चढ़ाई है॥ 


[४9३] 

ऊँचे घोर मन्दरके अन्दर रहनवारी, 

ऊँचे घोर मन्दरके अन्दर रहाती हैं। 
कन्द सूल भोग करें, कन्द मूल भोग करें, 

तीन बेर खाती थीं तो तीन बेर खाती हैं ॥ 
मूखन शिथिल अंग भूखन शिथिल अंग, 

विजन डुलातीं तेई विजन डूलाती हैं। 
मूपण सनत शिवराज वीर तेरे त्रास, 

नगन जड़ातीं ते वे नगन जड़ाती हैं॥ 


[ ४] 

दुग्ग पर दुग्ग जीते सरजा सिवाजी गाजी, 
उग्ग नाचे उरग पर रुण्ड-मुख्ड फरके। 

मूपन्न मनत वाजे जीतिके नगारे भारे, 
सारे करनाटी मूप सिंहलको सरके॥ 

सारे सुनि सुभट पनारेबारे उदभद, 
तारे लगे फिरन सितारे गद घरके। 

वीजापुर वीरनके गोलकुण्डा घीरन के, 
दिल्ली उर मीरनके दाड़िमसे दरके।॥ 


अभ्यात्त 
( १) पहले छन्‍्दका भावार्थ बताओ १ 
(३) “काह पे सिवा नरेन्द्र झुकुटी चढाई है” यह सुनकर भूत, अत, पिशाच' 
भादि क्यो असन्न द्वोते है ? 
(३) चींये छन्दका स्लेपाठकार समकाओ। इस छन्‍्दकी विशेषता 
बतलाओ 


( १४८ ) 


(४ ) भूषण कविकी फविताओंके विषयमें तुम क्या जानते हो १ 
(५ ) शब्दार्थ बताओः--- 
दुगध-नदीस, रजनीस, निसाने, जमात, मन्दर । 
(६ ) धछद्॒का शुद्ध रूप पताओः--- 
गिरीस, सेस, सिंवाजी, निसाचर, जुत्य, जस । 
(७ ) झन्वय करो--- 


२०---प्रताप प्रतिज्ञा 
( लै०--श्री सुदशैन ) 

( आप स्पालक्रोटक्के रहनेवाले हैं। आप कहानियो और नाटक सिद्ध- 
इस्र लेखक हैं। आपकी फट्दानिया सरल, स्वाभाविक और मनोरजक होती 
हैं। उनमें स्त्री और वाहक मनोवृत्तिका अच्छा अध्ययन मिलता है। 
नोचेका नाव्यांश आपकी ही लेखनीका चमत्कार है। १ 

खसथार--कोमलमेरका गढ़ 

समय-प्रभात 
[ दखार लगा हुआ है। पवित्र अमि जल रही है, और पुरोहित 
हवन कर रहा है। दृवन-कुण्डके समीप आसनपर जगमलतिंद 

वेठा है। हृवनकी समाप्तिपर सव दरवारी रहे हो जाते हैं ।] 
पुरेद्दित--जगमलसिदह, पविन्न अभिक्नी ओर देखो । 
जगमलसिंह--देख रहा हूँ, महा राज । 
पुरोहित--अपनी तलधारको हाथ लगाओ | 
जगमलसिंद---, तल्वारको छूता है । ) 
पुरोदिित--कहो, में सच्चे राजपूतोकी चीर-सभामें अतिज्ञा 

करता हूं । 


( १४५६ ) 
जगमलसिंद--मैं सच्चे | राजपूतोकी पीर-समामें प्रतिज्ञा 
करता हू'। 

पुरोद्दधित--कि जबतक मेवाड़-देशपर शासन करंगा । 

जगमलर्सिह--कि जवतक सेवाड़-देशपर शासन करुगा | 

पुरोहित--त्राह्मण, गऊ-भांता और शरणागतकी रक्षा करूगा। 

जगमलसिंह---त्राह्मण, गो-माता और शरणागतकी रक्षा करूंगा | 

पुरोहित--देश-हितका सदा ध्यान रखूंगा | 

जगमलसिंह--देश-द्वितका सदा ध्यान रखूगा। 

पुरोददित--मेधाड़के दुश्मनोंके सामने सिर न भुकाऊंगा। 

जगमलसिंह--मेबाइके दुश्मनोके सामने सिर न भ्ुकाऊंगा। 

पुरोद्चित--भूवैजोका गौरव जिन्दा रखूगा | 

जगमलसिह--धूवेजोका गोरव जिन्दा रख गा | 

29% ना न हम प 

ज फूठ न चोलूगा | 

पुरोद्दित---अन्याय न कहंगा | 

जगमलसिह---अन्याय न 

पुरोह्चित--अपने सुख ओर लाभके लिये देशकों द्वानि न पहेँ- 
चाऊंगा | 

जगमलसिंह--अपने सुख ओर लाभके लिये देशको द्वानिन 
पहुँचाऊगा । 

पुरोहित--अगर अपने इन वचनोकों पूरा न करो, तो पतस्मात्मा 
करे, हद तलवार तुम्दारे ही शरगरक्ी बोटी-बोटी 
डड्डा दे, इस आप्मिडी ज्याला तुम्हे जलाकर भसृम्र कर 
दे, और इस दरसवारमेसे कोई सूरभा तुम्दारी 
सहायताको आगे न वदें । भील सर्ार आ गया। 


( १६० ) 


भील--मै उपसि थत हूं । 
पुरोहित--आइये । इनको तिलक कीजिये | 
( भील-सरदार आगे घढता है। दरखारी वाजा-बजना आरम्भ 
हो जाता है। एकाएक राजमाता और ग्रतापका प्रवेश ) 
राजमाता--ठदर जाओ। भील-सरदार, शेरकी चीज गीग्डको 
मूल मत करो | 
पुरोद्चित--राजमाता |,.«.«- 
राजमाता-महाराज | मै आपका अभिप्राय पूर्ण रूपसे सम- 
भती हूं। आप यही कहेंगे कि महाराना यह निश्चय 
कर गये हैं कि उनके बाद जगमलसिंद्द राज-सिद्दासन 
पर वैठाया जाय । 
पुरोदित--होँ ! और ये सव इस वातके साक्षी हैं । 
राजमाता--परन्तु यह अनुचित है। 
पुरोद्चित--( आइवये से ) अनुचित । 
राजमाता--जगमलसिहके निवेल कन्धे इस उत्तर दायिल्रका 
भार नहीं उठा सकते। अगर इस समय भेवाडको थीर 
राजा न मिला तो इसके वचनेकी कोई आशा नहीं। 
पुरोद्िित--मगर यह मद्ायनीकी आज्ञा थी, उनकी अंतिम 


इच्छा थी। 

राजमाता-देशके सामने महारानी भी कोई चीज नहीं। 

पुरोद्दित--राजमाता ! 

राजमाता--महाराज | आप क्या कप है ९ जय सोचिये। 
सेवाड़ क्या था, ओर आज किस अधोगतिको प्राप्त हो 
चुका है । इसके हरे-भरे खेत उजड़ गये हैं, इसके 
सुन्दर भवन टूटे हुए खंडदर वन गये हैं. और इसका 
प्राचीन गौरव मूल्ले-बिसरे हुए समयकी कहानी बच 


( १६१ ) 

चुका है । मुगल-वादशाहू इसकी तरफ लोभकी आँखोसे 
टकटकी लगाये देख रहा दै। नहीं, नहीं, यह लड़का 
कुछ नहीं कर सकेगा । देशकों इस समय किसी बहादुर 
चेटेकी आवश्यकता है । 

जगमलसिह---ओर वह वहादुर घेटा कौन है ९ 

यशाजमाता--उसे सेवाड़का वच्चा-वच्चा जानता है । 

जगमलसिह--मगर उसका नाम १ 

राजमाता--: धीरेसे ) प्रताप । 

प्रताप--नहीं, मै इस योग्य नहीं हूँ । 

जगमलसिंद--वह कद्दता है, मे इस योग्य नहीं हूँ । 

राजमाता--मगर सारे भेवाइसे यही है, जो भेवाड़को बचा 

सकता है । 

जगमलर्सिह--क््योकि आपका बेटा है। 

राजमाता--नदीं, क्योंकि वह सूरमा है। जरा मेरी दशाका ख्याल 
कर, में इस समय मौतके किनारेसे वोल रही 
मुक्े इस बातकी कोई परवाह नहीं कि मेरे 
लड़का राजसिंद्यासनपर बेठता या दूसरा आदमसी। 
भगर एक वातकी मुझे चिन्ता है ओर मरनेके वाद 
रहेगी, कि इस राजसिंद्यासनपर कोई ऐसा आदमी न 
बैठ जाय, जिसकी भुजाओमें शक्ति, हृदयमें साहस, 
सिरमे बुद्धि, और लहूकी एक-एक बूदमे देशभक्तिको 
पागल वना देनेवाली घुन न हो। अगर ये अनमोल 
गुण अतापमे न होते तो चाहे देशका एक एक बच्चा 
उसे तख्न और ताजका अधिकारी ख्ीकार कर लैता, 
परन्तु में उस मौतका समरण करके जो से प्रतीक्षा 
कर रही है और टन चरणोकी सोगन्द खाकर जिनके: 


कै 


( १६२ ) 


साथ में अभी सती हो जानेवाली हूं, सच कहती हूं कि 
सबसे पहले में आगे बढ़ती ओर उसे यह कहकर 
तख्तसे उत्तार देती कि सावधान, इस सिंहासनपर पॉव 
न धरना, नहीं तो मॉका शाप तुमे नष्ट कर देगा। 
जगमलसिंह--डँह ! ये सब कहनेकी बातें हैं.। 
राजमाता--कर्मीने लड़के । तुके अपनी भॉका अपमान करूे 
लब्या नहीं आती ९ प्रताप, तू सुन रहा है, जगमल भेण अपमान 
कर रहा है । 
एक सरदार--राजमाताका अपमान असह्य है। जगमलसिंद 
माफी मसोँगो । 
जगमलसिद--जगमलकी जवान भाफी मांगना नहीं जानती। 
दूसरा सरदार--तो इसका परिशाम अच्छा न होगा। 
हम कलकी महारानी ओर आजकी राजमाताकी शानमें कहा गया 
एक भी कटु-वचन नहीं सुन सकते | 
जगमलसिंह--मगर में महारना हूं । 

' तीसण सरदार---तुस महाराना नहीं हो । जिसकी जीम अपने 
चशमे नहीं, जो मान और अपमानकी नीति रीति नहीं जानता, 
बह ४ नोकाकों मेँवरसे क्‍या बचा सकेगा? यह केबल 
अम है। 

शराजमाता--प्रताप, आगे वढ़कर उसे आसनसे उठा दो, 
असभ्यका स॒थान दरबारके अन्द्र नहीं, दरवारके बाहर है। 

प्रताप--ञाता, मुझे चिवश न करो। में राज्य नहों चाहता। 

राजमाता--मगर राज्य तुमे चाहता है| 

प्रताप-- छुछ सोचकर ) द्रवारकी क्या आज्ञा है ? महाराना 
अताप हो या भाई जगमल ९ 

दरबारी-* चिह्लाकर ) प्रताप । प्रताप !! 


( शृदिं३ ) 


एक दो आवाजे--जगमलसिंह । 

जगमलसिंह--दरबार मुझे चाहता है। 

प्रताप--मैं राना नहीं होऊंगा । 

राजमाता--नहीं द्वोगे। 

प्रताप--नहीं, यहकठिन है । 

राजमाता--मगर क्यो ९ 

अताप--लड़ाई छिड़ जायगी। 

राजमाता--तो तू कायर है। मुमे खप्नमे भी आशा न थो 
कि तू तलवारकी चसक देखकर भयसे जा छिपेगा। 

प्रताप--नहीं माता में कायर नहीं हूं मै मौतसे नहीं डरता मगर 
जरा सोचो, इस समय मेवाइके पास वीर-पुत्रोका कितना अभाव 
है, में घरकी लड़ाईमे उन्हे और भी कम नहीं करना चाहता। 
जगमलसिद राना वन जाय, में सिपाहीकी तरह उसके कदनेपर 
अपनी जानतक ठेशपर निछाचर कर दू गा । 

जगमलसिंह--बह खुद पीछे हटता है । 

दरवारी--मंगर हप्त हटने नहीं देंगे। 

प्रताप--माता | मुझे मजबूर न करो, में राज्य नहीं चाहता | 

राजमाता--नहीं चाहते ९ अगर इस अभागे प्रातकी मूमि सोना 
'उगलती, अगर इसके खेत लहलहद्दा रहे होते, अगर इसके शहर 
आवाद होंते, बाजार रोनकद्ार होता ओर महल आननन्‍्व- 
विलासके अकाशसे जगमगाते होते, अगर इसपर दुश्मनोके 
आक्रमणका भय न दोता, अगर इसके आकाशपर विनाशके 
बादल न घिरे होते, तो तुम्हारे मुंहसे ये शब्द कभी न 
लिकलते। मगर आज यह अमागा है; तुम भी इसकी सेवासे 
जी चुराते दो, तुम आनेवाली विपत्तियोका द्वाल जानते हो। 
६ छम्वी सास लेकर ) बहुत खूब ! जाओ; भेव्राइ़की रक्षा न करो । 


( १६४ ) 


वह अपनी (क्षा आप कर लेगा। सगर याद रखो, सती तुम्हें 
शाप देती है, और यह शाप हर समय ओर हर सथानमे तुम्हारे 
साथ रहेगा । पवेतोमे, शहरों ओर वयावानोंमे- - “* 

अताप--आ सगवन्‌ ! 

5:03 आगे बढ़ ! सेवादे तुके पुकार रहा है। 


प्रताप--खूब सममता हूं, कि सती माका शाप मेरे इहलोक 
ओर परलोक दोनोकी विगाड़ देगा। में इस खयालसे कि भेरी 
वीर माता मरते समय मुझसे अप्रसन्न थीं, सारी आयुके लिये 
जीवनके आलनन्द्से वंचित द्वो जाऊंगा। इस जन्ममे कुत्तेकी 

मरूगा और उस जन्मसे बुरी योनिसे उत्पन्न होऊंगा। 

मुझे सब खीकार है, परन्तु आज देशको बीर पुत्नोकी आवश्यकता 
है, मै राज्य-प्राप्तिके लिये लहकी एक मी बूद बहानेको तैयार नहीं 

सकता । 

जगमलसिह--कैसी सच्ची मा और कितना निःखार्थी वेट । 
कक दोनोको अणाम करता हूं। मेवाड़की तुमपर सदा श्रद्धा 
रहेगी । 

राजमाता--यदद तुम कहते दो ९ 

जगसलसिह--हां भाता, यह में कहता हूं। आओ, प्रताप 
(आसनसे उतरकर) इस आसनपर तुम बैठो। में इसके योग्य नहीं हूँ । 

राजसाता--जगमल | जगमल |! 

जगमल-आओ भाई प्रताप, मै अपनी खुशीसे यह राजसिंदासन 
तुम्दारे सुपुर्दे करता हूं । 

अताप--भाई*** 

जगमल--नहीं, में नहीं सानूंगा। यह उत्तरदायित्व तुम्दे 
खीकार करना होगा । 


5 


( १६५४ ) 


राजमाता--बेटा, तू धन्य है । 

प्रताप--जिस राज्यके लिये खूनकी नदियां वह जाती हैं 
आई-भाईमें तत्ञवार 'चल जाती है, सारी उम्रक्के लिये बैर हो 
जाता है, जिस राज्यको प्राप्त करनेके लिये लोग घोर पाप फरने- 
को तैयार हो जाते हैं, उसी राज्यको तुमने मुद्ठीमे पाकर इस 
तरह छोड़ दिया, जेसे मिद्टीका तुच्छ ढेला हो । आज तुम कितने 
अहान, केसे त्यागवीर मालूस होते दो 

राजमाता--मास्तकी भावी सन्‍्तान तुम दोनोपर गे करेगी। 

( प्रताप आसनपर बैठता है ) 

पुरोहित--प्रतापसिंह ! इस पवित्र अमिकी ओर देखो । 

प्रताप--देख रहा हूं, महाराज ! 

पुरोहित---अपनी तलवारकों हाथ लगाओ 

( अ्रताप तलवारकों छूता है , 

पुरोहित--कहो, कि से सच्चे राजपृतोकी बीर सभासे 
पतिन्ना करता हूँ 

प्रताप--मै सच्चे राजउतोकी वीर-सभामें प्रतिज्ञा करता हूं। 

राजमाता--( चात फाटकर ) जबतक मेवांड भूमि खाधीन 
नदीं हो जाती, जबतक इसका प्राचीन वेभव वापस नहीं आ 
जाता, जवतक इसके 'असहाय पुत्र अपना कर्तव्य और भन्तव्य 

समम लेते, जबतक इसकी अबला पुत्रियोंको 

निर्मयतासे देशमें एक कोनेसे ल्लैऊर दसरे कोनेतक चले जानेका 
साहस नहीं होता, तवतक महलमे आराम नहीं करोगे, थालमें 
खाना नहीं खाओंगे, चारपाईपर पॉव नहीं धरोंगे। कहो, यह 
अतिज्ञा करते हो ९ 

प्रताप--यह मसॉकी अ्रतिज्ञा है; वेटा इसे जी-जानसे पूरी 

गा। 


( १६६ ) 


राजमांता--मगर यह प्रतिज्ञा वड़ी भयानक है। 
प्रताप--मॉँका आशीवोांद इसे आसान वना देगा। 
राजमाता--प्रलोभन तुम्हारे मारगगेमे जाल विछावेंगे। 
प्रताप--अपने पुत्रकों ऐसा तुच्छ न सममरिये। वह सीष्म- 
पितामहकी अतिज्ञाकों ताजा कर दिखावेगा । 
राजमाता--मेरा आशीर्वाद आजीवन तेरे साथ रहेगा। 
( जानेको उद्यत होती है ) 
प्रताप--माँ. - ««« 
राजमाता--चस बेटे । अब मुझे न रोको तुम्हारे पिताजी 
अकेले घवरा रहे होगे। में अभी सती दोऊगी । राज 
पुरोहित, आप अपना काम कीजिये । 
( बेगसे प्रत्थान ) 
प्रताप-- चिह्काकर ) चली गई। सा. . माँ. 

' पुरोद्दित--संसारका यही नियम है । न कोई यहां रहा है 
न रहेगा । आदसी आता है, अपना खेल, खेल कर 
चला जाता है। घन्य वही है जो अपनी जननी 
जन्म मूमिके लिए कुछ काम कर जाता है। आपकी 
माने अपनी लीला समाप्त कर दी, अब आप अपने 
कामकी ओर घ्यान दें | 

( परदा धदलता है। राजमाता पतिकी छाशके साथ जलती 
दिखाई देती हैं । प्रताप दौड़ा हुआ आता है । ) 
प्रताप--माँ. . .. - | कोई उत्तर नहीं मिलता। मां भागकी 
ज्वालामं छिप जाती है] बस चली गईद। भगवन्‌ ! 
ख्रेहकी ये दोनों नदियां सूख गईं। इनका सथान 
कभी पूर्ण न होगा । 
मन्‍्त्री--महाराज ! शांति घारण कीजिये। आपको रोना 


( १६७ ) 


शोभा नहीं देता । आप भद्दाराना है। आपको अधीर 
देखकर अजाका क्या द्वाल दोगा १९ 
प्रताप--- चौककर , महाराना | क्‍या उसे रोनेकी भी आजा 
नहीं ! जो एक मिखारी भी कर सकता है, महाराना 
चह भी नहीं कर सकता ९ क्‍या यह शासन, यह 
राज्य इतना भहँगा है ? वहुत अच्छा | में अब न 
रोऊँगा, ये ऑसू देश और जातिके हैं, इन्हे अपने 
लिए ओआऑँखोसे घाहर न निकलने दूँगा | 
( मन्‍्त्री, दरवारी सव सिर भुका देते है ) 
अस्यास 


( १) इस पाठको पढ़कर राजमाता और प्रतापसिहके चरित्रपर अपना मत 
प्रकट करो | 

(९ ) इस पाठकी कथाकों सक्षेपमें एक छेखके रुपमे लिखो । 

( ३ ) राजमाताने किन-किन दाव्दोसे अतापको प्रोत्साहित किया। 


४९--कबीरके दोहे. 2 
[ क्षे०--ऋषीरदास ] 


( कबीर पन्थके प्रवत्तेक मदात्मा कबीर-दासका जीवनकाल अनुमानतः 
स० १४५५---१५७५ है। ये हिन्दू कुलमें उत्पन्न हुए, परन्तु एक जुलाहे 
के घर पके । ये राम-वामके भक्त और स्वामी रामानन्दके शिष्य थे । हिंदू: 
मुसलमान दोनोंके मतोकी इन्होंने बढ़ी आलोचना की! इनके कहनेका 
उड्न निराला है, परन्तु जो कुछ इन्दोंने कहा है, अलुभवपू्ण है। इनकी 
साखिया खूब मशहूर हैं । ) 

अवे-खते ले द्र॒न्य है, उदय असृत लौ राज; 
भक्ति-महातम ना तुले, ये सब कौने काज ॥ १॥ 


( ९०७८ ) 
आर कमे सब कमें हैं, भक्ति कर्म निष्कर्म, 
कहे 'कवीरः पुकारि के, भक्ति करो तजि सम ॥ २ ॥ 
लूटि सके तो लूटिये, सत्तनामकी लूटि, 
पाछे फिर पछिताहुगे, प्राय जाहि जब छूटि ॥ ३ ॥ 
जिन हूढ़ा तिन पाइयों, गहिरे पानी पैढि, 
मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैंठि॥४॥ 
मूरख सो कया वोलिए, सठ सो कहा दसाय, 
पाहनमें क्या मारिए, चोखा तीर ससाय॥ ४॥ 
आचारी सव जग सिला, मिला बचारि न कोय, 
कोटि अचारी वारिए, एक विचारि जो दोय॥ ६॥ 
निदक एको मति मिले, पापी मिलें हजार, 
इक निंदक के सीस पर, कोटि पापकों भार॥ ७॥ 
मत्र तो बहुतक भांतिका, तादि न जाने कोय, 
तन-मद, मन-मद जाति-मर,साया-मद सवलोय ॥-। 
जिद्या-मद ओ गुनहु मद, राज-सद उनसह, 
इतने मदको रद्‌ करे, तत्र पावे अनहढ॥ ६ ॥ 
नीचे-नीवे सब तेरे, जेते वहुत अधीन, 
चढ़िवोहित अभिमानकी, वृड़े ऊँच कुलीन | १०॥ 
सब ते लघुताई मत्री, लघुता से सब द्वोय, 
जस दुतियाको चन्द्रमा, सीस नव सब कोय ॥ ११ ॥ 
लम्बा मारग, दूरि घर, विकट पंथ वहु सार, 
कह कबीर” कस पाइए, दुस्लभ गुरु दीदार ॥ १९॥ 
करु वहियाँ वल आपसी, छॉड विरानी आस, 
जॉके ऑगन दे नदी, सो कस मरे पियास॥ १३ ॥ 
रचनहारको चीन्दि ले, खाने को क्या रोय, 
दिल मंदिरमे पैंठि करि, तानि पिछौरा सोय॥ १४ ॥ 


( १५६ ) 


बुरा जो देखन मै चला, छुरा न मिलिया कोय 
जो दिल खोज आपनो, मु्मसा घुरा न दोय॥ १४॥ 
क्रोध, मद, लोभकी, जब लगि घटसे 
कटद्दा मूले, कह पंडिता, दोनों एक समान | १६॥ 
कबिय? मन तो एक है, भावे तददों लगाय, 
भाबे गुरुकी भक्ति कर, भावे विषय कसाय। १७ # 
मनके बहुतक रंग हैं,छिन-छिन बदले सोय, 
एके रंगमे जो रहै, ऐसा बिसला फकोय || १८॥ 
मन सायर, मनसा लहरि, यूड़े---बहे अभेक, 
कद्द कबीर ते बॉचि हैं, जिनके हृदय बिबेक॥ १६ ।! 
सन गयन्द माने नहीं, चल्ले सुरतिके साथ, 
दीन भद्दावत के कक अंकुश लक हाथ ॥ २० ॥ 
अभुता मिलते, प्रशुता ते अमु दर, 
ले शक्कर चली, द्ाथीके सिर घूरि॥२१॥ 
प्रेम-मऔति सों जो भिले, मिलिये धाय, 
आतर राखे जो मिले, तासों मिल्ले बलाय॥ २२॥ 


अभ्यास 


(१) प्रेम-प्रीति. मिले बछाय” इस पदका भावार्थ लिखो। 
(२) मन " बिरला कोय' इस पदका अन्यय और अयथे छिखो। 
(३ ) फवीरदासकी उत्तियोमें अधिकत्तर क्‍या भाव भरा है £ 
(४ ) साबित करो कि कबीरदास भावुक ये । 
(५) निश्नलिखित पद्मो का सरलाये लिखो+--- 

सद तो *००००सुत्रु लोय | 

विद्या मद "“अनहइ। 
(६ ) तन-मद, मन-मद्‌, जाति-मदमें कौन समास है १ 


११ 


शब्दार्थ-तालिका 
न्-लल»्ं््थ्थिध्च्ध्य्य्ध 


१--वयाब्चा 


याव्चान्य्यांचना, मिक्ता। तमाल-एक बहुत ऊँचा सुन्दर 
सदाबद्दार वृत्त, आबनूस । रसाल-आसम। नयन्‍्तीत। असफु- 
ट+अधघखिली । सुखाल्वी-सुख वेनेवाली। मराली-हंसिनी । 
२--जातीय साहित्य 
उल्लैेख--वर्णन, चचो। व्यब्श्ित-प्रकट। सृघनाम धन्य 
थशसबी | आध्यात्मिक-आत्मा आत्मा या त्रह्म सम्बन्धी | परि- 
भार्जिवल्शुद्ध, बिसल। अबरोध-रुकावट, अड्चन | 
३--कर्मचीर 
मुँद्द तकते-निश्वेष्ट होकर बैठ रहना। लवर-न्वाला, 
इझागकी लपट। मरुमूमिन्रेगिंसंतान | 
४--सम्माषणमें शिष्टाचार 
सम्भाषण-बातचीत,_ कथनोपकथन |. शिष्टाचार-्सम्य 
पुरुषोके योग्य आचरण, आदर, सम्मान, विनय, नम्रता। 
व्यापकनविसतृत ॥  उपयोग-व्यवहर । समरवयसक-- समान 
अधवसथा या उम्रवाहे। अहम्मन्यतालअहंकार, घमंढ। 
दुरामह >- हठ, जि । 
--द्रौपदी-वचन-वीणाविर्ली' 
वाणावली-वाण+अपली-धणोंकी. पंक्ति, कठोर बाण 
रुपी तीखे वचन-समूह । कऋष्णान्द्रोपदी। पेनेन्तेज। कुंशंजार 
बंशमें उत्पल। गरिमान्मदिसा। कोपांनेल-क्रोधरुपी ओग। 
चर्चितल्‍लगाया हुआ, लपेटा हुआ। अक्षत्रिमं>अंलोकिक, 
असक्ी। बल्कल“छिलका, छाल । युग्म-एक हो साथ जन्मा 


(४२) 


हुआ। कृश-ढुबला, क्षीणं। छुसन-रज-कणन्पराग। केतु 
मंडा। निसृप्तुह-इच्छासे रहित, 
६--स्वामी शंकराचाय 

विशारद > पंडित ।  मनोयोग--मनको एकाम्म कर किसी 
काममे लगाना । सौरभ -सुगन्ध । अतिवाह्वित “व्यतीत करना | 
रज््णावेक्षण - पालन पोषण । स्तष्ट <+ रचयिता। अलीकता न< 
दोष, न्नुटि। ब्णेतार-स्वयिता। अहैतवाद >चहद सिद्धान्त 

एक ईधरकी सत्ता मानी जाय । 
७--मभाठ्‌-भूमि 
नीलाम्घर >: आकाश । परिधान>चस्र । मैेखला-:फरघनी। 
समुद्र । मंडनलनशोभा, आमूषण। पयोद-:वादल। 
जठरानल>पेटकी आग!  मत्युपकार-उपकार चढदला। 
घनावत्ति- वादल-ससूह । वेणी-वालोकी गुथी हुईं एक चोटी 
८--फोनोग्राफ़का आविष्कार 
» आविष्कार किसी बातक़ा पहले-पहल पता कगाना | 
६--ल्लान-स्रोत 
अमभरना। अगाध पयोनिधि --अथाह समुद्र । जलयान -२ 

नाव, जहाज | कल या पॉच प्राणेमेंसे एक । उदान-< 
आशवायुका एक भेद) _ सन्यान:: पंच-चायुओमें 
से एक, जो सारे शरीसमें संचार करती है। धर व-ध्येय-- 
लद्य। अविकल्प- निश्चित )। श्रमाद >पागलपन, घमंड । 
निगमासस -+ निगम+आगस +- वेदशास्तर । प्रशल्म-- प्रक्तिता- 
शाज्ञी | खरे5-अधिक। दृम्भ --कंपट। अपंच- आडम्बर | अमाद 
>ज्षम। सुरामदिरा। मिस>वबहानेसे। उपहास“£-लिंदा, 
हँसी। मनोज विलास>फाम क्रीड़ा। पहुता- निपुणता। 
भ्रतिमा ज्ञान कृपाथ- तलवार। अविरुद -अछुकूल । 


(४३) 


१०--ममेट्टोका तेल 

भूगसे - पृथ्वीका भीतरी हिससा। विसतीणे- फैला हुआ। 

वाष्प-भाप | पूर्वो्त&ऊपर कही हुई । 
._ ११--अंगद और रावण 

मधुपूभोरा। सारस-कमल।  तमीचर- राक्षस । 
जनकात्मजा “:सीताजी । किम सका । केक: 
#शरदऋतुके चन्द्रमाका अकाश । ञशीघ्र। समैश- 
भगवान्‌। अनय-:अनीति। रसा-:प्ृथ्वी । कप 
असुर->देवता और शच्तुस। दनुज्ेश्वर--राजण | सनुज-सेवक 
>मलुष्यका नोकर। सृतवन>भ्रशंसा। नृपात्मज--राजकुमार । 
समर-पावक--युद्धछपी अप्रि। तिरोद्दित-गायब दो जाना, 
नष्ट होना । रोहित --इन्द्रधनुष | कबल दायक -: भोजन देनेवाला 
चारण-हाथी | 

१२--भारतीय संश्कृति 

संसक्ृति - शाइसूतगी, किसी जातिकी मानसिक शुद्धि । 
सभ्यता - शारीरिक शुद्धि । भौतिक “- शरीर सम्बन्धी । आदशे -- 
नमूना। तद्विषयक-:उस विषयके सम्बन्धमें। निरीक्षण -जॉच- 
पड़ताल । वैमवशाली --प्रतापी। बरक्ति--जीविका, वसीला। 

न्‍सवासी। वृहत्‌>बढ़ा। अतीतकाल> मृतकाल | 
साधन--जरिया। उपासना->पूजा। ध्येय >ष्यान रखने योग्य 
लक्ष्य +। उद्देश्य--मतलब। ,आध्यात्मिक >- आत्म-सम्बन्धी | 
छायहेलना -- तिस्सकार, बेपरचाही करना। विलासिता> आराम- 
तलबी। झुत्सित-: नीच, अधभ | हन्द- मरगढ़ा। शैशव-- बचपन 
पुनरुत्थान- फिरसे उन्नति । सम्पर्क >> लगाव, सम्बन्ध | 
१३-- छवि 

भंजुल अब । मयहूु > चन्द्रमा । आनन-सुख | कांति: 
ज्योति। दृग नेत्र | प्रभाकर -- सूये। शरद्‌ जुन्हाई-- शरद-कालकी 
धवॉदनी | छबि-सुन्दरता,शोभा | सलोनी -5छुन्द्र। रति-:फाम- 


( ४) 


देवकी ख्री। रमानलक््मी। कनकलता-खर्णवेलि |“ कमनीयता-: 
सुन्दरता। सुघर-सुन्दर। सुपमा-शोभा। सुधाकर-ल्वन्द्रमा । 
मिलिंद --मँवरा ।  पठंग-कीड़ा। कंजकलिका-कमलकी फली। 
निकाई-सुन्दरता । लुनाई-सुन्दरता। कृशानुनअभस्‍ि। पादप 
चक्ष । सरोज-कमल । सुमन-फूल। विहंगमों-पत्तियों 
१४--गोविन्द 

प्रेम-चिमोर-श्रेमासक्त । अनल-अभनिलज्आंग और हक! 

अनुमतिः--आज्ञा । अहदै-्हे | प्रत्यादेश-आज्ञा, हुक्म । 
१४--भक्तकी भावना 

गगनन्आसमान | छुद्रन्थोग । महानवन्समुद्र । 
आतुराज-बसंत । आधेयन्रखने योग्य । करुणेशन्द्याका 
खामी। शीतकर-न्चन्द्रम। शरद राका शशि>शरद्‌ कालकी 
पूर्रिमाका चन्द्रमा | हययेश --हृदयका खाभी । छपित-प्यासा। 
दिवाकर-सूये। जलद-वादल 

" १६--हिन्दी साहित्यमें नाटक 

प्रस लैगा-पकड़ लेगा। उदीयमान-स्प्रतिभाश्षाली। सुरम्यन 
झुन्दर। वाद्यो>ःवाजे । चित्ताकर्णक-मनको खींचनेवाली । 
अवीण-निपुण । है 

१७०-आतप्रम 

सुकृत -- पुण्य | सिरान--ःखतम हो गया | गेह- घर । नयना- 
गर-नीतिमे चतुर। कद्राना-डरना। सिख-शिक्षा, उपदेश। 
नवरु-नहीं तो! रिपुसूदन-शत्र॒न्न। तद्दिन--पाला। दिवस-+ 
दिन। वादि>-व्यथे। जद 

शिष्ड भगतका संवाद 

रोप-कोध। मुखर-वहुत वोलनेवाला। आयसु--आज्ञा। 
अनुसरई- अनुसरण करते है। वैखानस-तपखी। पिसुन+- 
चुगलखोर। बैन--बचन। नरेश-राजा। फर-सत्य। परिह- 


( ४) 
रहु>छोड़ दो। अमिय-अम्रत। सचिब--मंत्री। परितोष-- 
सनन्‍्तोष। जर्रने-जलन। सदन--घर | 
१८--ऋक्रोध 
सान्चनात्कार - मेंट; सपष्टज्ञान | परिक्षान -- जानकारी, ज्ञान । 
अभ्यसृत-: परिवित। अवरोध-शक्ति-तलिवारण करनेकी शक्ति। 
. विकारो>-चिह्ो, परिवततेन। सृष्टिविधान-संसारिक व्यवस्था |. 
आते-दुःख | अथे परायण 5 घनका लोभी | 
१६-..प्रम-प्रवाह 
आसाद - महल । समता -बराबरी। सर्वेस-डेख़र। बराह-- 
सूझअररूपी भगवान्‌। हन्निमए-हृदयरूपी करना। समीरण 
हवा । दाह > जलन । विपद्ण्म -- दुखरूपी वष्ल । 
२०--कबोर साहनच 
अवतेक - चलानेवाला, नेता । गियाना ८ ज्ञान) सत्यान्वेषक-- 
सत्यकी छानबीन करनेवाला। _ , 
२१---सजंन-संकीत न 


अन्दना। भंम्सनिज्ष>तेज वायु, अलयकारी हवा। प्रेमणसि८> 
/प्रेमका. समूह । फेतु- पताका | अरुण-लाल | 
२२--चरित्र संगठन 
दाशेनिक बुद्धि -द्शेनकी महण करनेवाली बुद्धि । आत्मा-- 
परमात्मा संबंधी ज्ञान। चैक्वानिक-कोशत्£ विज्ञान सम्बन्धी 
चातुये। ओ्रोदावसथा -युवावसथा। उत्तरदायित्व - जिम्मेदारी, 
कायेमार। नीरस-पिष्ट पेषण:--एक नीरस घातकों बार-बार 
कहना । कण्टकाकीणे- कठिनाइयोसे भरा हुआ । 
२३--संसार-सार 
मिथ्याभास ८ झूठा, जिसका कुछ असितत्व न हो। भव- 
सय-:संसारिक दुःख | 


( के 


२४---ग्रामवास और नगरवास 
परम्पराओों --एकके पीछे दूसरा; लगातार। आओत गोत्र 
पमिलता-जुलता, घुल-मिलकर। अमभिनय८- नाटक | अहसन-- 
इास्यस्ससे थूर्ण एक अकारका नाटक। धारोष्ण>थनसे तुरत 
दुद्दा हुआ दूध । 
२५----मझुरक्षाया हुआ फुल 
शुध्क- सूखा हुआ । करतार--इेश्व९। हरखाना-- प्रसन्न 
डदोना | सुमन फूल । नि श्री 
२६--स्चंशुणाघार श्रीक्षष्ण 
काये-कलाप- फाये समूह। पराकाछठा > अन्तिम सीसा | 
अश्व परिचय “ घोड़े का काम । चिकित्सा > इलाज | सुरापायी-- 
शंरवी। निरपेक्ष८निई्ठन्द्र, उदासींन | 
२७--भारत-बन्द ना 
अलका-कुचेरकी पुरी। अमरावती ८ इन्द्रपुरी । भिरत-- 
जीन | विनसी> नष्ट होना । सकानी >-डरी हुई। 


२८--वी रता 
आविभाच -- उत्पत्ति । भ्रीतिभाजन ८ प्रिय-पात् । असिथयों:-- 
“इंड्डियों । 
२६---विपदू स्वागत 


आहकिद्नन + गले लगाना । प्रसतुत-तैयार । 
३०--मत्स्य-देशेंमें पाणंडव 

काल क्षेप समय विताना। अनिष्ट--अमज्ञल | बुद्िधि- 
विलक्षणता --चुद्रिघमानी । उपयुक्त -योग्य । पाकशाला-- 
रसोई घर। चल क्रौढ़ाजूएका खेल । अख्यातू-प्रसिदूध | 
'निशक्षण :-देखभाल रे 

३१--वीर॑ शिवाजी 
छिन-छिन-क्षण-क्षण । पद-रजं --पैरकी घुल । 


(७) 


२३२--चरित!वली ( कालिदास ) 
साज्षात्कार-मेंट । विद्योपाजन -विद्या कमाना | देशाधि- 
पति->देशके राजा। 
३३--भिरिघरकी कुडलिया 
बिछोद्दा > वियोग । अगर--एक सुगंधित लकड़ी । कुल्हा 
कपड़ेकी टोपी। दहोआ-डरावना या भयंकर कल्पित जीव। 
३४--बीर-जननी-राजस्थान 
कारनामो -कामो। शहीद -जो देशके लिये मरा हो। 
जिगरं-फलेजा | प्त्युतू-- बल्कि । प्रसव-पैदा करना। 
३५-- सरदासके पद 
भुजंग-सॉप। घचुगाये-दाना खिलाना। खान-कुत्ता। 
सरिता -नदी । खट्दटि-राख-पात। पाहन-:पत्थर। रीति 
खाली। निंग -तरकस । जावक>महावर। बेनी-चोटी। 
जोबत-खोजती है। आनन--मुह । 


३६--कंस प्रवंचना 
परतीत -- विश्वास । बसीठ --दूत | 
३७--रद्दीमके दोहे 
५, मीत “मित्र । नखत--नक्षत्र, तारे । बड़री-बढ़ी। व्याल-- 
सॉप। 
ध ३८--चित्तौड-चर्चा मल 
नर । मरुभूमि -- रेगिस्तान | कट 
दीवारी । पिल्लीरबर- दिल्लीके गजा। विजयसूतम्भ-- 
खम्भा। जीणं-शीण्ण - पुराना । 
३६--भूषण कविके पद्य | 


गजेन्द्र-ऐराबत। दुगध-नदीस-क्षीर सागर। रजनीस- 
कफ कमठ >कछुआ। क्िम्बर- शंकरजी। सिवा: 
दी। हब मे